ईसाइयों के लिए सर्वाधिक संकटकारी देशों की सूची में भारत को सम्मिलित करने वाले प्रसारण (रिपोर्ट) पर ईसाई लेखक श्री साविओ रॉड्रिग्स की प्रतिक्रिया

नई दिल्ली – प्रसिद्ध लेखक एवं ‘द गोवा क्रॉनिकल’ के संपादक श्री. साविओ रॉड्रिग्स ने कहा कि, ‘ओपन डोर्स’ द्वारा प्रसारित मत मानवाधिकार विश्लेषण के नाम पर छिपे वैचारिक पूर्वाग्रह (Ideological Prejudice) का एक उत्तम उदाहरण है ।यह मत धरातल की वास्तविक स्थिति की जानबूझकर उपेक्षा करता है । भारत एक सुसंस्कृत राष्ट्र है, जहां प्रत्येक प्रमुख धर्म न केवल अस्तित्व में है, अपितु फल-फूल भी रहा है । इसमें ईसाई धर्म भी सम्मिलित है । भारत में चर्च पूरी स्वतंत्रता के साथ कार्यरत हैं, ईसाई संस्थाएं भारत के कुछ सर्वोत्तम विद्यालय एवं चिकित्सालय (अस्पताल) चलाती हैं तथा ईसाई व्यक्ति सर्वोच्च संवैधानिक, नौकरशाही तथा ‘कॉर्पोरेट’ पदों पर आसीन हैं ।
वर्ष २०२५ में ईसाइयों के उत्पीडन एवं उन पर हुए आक्रमणों को लेकर ‘ओपन डोर्स’ नामक संस्था ने एक प्रतिवेदन (रिपोर्ट) प्रकाशित किया है । ‘वर्ल्ड वॉच लिस्ट २०२६’ के नाम से किए गए इस अध्ययन में ईसाइयों के लिए सर्वाधिक संकटकारी १५ देशों की सूची में भारत १२ वें स्थान पर है । इसी विषय पर ‘सनातन प्रभात’ से बात करते हुए श्री साविओ रॉड्रिग्स ने उपरोक्त प्रतिक्रिया व्यक्त की ।
श्री. रॉड्रिग्स के वक्तव्य के मुख्य बिंदु
१. ‘भारतीय होने का अर्थ हिन्दू होना है’, यह दावा हिन्दू समाज को अपकीर्त (बदनाम) करने के लिए बाहरी शक्तियों द्वारा थोपा गया एक नैरेटिव (कथानक) है ।
२. भारतीय राष्ट्रवाद राष्ट्र (Civic) है, (मुस्लिम देशों की भांति) धर्मतंत्रवादी (Theocratic) नहीं । धर्मान्तरण अवैध नहीं है । केवल बलपूर्वक एवं धोखाधडी से किए गए धर्मान्तरण पर प्रश्नचिह्न उठाया जाता है । किसी भी संप्रभु राष्ट्र को ऐसा करना ही चाहिए । इस विरोध को ‘व्यवस्थित भेदभाव’ जैसे दुर्भावनापूर्ण नाम के अंतर्गत बेचना, बौद्धिक अप्रामाणिकता (बेईमानी) है ।
३. वास्तविक चुनौती आक्रामक रूप से धर्म प्रचार कर धर्मान्तरण का प्रयास करना है । ऐसे समय में स्थानीय संस्कृति का अनादर किया जाता है तथा हिन्दुओं की असुरक्षितता का अनुचित लाभ उठाया जाता है ।
४. ‘ओपन डोर्स’ जैसे प्रतिवेदन अल्पसंख्यकों की रक्षा नहीं करते, अपितु उन्हें अपरिपक्व सिद्ध करते हैं । साथ ही, यह हिन्दुओं एवं ईसाइयों के बीच की सांप्रदायिक खाई को और गहरा करते हैं । भारत को ऐसी संस्थाओं से उपदेशों की आवश्यकता नहीं है, जिनका प्रारंभ पूर्वाग्रह से होता है तथा अंत दुष्प्रचार (प्रोपेगैंडा) से ।
वर्चस्व स्थापित करने के लिए ‘अत्याचार’ के नैरेटिव को हथियार बनाते हैं !
श्री गोतिए ने आगे कहा कि उन्होंने भारतीय इतिहास का अत्यंत निकटता से अध्ययन किया है एवं उस पर पुस्तकें भी लिखी हैं । फ्रांसिस जेवियर एवं अन्य कैथोलिक ईसाइयों ने हिन्दुओं तथा मुसलमानों पर अमानवीय अत्याचार किए । गोवा में ‘इनक्विजिशन’ के माध्यम से हिन्दुओं का नरसंहार किया गया । हिन्दू लडकियों का बलपूर्वक पुर्तगाली सैनिकों से विवाह कराया गया । इसका कभी उल्लेख नहीं किया जाता । उन्होंने पुणे में एक संग्रहालय स्थापित किया है, जिसमें पुर्तगालियों द्वारा हिन्दुओं पर किए गए अत्याचारों का सचित्र वर्णन है । दूसरी ओर, गोवा में अनेक वर्षों से भाजपा की सरकार होने के उपरांत भी पुर्तगालियों के अत्याचारों के साक्ष्य देने वाले एक भी संग्रहालय की स्थापना नहीं की गई है । इस प्रकार के प्रतिवेदन हिन्दुओं को अपकीर्त (बदनाम) करने के लिए रचा गया एक षड्यंत्र हैं । ईसाई किसी भी देश में स्वयं का वर्चस्व स्थापित करने के लिए ‘हम पर अत्याचार हो रहे हैं’, इस कथानक (नैरेटिव) का उपयोग एक शस्त्र के रूप में करते हैं ।


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