
नागपुर – हमारा किसी के साथ झगड़ा नहीं होता । हम वाद–विवाद से दूर रहते हैं । ‘किसी के साथ विवाद करना’ यह हमारे देश का स्वभाव नहीं है । मिलकर, एकरूप होकर रहना, बंधु–भाव (भाई ,सगा,संबंधी भाव) बढ़ाना तथा सामूहिक सद्भाव – यही हमारी परंपरा है, ऐसा प्रतिपादन पूज्यनीय सरसंघचालक डॉ. मोहनजी भागवत ने किया । वे नागपुर में २९ नवम्बर को संपन्न एक कार्यक्रम में बोल रहे थे ।
उन्होंने आगे कहा कि विश्व के अन्य देशों की उत्पत्ति संघर्ष से हुई है । वहां एक मत स्थिर हुआ तो अन्य किसी भी विचार को स्वीकार नहीं किया जाता । वे अन्य मतों के लिए अपने द्वार बंद कर देते हैं ।
‘राष्ट्रवाद’ नहीं, अपितु ‘राष्ट्रीयता’ ! – सरसंघचालकपाश्चात्य देश हमारी राष्ट्र–संबंधी संकल्पना को समझ नहीं पाते । अतः उन्होंने इस विचार को ‘राष्ट्रवाद’ कहना आरंभ किया । हमारा राष्ट्र–विचार पाश्चात्य देशों से भिन्न है । हम ‘राष्ट्रीयता’ शब्द का प्रयोग करते हैं, ‘राष्ट्रवाद’ का नहीं । विश्व ने २ महायुद्ध देखे हैं, इसलिए कुछ लोग ‘राष्ट्रवाद’ इस शब्द से भयभीत होते हैं । भारत की राष्ट्रीयता अभिमान अथवा अहंकार से उत्पन्न नहीं हुई है, अपितु गहन आत्मचिंतन तथा प्रकृति के साथ सह–अस्तित्व से इस भाव की उत्पत्ति हुई है । |
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