मंदिरों के कारण उद्योग तथा लोककलाओं का विकास !

१.  तीर्थक्षेत्रों पर आनेवाले भक्त एवं श्रद्धालु ही वहां के उत्पादों के ग्राहक तथा प्रचारक

जिन तीर्थक्षेत्रों और अन्य स्थानों पर भक्त, श्रद्धालु तथा सामान्यजन जाते हैं, वे वहीं पर स्थानीय रूप से उत्पादित होनेवाली वस्तुओं, साहित्य एवं कपडों की बहुत अधिक खरीदारी करते थे तथा आज भी करते हैं । परिणामस्वरूप संबंधित क्षेत्र के उद्योगों का विकास होता है, अनेक दुकानदार तथा उत्पाद प्रसिद्ध होते हैं ।

श्री. यज्ञेश सावंत

२. वाराणसी में हस्तकला एवं मिठाई को प्रसिद्धि

‘वाराणसी अर्थात काशी’ हिन्दू धर्म के अनुयायियों के लिए एक ऐसा श्रद्धास्थान है जहां जीवन में न्यूनतम एक बार तो तीर्थयात्रा करनी चाहिए । यहां आनेवाले श्रद्धालुओं की चहल-पहल के कारण काशी नगरी सदैव प्रफुल्लित रहती है । इस स्थान पर रेशमी बनारसी साडियों तथा बनारसी शालू की बहुत मांग है और उनकी खपत भी अधिक है, साथ ही यहां चटाई बुनाई का केंद्र स्थापित हुआ है तथा लकडी के खिलौने, कांच की चूडियां तथा पीतल की वस्तुओं का उत्पादन होता है ।

काशी से जानेवाला व्यक्ति तांबे के बर्तन में गंगाजल लेकर आता है, ऐसी प्रथा है । इस कारण वहां तांबे और पीतल की वस्तुएं बनानेवाले उद्योगों का विकास हुआ । वाराणसी आनेवाले लाखों लोगों का सत्कार वहां की प्रसिद्ध मिठाईयों, दूध के उत्पादों तथा चाट के विभिन्न प्रकारों द्वारा किया जाता था । परिणामस्वरूप वाराणसी में मिठाईयों के सैकडों प्रकार हैं और वे एक से बढकर एक स्वादिष्ट होती हैं ।

३.  द्वारका के कारण बूटेदार एवं नक्काशीदार थैलियों की मांग

द्वारका में बूटेदार एवं नक्काशीदार, अनेक आकारों तथा प्रकारों की थैलियों (बैग), बंदनवारों और कपडों का व्यवसाय प्रसिद्ध हुआ । द्वारका आनेवाले लाखों श्रद्धालुओं के कारण ये उत्पाद भारत भर में फैल गए । इससे स्थानीय लोगों को व्यवसाय मिला है ।

४.  तमिलनाडु की कांजीवरम् सािडयों की देशभर में मांग

दक्षिण भारत में, विशेष रूप से तमिलनाडु के कांचीपुरम् और मदुरै में उत्पादित होनेवाली कांजीवरम् (कांचीपुरम्) रेशमी साडियों की बडी संख्या में मांग है । इन सािडयों को वर्ष २००५-२००६ में भारत सरकार द्वारा आधिकारिक तौर पर ‘भौगोलिक संकेत’ (Geographical Indication) के रूप में मान्यता दी गई है । कांचीपुरम् तमिलनाडु के मंदिरों की राजधानी होने के कारण यहां वर्षभर भक्तों एवं श्रद्धालुओं की भीड रहती है । दर्शन के लिए आए श्रद्धालुओं के कारण ही वास्तव में इन सािडयों की रिकॉर्ड तोड बिक्री होती है । इससे बुनाई कला वास्तव में टिकी हुई है ।

महाराष्ट्र के शक्तिपीठों में से, प्रत्येक भक्त तुळजाभवानी देवी, महालक्ष्मी देवी, रेणुका देवी तथा सप्तश्रृंगी देवी को साडी-चोली, चोली का कपडा (ब्लाउज पीस)-नारियल अवश्य अर्पित करता है । देवी को अर्पित करने के लिए अच्छी गुणवत्तावाली रेशमी साडियों की खरीदारी की जाती है । इससे साडी उद्योग तेजी पर है । देवी को अर्पित की गई साडियों की विशेष मांग होती है । रामनाथी (गोवा) में नौवारी साडियां (नौ मीटर की साडियां) अर्पित करते हैं, धोती अर्पित करते हैं । इससे वे देवता को वस्त्रदान देते हैं, इसलिए धोती तथा नौवारी साडी का प्रकार टिका रहेगा ।

मंदिरों के कारण मूर्तिकला, शिल्पकला, चित्रकला का टिके रहना

श्रीराम मंदिर की शिल्पकला

देवता की मूर्ति के लिए वस्त्र, आभूषण तैयार करने के परंपरागत उद्योग हैं । शिल्पकला, मूर्तिकला ये भी मंदिरों से जुडी होने के कारण उन्हीं के कारण टिके हुए हैं । लाखों लोगों को पीढी-दर-पीढी व्यवसाय भी उपलब्ध हुआ है । देवताओं के चित्र तैयार करने की, अर्थात अनेक प्रकारोंवाली चित्रकला भी टिकी हुई है एवं उन कलाकारों की आजीविका भी इससे चल रही है ।

पूजाविधि में संस्कृत मंत्र एवं देवताओं का गुणगान करनेवाले संस्कृत श्लोक, स्तोत्र, इनके कारण संस्कृत भाषा अनेक युगों तक टिकी रही है । – श्री. यज्ञेश सावंत

५.  मदुरै सोने का बाजार

मदुरै में विश्व प्रसिद्ध मीनाक्षी देवी का मंदिर है । यहां ऐसी प्रथा बन गई है कि देवी के दर्शन करने के बाद थोडा-सा सोना अर्थात सोने का आभूषण अथवा वस्तु देवी का प्रसाद मानकर घर ले जाना चाहिए । परिणामस्वरूप मदुरैै जैसे शहर में सोने की १ सहस्र से भी अधिक दुकानें हैं । इससे सोने का व्यवसाय बढा है, इसमें आश्चर्य नहीं ! एक मंदिर ने सोने के व्यापारियों तथा उद्योग को बढावा दिया है । सहस्रों कारीगरों को काम मिला है तथा लाखों लोगों की आजीविका इस पर निर्भर है ।

६.  शिर्डी के कारण शॉलें तथा येवला की पैठणी की मांग

शिर्डी जाने पर भक्त, साईं बाबा को अर्पित करने के लिए शॉल खरीदते हैं । इस कारण इन शॉलें एवं चादरों की मांग तथा उनका उत्पादन स्वाभाविक रूप से बढता है । शिर्डी के पास स्थित नासिक की येवला पैठणी (रेशमी साडी का एक प्रकार) ! पैठणी का प्रसार दुनिया के कोने-कोने में हुआ है ।

इसी प्रकार, सोलापुरी चादरों तथा कंबलों का व्यवसाय वास्तव में तुळजापुर आनेवाले देवी भक्तों एवं पंढरपुर आनेवाले वारकरियों के कारण बढा है ।

७.  कोलकाता में हाथी दांत की चूडियों का व्यवसाय ऊंचाई पर !

कोलकाता जाने पर वहां सफेद एवं लाल शंख पोळ (शंख से बनी चूडियां) तथा हाथी दांत की चूडियां प्रसिद्ध हैं । इन चूिडयों को पहनना दैवी शक्ति का प्रतीक माना जाता है । कोलकाता की महाकाली देवी प्रसिद्ध हैं । चूिडयां दैवी ऊर्जा की वाहक होने के कारण, ये चूिडयां कोलकाता में हिन्दू महिला के अविभाज्य आभूषणों में से एक हैं । कोलकाता जानेवाली प्रत्येक श्रद्धालु महिला ये चूिडयां खरीदने के लिए उत्सुक रहती है ।

८.  किसानों का विकास

मंदिरों में अभिषेक, प्रसाद बनाने के लिए दूध और दूध से बने पदार्थों की आवश्यकता होती है । देवता को महाप्रसाद का भोग लगाने के लिए फल तथा सब्जियों की आवश्यकता होती है । अनेक प्रकार के फूल-पत्ते प्रतिदिन लगते हैं । यह मांग निश्चित रूप से किसान पूरी करता है । इसलिए इससे एक प्रकार से कृषि उत्पादों की मांग बढती है । किसान को आर्थिक लाभ होता है एवं अनेक परिवारों का पोषण होता है ।

९.  कलाओं का विकास मंदिरों के कारण ही !

पहले कला प्रदर्शन के लिए अलग से मंच अथवा व्यवस्था नहीं होती थी । कलाकार को कला का प्रदर्शन राजदरबार अथवा मंदिर के स्थान पर ही करना पडता था । मंदिरों में बडे सभागार होते थे । कलाओं का प्रदर्शन मंदिर में ही होता था एवं कलाकार के कला संबंधी गुणों का सम्मान होता था, जबकि श्रोता वर्ग को कला के माध्यम से दैवी ऊर्जा का अनुभव होता था । परिणामस्वरूप कलाओं का विकास, संरक्षण तथा कलाओं को सहेजना संभव हुआ ।

१०.  देवताओं के उत्सवों के समय करोडों का व्यापार !

प्रत्येक देवता का मुख्य उत्सव अथवा मेला होता है । कुछ उप-उत्सव भी होते हैं । वहां सहस्त्रोेंं, लाखों भक्त जमा होते हैं । उस समय करोडों का कारोबार होता है । मंदिरों के कारण ही अठारह विभिन्न जातियों के लोग एक छत के नीचे एकजुट होते हैं । सामाजिक समरसता का इससे बेहतर अन्य उदाहरण हो सकता है क्या ?

११.  मंदिरों के कारण पर्यटन उद्योग में वृद्धि

मंदिरों की यात्रा करने के उपरांत भक्त एवं श्रद्धालु परिवार के साथ आस-पास के स्थानों पर भी घूमने जाते हैं । वे वहां ठहरते हैं । परिणामस्वरूप पर्यटन उद्योग भी स्वतः ही बढने लगता है ।

१ सहस्र, १० सहस्र तथा उससे अधिक नौकरियां देनेवाले प्रतिष्ठानों (कंपनियों) की प्रशंसा सरकार करती है । लाखों लोगों तथा उनके परिवारों की अनेक पीढियों के पालन-पोषण का दायित्व निभानेवाले मंदिरों पर बुरी दृष्टि क्यों रहती है ? ‘मंदिर का जीर्णोद्धार करने के स्थान पर वह पैसा गरीबों को दे दो’, ऐसा कहनेवालों के लिए काशी, महाकालेश्वर में सुसज्जित मार्ग (कॉरिडोर) बनाकर मंदिरों द्वारा किया जा रहा अद्भुत कार्य एक मुंहतोड प्रति उत्तर है । भक्तों एवं श्रद्धालुओं की आजीविका चलाने में मंदिर सक्षम हैं, यही सत्य है !

– श्री. यज्ञेश सावंत, सनातन संकुल, देवद, पनवेल. (२४.२.२०२४)