सत्र न्यायाधीश द्वारा अपने ही पूर्व आदेश का पुनर्विचार कर जमानत निरस्त करना विधिक दृष्टि से योग्य नहीं है !

  • कॉम्रेड. गोविंद पानसरे हत्या प्रकरण में डॉ. वीरेंद्रसिंह तावडे के जमानत का प्रकरण !

  • कोल्हापुर ‘सर्किट बेंच’ के न्यायमूर्ति शिवकुमार डिगे का महत्त्वपूर्ण निरीक्षण !

डॉ. वीरेंद्रसिंह तावडे

कोल्हापुर, १८ अक्तूबर (वार्ता) – कॉम्रेड गोविंद पानसरे हत्या प्रकरण में सत्र न्यायाधीश द्वारा अपने ही पूर्व आदेश का पुनर्विचार कर जमानत निरस्त करना विधिक दृष्टि से अनुमत नहीं है, ऐसा महत्त्वपूर्ण निरीक्षण मुंबई उच्च न्यायालय के कोल्हापुर ‘सर्किट बेंच’ के न्यायमूर्ति शिवकुमार डिगे ने किया है । (‘सर्किट बेंच’ का अर्थ है – न्यायालय का एक अस्थायी स्थान, जहां उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति निश्चित कालावधि के लिए आकर प्रकरणों की सुनवाई करते हैं ।) डॉ. तावडे के संदर्भ में दिए गए सविस्तर निर्णय में यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण निरीक्षण प्रविष्ट किया गया है ।

कॉम्रेड पानसरे हत्या प्रकरण में डॉ. वीरेंद्रसिंह तावडे सहित श्री अमोल काळे तथा श्री शरद कळसकर को १४ अक्तूबर इस दिन जमानत स्वीकृत की गई ।

डॉ. वीरेंद्रसिंह तावडे को वर्ष २०१८ में कोल्हापुर के जिला एवं सत्र न्यायालय ने जमानत स्वीकृत की थी । यह जमानत कोल्हापुर के जिला एवं सत्र न्यायाधीश श्री एस. एस. तांबे ने १६ जुलाई २०२४ इस दिन निरस्त की थी । इस निर्णय के विरोध में बचाव पक्ष की ओर से मुंबई उच्च न्यायालय में अपील की गई थी । उस पर १४ अक्तूबर के दिन न्यायमूर्ति शिवकुमार डिगे ने डॉ. तावडे को जमानत दी ।

न्यायमूर्ति शिवकुमार डिगे द्वारा निर्णय देते समय किए गए निरीक्षण :

१. जिला एवं सत्र न्यायालय द्वारा जमानत निरस्त करने का जो निर्णय दिया गया, वह विधिक दृष्टि से स्वीकार नहीं है ।

२. ‘‘साक्षी सागर लाखे का बयान घटना के साढ़े तीन वर्ष पश्चात् प्रविष्ट किया गया है । अतः साक्षी सागर लाखे का बयान यह अभियुक्त की जमानत निरस्त करने का आधार नहीं हो सकता’’, ऐसा मुंबई उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अनिल एस. किलोर ने निर्णय में पूर्व में कहा था और इस प्रकरण के अन्य संशयितों को इसी आधार पर जमानत स्वीकृत की गई थी ।

३. वर्ष २०१८ में जब डॉ. वीरेंद्रसिंह तावडे को जमानत स्वीकृत की गई, तब ‘‘दो परस्परविरोधी आरोपपत्र हैं और उसी आधार पर अभियुक्त को जमानत स्वीकृत की गई’’, ऐसा महत्त्वपूर्ण निरीक्षण उस समय जिला एवं सत्र न्यायालय ने किया था ।

४. अपने ही न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय का पुनर्विचार न्यायालय नहीं कर सकता ।

अधिवक्ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर

इस संदर्भ में अधिवक्ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर ने कहा, ‘‘जो मुख्य सूत्र हम बारंबार न्यायालय के निदर्शन में ला रहे थे, वही अब निर्णय में स्वीकार किया गया है । इस निर्णय से हमारे युक्तिवाद पर मुहर लगी है । जमानत का यह निर्णय अधिवक्ताओं के सामूहिक प्रयास एवं उनके युक्तिवाद के कारण प्राप्त हुआ है, जिसमें मुंबई उच्च न्यायालय के वरिष्ठ विधिज्ञ नितीन प्रधान का मुख्य सहभाग था । डॉ. तावडे के साथ श्री अमोल काळे तथा श्री शरद कळसकर के जमानत आवेदन पर युक्तिवाद करते समय पूर्व न्यायमूर्ति तथा अधिवक्ता पुष्पा गनेडीवाला एवं मुंबई उच्च न्यायालय की अधिवक्ता (श्रीमती) सिद्धविद्या का भी महत्त्वपूर्ण सहभाग था । मुंबई उच्च न्यायालय के कोल्हापुर ‘सर्किट बेंच’ ने हमें न्याय दिया है, किन्तु डॉ. वीरेंद्रसिंह तावडे को १ वर्ष ३ महीने कारागार में रहना पड़ा, उसकी क्षतिपूर्ति कभी नहीं हो सकती ।’’