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नई दिल्ली – प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रा.स्व. संघ की प्रशंसा करते हुए कहा कि, जब-जब देश पर आपदा आई, तब-तब संघ के स्वयंसेवक सबसे आगे रहे । विभाजन के दर्द के कारण लाखों हिन्दू परिवार आवासहीन (बेघर) हो गए थे । उस समय उनकी सहायता के लिए स्वयंसेवक सबसे आगे थे । यह केवल सहायता कार्य नहीं था,अपितु देश की आत्मा को दृढता देने का काम था । वर्ष 1956 के अंजार भूकंप के समय भी स्वयंसेवक सहायता कार्य में जुटे थे। प्रधानमंत्री यहां संघ के शताब्दी समारोह को संबोधित कर रहे थे । इस अवसर पर संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रय होसबाले भी उपस्थित थे । प्रधानमंत्री के हाथों संघ से संबंधित एक सिक्का एवं एक डाक टिकट प्रकाशित किया गया है । सिक्के की एक ओर राष्ट्रीय चिन्ह है, जबकि दूसरी ओर सिंह पर बैठी भारतमाता तथा संघ स्वयंसेवकों की छवि है ।
प्रधानमंत्री मोदी ने जानकारी दी कि, ‘स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार भारतीय मुद्रा पर भारतमाता की छवि प्रदर्शित की गई है । सिक्के पर संघ का ध्येय वाक्य भी है । डाक टिकट में भी राष्ट्र सेवा एवं समाज को सशक्त बनाने में निरंतर जुटे संघ स्वयंसेवकों को दर्शाया गया है । इसके लिए मैं देश को बधाई देता हूं ।’ दशहरा से संघ अपने शताब्दी वर्ष के कार्यक्रम का आरंभ कर रहा है । मोदी स्वयं संघ के प्रचारक रहे हैं एवं भाजपा में आने से पहले उन्होंने स्वयं को एक कुशल संगठक के रूप में स्थापित किया था ।
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१. लक्ष्य वही रहा – ‘एक भारत, महान भारत ।’ राष्ट्रीय सेवा की इस यात्रा में ऐसा नहीं है कि संघ पर आक्रमण नहीं हुए । स्वतंत्रता के पश्चात भी संघ को मुख्यधारा में आने से रोकने के लिए षड्यंत्र रचे गए ।
२. पूज्य गोळवलकर गुरुजी को जेल भी भेजा गया था । बाहर आने पर उन्होंने कहा था, ‘कभी-कभी जीभ दांतों के नीचे कुचल जाती है, परंतु हम दांत नहीं तोडते, क्योंकि दांत हमारे हैं, जीभ भी हमारी है ।’ पू. गोळवलकर गुरुजी ने लिखा था कि दूसरों का दुख कम करने के लिए स्वयं दुख सहना नि:स्वार्थ हृदय का लक्षण है ।

संघ राष्ट्र निर्माण करता रहा !
१. जिस मार्ग से नदी बहती है, उस मार्ग पर उसके किनारे बसे गांव समृद्ध होते हैं । संघ ने भी वही किया । जिस प्रकार एक नदी अपनी अनेक धाराओं के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों का पोषण करती है, उसी प्रकार संघ की भी हर धारा है । संघ समाज के अनेक क्षेत्रों में निरंतर काम कर रहा है । भले ही संघ की एक ही धारा विभाजित हो गई हो, परंतु उनमें कभी भी विरोधाभास उत्पन्न नहीं हुआ, क्योंकि हर धारा का उद्देश्य एवं भावना एक ही है – राष्ट्र प्रथम ।
२. प.पू. हेडगेवारजी कहा करते थे, ‘आपके पास जो है, उसे लें एवं आवश्यकतानुसार बनाएं ।’ हेडगेवारजी सामान्य लोगों को चुनकर देश के लिए तैयार करते थे ।
३. संघ के बारे में कहा जाता है कि, ‘सामान्य लोग असाधारण कार्य करने के लिए एक साथ आते हैं ।’
४. संघ ऐसी भूमि है, जहां स्वयंसेवक की अहंकार से स्वयं की ओर यात्रा आरंभ होती है । शाखा में व्यक्ति का सामाजिक एवं मानसिक विकास होता है । राष्ट्र निर्माण की भावना उनके मन में निरंतर प्रफुल्लित होती रहती है ।
५. हमारा, स्वयंसेवकों की पीढी का सौभाग्य है कि हम शताब्दी वर्ष के इतने महान अवसर के साक्षी हैं । आज, मैं राष्ट्रीय सेवा के लिए समर्पित लाखों स्वयंसेवकों को शुभकामनाएं देता हूं । मैं प.पू. हेडगेवारजी को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं ।
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