


तमिलनाडु
तमिलनाडु में ‘गोलू’ अथवा ‘कोलू’ के नाम से दशहरे का उत्सव मनाया जाता है । इस उत्सव में गुडियों को सजाकर रखने की प्रथा है । घर के पूजाघर में लकडी की ५, ७ अथवा ११ सीढियां बनाई जाती हैं । इन सीढियों को रंग-बिरंगे कपडों से सजाया जाता है, जिन्हें ‘गोंबे हब्बा’ कहते हैं । सीढियों के आसपास का स्थान भी फूलों एवं दीपों से प्रकाशित कर सजाया जाता है । देवी के रूप में कुल ९ गुडिया सजाई जाती हैं । अन्य गुडियों को ९ दिनों तक प्रतिदिन देवी के रूप में सीढियों पर रखा जाता है । देवी के रूप में स्थित ये गुडिया दुष्ट प्रवृत्तियों का नाश करती हैं, ऐसी मान्यता है ।
इस त्योहार के उपलक्ष्य में तैयार की जानेवाली गुडिया लडकी को उसके विवाह के पश्चात दी जाती हैं । कुछ सीढियों पर देवताओं की छोटी प्रतिकृतियां रखी जाती हैं । सभी देवताओं ने श्री दुर्गादेवी को महिषासुर का वध करने के लिए अपने शस्त्र दिए थे । इन सभी के सम्मान के रूप में उनकी प्रतिकृतियां रखी जाती हैं । सबसे अंतिम सीढी पर खिलौने सजाकर रखते हैं । कुछ लोगों के अनुसार मानो ब्रह्माजी द्वारा निर्मित संपूर्ण सृष्टि ही वहां अवतरित होती है ।
उत्तर प्रदेश
उत्तर प्रदेश में श्रीराम की विजय के दिवस के रूप में विजयादशमी अथवा दशहरा मनाते हैं । श्रीराम ने रावण के विरुद्ध लडने हेतु आवश्यक बल एवं शक्ति प्राप्त करने के लिए ९ दिन दुर्गा माता की आराधना की थी । उसके कारण ही श्रीराम रावण का वध कर पाए, लोगों की ऐसी मान्यता है । अनेक स्थानों पर रामलीला का आयोजन किया जाता है, साथ ही श्रीराम के जीवन पर आधारित चित्र बनाए जाते हैं ।
दशहरे के दिन उत्तर के अनेक गांवों एवं शहरों में रावण, उसके पुत्र मेघनाद तथा भाई कुंभकर्ण की बडी प्रतिकृतियों में पटाखे ठूंसकर मैदान में खडे कर उन्हें जलाते हैं । इसे अनिष्ट पर इष्ट की विजय का प्रतीक माना जाता है । अनेक स्थानों पर दशहरे के दिन यज्ञ किया जाता है ।
‘काम, क्रोध, मोह, मद, मत्सर, लोभ, चिंता, अहंकार एवं दुष्ट विचार, ये ९ अनिष्ट प्रवृत्तियां याग में जलकर नष्ट हुईं’, ऐसा माना जाता है । लोग अपनी अनिष्ट वृत्तियां नष्ट करें तथा सत्य एवं भलाई का मार्ग अपनाएं, इस यज्ञ का यही उद्देश्य रहता है ।
केरल
यहां के ठक्केग्राम के प्रसिद्ध मंदिर में मूर्ति नहीं होती, वहां एक बडा दर्पण रखा जाता है । दशहरे के दिन लोग उसके सामने झुककर खडे होते हैं तथा स्वयं की ही झुकी प्रतिमा देखते हैं । इसका अर्थ ‘स्वयं में भी भगवान हैं’, ऐसी मान्यता है !
दशहरे के एक दिन पूर्व अर्थात नवमी के दिन छोटे बच्चे मंदिर, घर अथवा विद्यालय में पुस्तकों का पूजन करते हैं । हमारे यहां जैसे छोटे बच्चे दशहरे के दिन लकडी की पटिया (स्लेट) का पूजन करते हैं, उस प्रकार केरल में भी शिक्षा आरंभ करनेवाले बच्चे अक्षर लिखना आरंभ करते हैं, जिसे ‘विद्याआरंभम्’ कहा जाता है । एक थाली में चावल का आटा फैलाकर रखा जाता है तथा बडों के मार्गदर्शन में बच्चे उंगली से अक्षर लिखते हैं ।
| विभिन्न राज्यों में मनाए जानेवाले दशहरे की जानकारी तथा विशेषतापूर्ण छायाचित्रों से इस त्योहार का आनंद लेंगे तथा स्वयं में स्थित आसुरी प्रवृत्ति का नाश कर देवी का कृपाशीर्वाद प्राप्त करेंगे ! |
आंध्र प्रदेश
इस राज्य में घर के बच्चे बडों को नमस्कार कर परस्पर अश्मंतक के पत्ते देने हैं । महिलाएं इस दिन गौरी को हल्दी-कुमकुम अर्पण करने का कार्यक्रम करती हैं, जिसे ‘बोम्यल कोलेवू’ कहते हैं । रंग-बिरंगे फूलों से थाली सजाकर उसके मध्य भाग में हल्दी का खडे आकारवाला गोला अथवा कद्दू का फूल रखते हैं । उस थाली की पूजा करते हैं तथा उसके चारों ओर नृत्य किया जाता है । इसे ‘बथकम्मा’ कहते हैं । अगले दिन इस बथकम्मा का विसर्जन किया जाता है । अनेक स्थानों पर ‘तेप्पाउत्सवम्’ अर्थात नौका उत्सव मनाते हैं । कृष्णा एवं तुंगभद्रा नदी के संगम पर यह उत्सव बडे हर्षाेल्लास के साथ मनाया जाता है । वहां फूल तथा दीपों से प्रकाशित की गई नौका में सजाई गई दुर्गादेवी की प्रतिमा रखी जाती है । इन नौकाओं को नदी से ले जाते समय उसे देखने के लिए लोगों की भीड उमड पडती है ।
असम
असम में बिहू के उपरांत दूसरा महत्त्वपूर्ण त्योहार होता है दशहरा ! असम के लोगों में यह मान्यता है कि दशहरे के दिन महादेव की पत्नी उमा पहली बार मायके आई थीं । उसी परंपरा के अनुसार नवविवाहित लडकियों को दशहरे के दिन मायके बुलाया जाता है । इतिहास के प्रमाणों के अनुसार असम के राजा प्रताप सिंह ने बंगाल की दुर्गा पूजा के विषय में बहुत कुछ सुना था तथा उन्होंने मूर्तिकला सीखने के लिए असम से पश्चिम बंगाल में अपना एक व्यक्ति भेजा तथा तभी से असम में दुर्गापूजा आरंभ हुई ।
(साभार : दैनिक ‘सकाळ’)
ओडिशा
यहां दशहरे के दिन शारदीय दुर्गापूजा होती है । दशहरे के दिन की जानेवाली पूजा को ‘अपराजिता पूजन’ कहा जाता है । इस दिन देवी को दही मिलाकर बनाया हुआ चावल, भुना हुआ आटा, मिठाई तथा तली हुई मछली का भोग लगाते हैं । विवाह के पश्चात जैसे लडकी को विदा किया जाता है, उसी प्रकार
भरी आंखों से देवी की विदाई का कार्यक्रम होता है । मूर्ति का विसर्जन करने पर लोग रावण की प्रतिकृति जलाकर ‘रावण पोडी’ मनाते हैं ।
– प्रा. शैलेजा सांगळे (साभार : दैनिक ‘सकाळ’)
| भारत के विभिन्न राज्यों में दशहरा मनाने की पद्धतियां भले ही भिन्न-भिन्न हों; परंतु उसका उद्देश्य अनिष्ट प्रवृत्ति पर शुभ प्रवृत्ति का विजय प्राप्त करना तथा उसे मनाना है; इस बात को ध्यान में लें ! |
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