क्या सऊदी अरब अपनी ‘कट्टर इस्लामी’ की छवि बदलेगा ?

‘क्रिमसन क्रिसेंट – द लास्ट क्वार्टर’ प्रसारित : डॉक्युमेंट्री फिल्म में पूछा गया प्रश्न !

‘क्रिमसन क्रिसेंट – द लास्ट क्वार्टर’ नाम की डॉक्युमेंट्री फिल्म कुछ ही दिन पूर्व प्रदर्शित हुई । राजधानी के ‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया’ में पौने दो घंटे की इस अंग्रेजी भाषा की डॉक्युमेंट्री फिल्म का प्रसारण किया गया । इस डॉक्युमेंट्री फिल्म में ‘सऊदी अरब के युवराज मोहम्मद बिन सलमान (एम.बी.एस.) क्या इस्लामी जगत में शांतिपूर्ण पद्धति से सबसे महत्त्वपूर्ण वैचारिक परिवर्तन ला सकेंगे ?’, यह प्रश्न पूछा गया है ।

इस डॉक्युमेंट्री फिल्म से प्रसिद्ध निर्देशक तथा पत्रकार मयंक जैन ने यह प्रश्न उठाया है कि अनेक दशकों से अफ्रीका, दक्षिण एशिया, साथ ही दक्षिण पूर्व एशिया में मदरसों से कट्टरतावादी वहाबी विचारधारा (वहाबी विचारधारा कुरान एवं सुन्नत में समाहित लेखन के शब्दशः अर्थों पर बल देती है) फैलानेवाला सऊदी अरब क्या अब एम.बी.एस. के नेतृत्व में कट्टर इस्लाम में सुधार लाएगा ?’ श्री. मयंक जैन इस डॉक्युमेंट्री फिल्म के लेखक एवं निर्देशक हैं । इस डॉक्युमेंट्री फिल्म का प्रसारण रॉबर्ट स्पेंसर के ‘जिहाद वॉच’, ‘संगम टॉक्स’, ‘सुदर्शन न्यूज’, नीरज अत्री के ‘पॉलिटिकली इनकरेक्ट’, ‘एपवर्ड’, ‘पॉलिटिकल अड्डा’ आदि विभिन्न प्रसिद्ध यूट्यूब वाहिनियों से किया गया है, जिसका सहस्रों लोगों से सकारात्मक प्रत्युत्तर मिल रहा है ।

इस डॉक्युमेंट्री फिल्म से संबंधित महत्त्वपूर्ण पहलू !

१. निओम : रेगिस्तान में परिवर्तन का आईना ?

मयंक जैन

वर्ष १९८९ में बर्लिन की दीवार गिराकर साम्यवादी पूर्व जर्मनी तथा लोकतांत्रिक पश्चिम जर्मनी एक हुए । उसी प्रकार सऊदी अरब के रेगिस्तान में ‘निओम’ नामक अति महत्त्वाकांक्षी तथा अति आधुनिक तकनीक को गति देनेवाली ‘स्मार्ट सिटी’ का निर्माण कर क्या सऊदी अरब कट्टरतावादी इस्लाम की दीवार में छेद करेगा ?, यह गहन प्रश्न इस डॉक्युमेंट्री फिल्म में पूछा गया है । इस ‘स्मार्ट सिटी’ के निर्माण पर डेढ ट्रिलियन डॉलर्स अर्थात ही १३१ लाख करोड रुपए का खर्चा आएगा । इसके कारण वहाबी विचारधारा के प्रसारण के लिए सऊदी अरब के पास पैसा शेष नहीं बचा है, ऐसा दावा ‘क्रिमसन क्रिसेंट’ ने किया गया है । श्री. जैन बताते हैं कि ‘निओम’ मात्र एक शहर न रहकर वह क्रांतिकारी साधन बन जाता है, साथ ही वह शांति एवं तकनीक को एकत्रित बांधकर रखता है ।

२. विभिन्न सर्वेक्षणों के द्वारा मदरसे कैसे हिंसा को प्रोत्साहन देते हैं ?, इस पर डाला गया है प्रकाश !

‘क्रिमसन क्रिसेंट – द लास्ट क्वार्टर’ एक कठिन प्रश्न पूछता है, वह यह है कि मदरसों में शिक्षा ग्रहण करनेवाले छात्रों द्वारा क्या धर्म के नाम पर हत्याएं करने की संभावना अधिक है ? ‘काँबैटिंग टेररिजम सेंटर एंड इंटरनेशनल क्राइसिस क्रायसिस ग्रुप’ द्वारा (आतंकवाद का सामना करनेवाला केंद्र तथा अंतरराष्ट्रीय संकट समूह’ द्वारा) प्रसारित ब्योरे के अनुसार इंडोनेशिया के मदरसों के ९१ प्रतिशत छात्रों ने धार्मिकता से प्रेरित गैर-मुसलमानों की हत्याओं का खुलेआम समर्थन किया । ये सभी वहां के मुख्य प्रवाह में स्थित मदरसे हैं । हिंसा की यह मानसिकता किसी विशिष्ट वर्ग तक सीमित नहीं है, अपितु सीधे जमीनी हिंसा से जुडी हुई है । इस डॉक्युमेंट्री फिल्म में वर्ष २०२४ में श्री गणेश विसर्जन के दिन भारत के १७ शहरों में निकाली गई शोभायात्राओं पर किए गए १७ समन्वित आक्रमण (Coordinated attack) मदरसों में दी जानेवाली कट्टरतावादी शिक्षा के प्रमाण हैं, ऐसा दावा किया गया है । ये अमूर्त आतंकी नहीं हैं, अपितु शिक्षा का हथियार है ।

मयंक जैन का हिन्दुत्वनिष्ठ संगठनों से आवाहन !

‘सनातन प्रभात’ ने इस डॉक्युमेंट्री फिल्म के संदर्भ में श्री. मयंक जैन से संपर्क किया । उस समय श्री. जैन ने कहा, ‘‘इस डॉक्युमेंट्री फिल्म को अधिक से अधिक समाज तक पहुंचाने हेतु हिन्दुत्वनिष्ठ संगठनों को आगे आना चाहिए । डॉक्युमेंट्री फिल्म समाजजागृति का बहुत प्रभावी माध्यम है । मैंने इस डॉक्युमेंट्री फिल्म हेतु दिन-रात एक कर काम किया है ।’’

३. मुसलमान ही बने जिहादी आतंकवाद के सबसे अधिक शिकार !

जिहादी आतंकी आक्रमणों में मारे गए लोगों में से ९१ प्रतिशत लोग मुसलमान ही हैं । यह डॉक्युमेंट्री फिल्म ‘इस्लाम की रक्षा का दावा करनेवाली विचारधारा ने वास्तव में मुसलमान जगत को ही गहरी राजनीतिक, आध्यात्मिक एवं जनसंख्या पर आधारित चोट पहुंचाई है’, यह वास्तविकता भी सामने लाती है ।

४. उघूर नरसंहार पर इस्लामी जगत का मौन, नैतिक दायित्व का पतन है !

इस डॉक्युमेंट्री फिल्म में सबसे मार्मिक विषयों में से एक है चीन के शिनजियांग प्रांत में रहनेवाले १ करोड से अधिक मुसलमानों पर चीनी शासन द्वारा किए जा रहे अमानवीय अत्याचारों के प्रति मुसलमानबहुल देशों का मौन ! इस डॉक्युमेंट्री फिल्म में इसे राजनीतिक चूक नहीं, अपितु नैतिक दायित्व का पतन कहा गया है ।


राजधानी देहली के एक मदरसे में ‘काफिर’ शब्द के विषय में पूछे जाने पर निदेॅशक को मिली धमकियां !

इस डॉक्युमेंट्री फिल्म के चित्रीकरण के लिए निर्देशक श्री. मयंक जैन ने हरियाणा के नूह, राजधानी देहली के सुंदरनगरी, साथ ही बंगाल एवं असम के कुछ क्षेत्रों का भ्रमण किया । उन्होंने वहां के घरों, मदरसों तथा शहर के आंतरिक परिसरों में कैमरे से बातचीत रेकॉर्ड की । उनके द्वारा की गई अनेक भेंटवार्ताओं ने मदरसों में शिक्षा ले रहे छात्रों ने गैर-मुसलमानों का ‘काफिर’ (अल्लाह को न माननेवाले) के रूप में सुस्पष्टता से उल्लेख किया; साथ ही ‘दावत’ (दावाह अर्थात ही गैर-मुसलमानों को इस्लाम में आमंत्रित करने का कार्य) एवं ‘जिहाद’ (गैर-मुसलमानों के विरुद्ध लडा जानेवाला युद्ध) के विषय में भी ये छात्र बोले । सुंदरनगरी में श्री. जैन जब ‘काफिर’ की संकल्पना पर आधारित विषय पर मदरसे के शिक्षकों तथा छात्रों से भेंटवार्ता करने लगते हैं, तब वहां भीड इकट्ठा होने लगती है । लोग चिल्लाने लगते हैं तथा उसके कारण भेंटवार्ता रोकनी पडती है । भीड की मानसिकता भले ही धमकी भरी हो, तब भी उसमें यह सुस्पष्ट संदेश छिपा होता है, ‘ऐसे प्रश्न पूछे नहीं जाने चाहिए ।’  इस घटना का चित्रण भी इस डॉक्युमेंट्री फिल्म में दिखाया गया है ।

५. जिहादी आतंकवाद के कारण हुई भारत की हानि का अवलोकन !

इस डॉक्युमेंट्री फिल्म में ‘एसोचेम’, ‘एशिया इकोनॉमिक्स इंस्टिट्यूट’ एवं ‘इंस्टिट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस’, इन राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा दिए आंकडों की बात की गई है ।

५ अ. अकेले मुंबई के २६/११ के आक्रमण के कारण भारत ने गंवाए ९ लाख करोड रुपए : २६/११ के मुंबई आक्रमण के कारण भारत की अर्थव्यवस्था को १०० अरब डॉलर्स का (९ लाख करोड रुपए का) घाटा हुआ । इसमें भारत ने २० अरब डॉलर्स का (१.८ लाख करोड रुपए का) विदेशी निवेश भी गंवाया ।

५ आ. ‘पीपीपी’ स्तर पर अरबों रुपए का घाटा : वर्ष २०१७ में आतंकवाद एवं सांप्रदायिक हिंसा के कारण भारत को ‘पीपीपी’ के संदर्भ में लगभग १ ट्रिलियन डॉलर्स का (८७ लाख ५० सहस्र करोड रुपए का) घाटा हुआ । यह आंकडा ‘जीडीपी’ के (सकल घरेलु उत्पाद के) लगभग ९ प्रतिशत था । वर्ष २०२० में ६४६ अरब डॉलर्स (५६ लाख २३ सहस्र करोड रुपए) घाटा हुआ । (पीपीपी अर्थात पर्चेजिंग पॉवर पैरिटी अर्थात विभिन्न देशों में कोई वस्तु खरीदने के लिए कितने पैसे देने पडते हैं ?, इसका अध्ययन कर उस जानकारी के आधार पर मुद्रा की वस्तुनिष्ठ तुलना करने की पद्धति ! इससे देश की वित्तीय उत्पादकता तथा जीवनशैली निर्धारित की जाती है ।)

५ इ. क्या सऊदी अरब हानि की भरपाई करेगा ? : इस डॉक्युमेंट्री फिल्म से यह तर्कवाद रखा गया है कि यदि सऊदी अरब इसके आगे सचमुच ही वहाबी विचारधारा को पैसों की आपूर्ति नहीं करनेवाला, तो क्या वह विगत अनेक दशकों में इस विचारधारा के कारण भारत को जो हानि पहुंची, उसकी
भरपाई करेगा ?

६. ‘क्रिमसन क्रिसेंट’ २० वर्ष पूर्व प्रदर्शित ‘द बांग्ला क्रिसेंट’ इस डॉक्युमेंट्री फिल्म की अगली वैचारिक कडी !

‘क्रिमसन क्रिसेंट – द लास्ट क्वार्टर’ डॉक्युमेंट्री फिल्म मयंक जैन द्वारा ही २ दशक पूर्व निर्देशित ‘द बांग्ला क्रिसेंट – आई.एस.आई., मदरसे एवं घुसपैठ’, इस डॉक्युमेंट्री फिल्म की अगली वैचारिक कडी है । ‘बांग्ला क्रिसेंट’ ने अब क्या होगा ?, इसकी जानकारी दी थी, जबकि ‘क्रिमसन क्रिसेंट’ ने क्या हुआ तथा अब अंततः क्या परिवर्तन हो रहा है, इसका दस्तावेजीकरण किया है । निर्भय पत्रकारिता एवं गहन ‘ग्राउंड रिपोर्टिंग’, ये दोनों इन दोनों डॉक्युमेंट्री फिल्म के महत्त्वपूर्ण पहलू हैं, ऐसा कहा जा सकता है ।

डॉक्युमेट्री फिल्म देखने के लिए – 

‘क्रिमसन क्रिसेंट – द लास्ट क्वार्टर’  फिल्म का भित्तिपत्रक