भारत को विश्वगुरु बनाने में ही संघ की सार्थकता !
नई देहली – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना भारत को केन्द्र में रखकर की गयी है । भारत को विश्वगुरु बनाने में ही संघ की सार्थकता है । जब हम हिन्दू राष्ट्र कहते हैं, तब ऐसा नहीं कि हम किसी को बाहर निकाल रहे हैं । हिन्दू राष्ट्र का सत्ता से कुछ भी संबंध नहीं है । हमें संपूर्ण हिन्दू समाज का संगठन करना है, ऐसा वक्तव्य संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित ३ दिवसीय व्याख्यानमाला के प्रथम दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक प.पू. डॉ. मोहनजी भागवत ने अपने उद्बोधन में किया । देहली के विज्ञान भवन में ‘संघ के प्रवास के १०० वर्ष – नये क्षितिज’ इस विषय पर वे बोल रहे थे ।
100 वर्ष की संघ यात्रा नए क्षितिज द्वितीय दिवस 27 अगस्त 2025 विज्ञान भवन दिल्ली https://t.co/So1z9s3aGn
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प.पू. सरसंघचालकजी द्वारा बताए गए कुछ सूत्र !
१. राष्ट्र की व्याख्या सत्ता पर आधारित नहीं है । भारत राष्ट्र की संकल्पना सत्ता से जुडी नहीं है ।
२. वर्ष १८५७ में स्वतंत्रता का प्रयास असफल होने के पश्चात भारतीयों में यह विचार आया कि राजनीतिक समझ अल्प है तथा उसी से कांग्रेस का उदय हुआ ; परंतु स्वतंत्रता के पश्चात वह वैचारिक ज्ञान का कार्य उचित रूप से कर नहीं सकी ।
“Hindu Rashtra has nothing to do with political power!” – Revered Sarsanghchalak Dr. Mohanji Bhagwat
The true purpose of the Sangh is to make India a Vishwaguru 🙏
Hindu Rashtra ≠ political power – It is about uniting society, not ruling through state authority⛳
VC –@ANI… pic.twitter.com/d4kExuQiUI
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३. डॉ. केशव बळीराम हेडगेवार तथा अन्य महापुरुषों का विश्वास था कि समाज के दुर्गुण दूर किये बिना सभी प्रयास अपूर्ण रहेंगे । वर्ष १९२५ में संघ की स्थापना कर उन्होंने संपूर्ण हिन्दू समाज का संगठन करने का उद्देश्य रखा ।
४. अन्यों का धर्मान्तरण मत करो । उनकी श्रद्धा का भी सम्मान करो, अपमान मत करो । जिनके पास यह परंपरा है, यह संस्कृति है, वही हिन्दू हैं । ‘हिन्दू’ का अर्थ सर्वसमावेशकता है ।
५. ‘हिन्दू’ शब्द का अर्थ केवल धार्मिक नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति दायित्व की भावना भी है । जो भारतमाता तथा उसके पूर्वजों पर विश्वास रखता है, वही सच्चा हिन्दू है । कुछ लोग स्वयं को हिन्दू मानते हैं, कुछ स्वयं को भारतीय अथवा सनातनी कहते हैं । शब्द बदल सकते हैं ; किन्तु भक्ति एवं श्रद्धा की भावना एक ही है ।
६. भारत की एकता का रहस्य उसके भूगोल, संसाधन एवं सतत आत्मपरीक्षण की परंपरा में छुपा है । हमने भीतर झांक कर सत्य की खोज की है ।
७. हम ऐसा नहीं कहते कि केवल स्वयं को हिन्दू कहो । हम कहते हैं कि तुम हिन्दु हो । ४० सहस्र वर्ष पूर्व से भारतवासियों का डी.एन्.ए. समान है । जो स्वयं को हिन्दू कहते हैं, उन्हें अपना जीवन श्रेष्ठ बनाना चाहिए । जो अभी नहीं कहते, वे भी कहने लगेंगे ।
८. संघ व्यक्तिगत समर्पण पर चलता है । वह बाह्य स्रोतों पर आश्रित नहीं है । विचार, मूल्य एवं आचरण को उचित रखने का हमारा प्रयास है ।

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