नाइजीरिया अफ्रीका के पश्चिमी तट पर स्थित देश है । वर्तमान समय में नाइजीरिया में विभिन्न प्रकार के संघर्ष चल रहे हैं, जिनमें धार्मिक, वांशिक तथा भूमि के स्वामित्व पर आधारित संघर्षों का समावेश है । इन संघर्षों में ‘बोको हरम’ जैसे आतंकी गुटों के कारण होनेवाले आक्रमण तथा फूलानी चरवाहों (मुसलमान) तथा हाऊसा किसान (ईसाई) के मध्य का विवाद प्रमुख हैं । इसके अतिरिक्त राजनीतिक अस्थिरता तथा संसाधनों के लिए होनेवाले संघर्ष के कारण देश में सामाजिक एवं राजनीतिक अस्थिरता बढी है । नाइजीरिया में चल रहा धार्मिक संघर्ष एक अत्यंत जटिल तथा दीर्घकालीन विषय है । वह केवल आतंकी संगठन ‘बोको हरम’ तक सीमित नहीं है, अपितु उत्तर एवं दक्षिण क्षेत्रों में चल रहे धार्मिक, सामाजिक एवं राजनीतिक तनाव का सूचक है ।

१. नाइजीरिया की धार्मिक रचना
नाइजीरिया का उत्तरी क्षेत्र अर्थात उत्तर नाइजीरिया मुख्य रूप से मुसलमानबहुल क्षेत्र है । यहां शरिया कानून लागू है, जबकि दक्षिण नाइजीरिया ईसाईबहुल है । नाइजीरिया का मध्यभाग इन दोनों धर्मसमूहों का संयुक्त भाग है; परंतु यह क्षेत्र अतिसंवेदनशील होने से यहां निरंतर संघर्ष चलता रहता है । इसका अर्थ यहां मुसलमान एवं ईसाई समान बल के हैं, इसलिए बार-बार हिंसक संघर्ष होता रहता है । ईसाई एवं मुसलमान समुदाय जब एक-दूसरे पर आक्रमण करते हैं, उसके उपरांत उनके अन्य गुट उसका प्रतिशोध लेते हैं । इसके परिणामस्वरूप हिंसक घटनाएं किसी शृंखला की भांति चलती रहती हैं ।
२. धार्मिक संघर्ष के प्रमुख प्रकार
अ. ‘बोको हरम’ का इस्लामी आतंकवाद : ‘बोको हरम’ नामक इस्लामी आतंकी संगठन के द्वारा मुख्यरूप से ईसाईयों पर आक्रमण किए जाते हैं । इनमें चर्च जलाने एवं विद्यालयीन ईसाई लडकियों का अपहरण कर उनका बलपूर्वक धर्मांतरण करने की घटनाएं होती हैं । मुख्य बात यह है कि ईसाईयों तथा ईसाई विद्यालयों पर गोलीबारी कर अनेक लोगों को मारा जाता है । कुछ क्षेत्रों में मुसलमान विरोधियों को भी लक्ष्य बनाया जाता है; क्योंकि वे ‘यथार्थरूप से मुसलमान’ नहीं हैं, ऐसा ‘बोको हरम’ का मानना है ।
आ. फूलानी गोपालक बस्ती एवं किसानों के मध्य संघर्ष : प्रमुखता से फूलानी मुसलमान गोपालक (चरवाहा) समुदाय एवं ईसाई किसानों के मध्य संघर्ष होता है । भले ही ये संघर्ष धार्मिक हों, तब भी उसके पीछे भूमि का स्वामित्व, जलस्रोत तथा स्थानांतरण के भेद हैं । नाइजीरिया में किसान एवं चरवाहों के मध्य भूमि के विषय पर पिछले अनेक वर्षाें से विवाद चल रहे हैं । उसके कारण बडे स्तर पर हिंसा एवं प्राणहानि हुई है । वर्ष २००९ से वर्ष २०२४ तक ९० सहस्र से अधिक लोग इस हिंसा में मारे जा चुके हैं, जबकि ३० लाख से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं । ये आंकडे निरंतर बढते ही जा रहे हैं ।
३. राजनीतिक एवं धार्मिक राजनीति
अनेक बार राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने अथवा उसे टिकाए रखने के लिए धर्म का उपयोग किया जाता है । धर्म के नाम पर किसी रणनीति की भांति हिंसा कराई जाती है । नाइजीरिया में चल रहा धार्मिक संघर्ष केवल आस्था अथवा धर्म के भेदभाव के कारण नहीं हो रहा है; अपितु उसमें सत्तासंघर्ष, सामाजिक अन्याय, भूमि का वितरण एवं सांस्कृतिक विविधता, इन अनेक घटकों का मिश्रण है ।

४. संघर्ष के कारण
अ. नाइजीरिया प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध है । अतः संसाधनों पर अपना नियंत्रण स्थापित करने के लिए, साथ ही उनके उपयोग पर आधारित संघर्ष होते हैं ।
आ. नाइजीरिया में राजनीतिक अस्थिरता है । उसके कारण सामाजिक एवं आर्थिक समस्याएं बढी हैं तथा परिणामस्वरूप संघर्ष बढा है ।
इ. गरीबी एवं बेरोजगारी के कारण युवकों में असंतोष है, जिसके कारण वे संघर्ष के पथ पर चल पडे हैं ।
ई. संघर्ष के कारण नाइजीरिया में सामाजिक एवं राजनीतिक अस्थिरता बढी है ।
उ. संघर्ष के कारण देश की अर्थव्यवस्था को बहुत हानि पहुंची है । इस संघर्ष में मानवाधिकार के उल्लंघन की अनेक घटनाएं हुई हैं ।
इसका तात्पर्य यह है कि नाइजीरिया में कार्यरत भले ही छोटे-बडे गुट हों; परंतु तब भी प्रमुखता से ये आक्रमण चरवाहों के गुट तथा ईसाई किसानों के मध्य हो रहे हैं । जब मुसलमानों पर आक्रमण होते हैं, तो उसके विरुद्ध लडने के लिए यहां कुछ आतंकी गुट बने हैं; उसके कारण ईसाई लोग यहां मार खाते हैं । ईसाई किसान भी हथियारों से सुसज्जित हैं तथा आक्रमणों का प्रतिकार करते हैं; परंतु तब भी चरवाहा समूह घुमंतू है, तो वह कब किस गांव पर आक्रमण करेगा, इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता । इसका अर्थ यह है कि इस संघर्ष के कारण भूमि का स्वामित्व, कृषिभूमि का स्वामित्व जैसे भिन्न-भिन्न हों, तब भी अब इस संघर्ष ने धार्मिक रूप धारण किया है । इसलिए नाइजीरिया के नागरिकों को अमानवीय पद्धति से मारे जाने के वीडियो सामाजिक माध्यमों में देखने को मिलते हैं ।
५. उपाय एवं बाधाएं
सरकारी व्यवस्था में पक्षपात एवं भ्रष्टाचार होने के कारण न्याय प्राप्त करना यहां कठिन होता है । समाज के धार्मिक नेता तथा स्वयंसेवी संगठन इस संघर्ष को शांत करने हेतु काम करते रहते हैं; परंतु गरीबी, बेरोजगारी तथा अशिक्षा इस संघर्ष की जड हैं । इसलिए विभिन्न गुटों में संवाद स्थापित करना तथा परामर्श (काउंसिलिंग) की प्रक्रिया चलाना आवश्यक है । सुरक्षाबलों को सक्षम बनाने तथा आतंकवाद का सामना करने हेतु उपाय करना आवश्यक है ।
६. ‘बोको हरम’ की हिंसा का स्वरूप
अ. ‘बोको हरम’ ने नाइजीरिया तथा आसपास के देशों (उदा. चाड, नाइजर एवं कैमेरून) में बडे स्तर पर हिंसा फैलाई है ।
आ. ‘बोको हरम’ ने अभी तक सहस्रों ईसाई लोगों को मारा है, जिनमें सामान्य नागरिक, बच्चों तथा महिलाओं का समावेश है । उन्होंने अनेक गांवों पर आक्रमण कर लोगों को मारा है, साथ ही घरों एवं प्रार्थनास्थलों में आग लगा दी है ।
इ. अपहृत महिलाओं एवं बच्चों का उपयोग गुलामों के रूप में अथवा आत्मघाती आक्रमणों के लिए किया जाता है ।
ई. ‘बोको हरम’ का एक गुट आत्मघाती आक्रमण करता है, जिसमें छोटे बच्चों का भी उपयोग किया जाता है ।
उ. ‘बोको हरम’ सुरक्षा बलों तथा पुलिस थानों पर प्राणघातक आक्रमण करता है ।
महत्त्वपूर्ण धार्मिक संघर्ष की घटनाओं के उदाहरण सारणी

उक्त सूची बहुत छोटी है । १९६० के दशक से वहां अनेक गुटों में बार-बार हिंसक संघर्ष हुआ है, जिसमें अनेक लोग मारे गए हैं । – श्री. यज्ञेश सावंत
७. ‘बोको हरम’ के आक्रमण के परिणाम
इस संगठन के आक्रमणों के कारण अब तक ३५ सहस्र से अधिक लोग मारे जा चुके हैं, जबकि २० लाख से अधिक लोगों को अपना घर-बार छोडकर विस्थापित होना पडा है । इसके कारण नाइजीरिया में मानवीय संकट उत्पन्न हुआ है । हिंसा का सामना करनेवाले लोगों पर विशेषकर बच्चों पर गंभीर मानसिक परिणाम होते हैं । इस हिंसा के कारण निरंतर भय के वातावरण में रहने के कारण यहां के बच्चों को बुरे स्वप्न आना, भूख न लगना तथा पढाई पर ध्यान केंद्रित करना संभव न होना जैसी समस्याएं सताती हैं । यहां के कुछ बच्चों में आत्महत्या के भी विचार दिखाई दिए हैं । विद्यालयों पर आक्रमण होने के कारण बच्चों की पढाई में बडी बाधा उत्पन्न हुई है ।
श्री गुरुचरणार्पणमस्तु ।
– श्री. यज्ञेश सावंत, सनातन संकुल, देवद, पनवेल. (१३.७.२०२५)
आतंकी संगठन ‘बोको हरम’ की जानकारी‘बोको हरम’ नाइजीरिया का एक इस्लामी आतंकी गुट है, जिसका उद्देश्य नाइजीरिया में इस्लामी शरिया कानून लागू करना है । इस गुट ने विगत २ दशकों में सहस्रों लोगों को मारा है तथा लाखों लोगों को विस्थापित किया है । वर्ष २००२ में मोहम्मद यूसुफ ने ‘बोको हरम’ की स्थापना की । इस संगठन का उद्देश्य है, पश्चिमी शिक्षा एवं संस्कृति का विरोध करना । (‘बोको हरम’ अर्थात पश्चिमी शिक्षा त्याज्य है ।) मुसलमान एवं ईसाईयों के मध्य हिंसक संघर्ष का आरंभ वर्ष २००९ में पुलिस द्वारा मोहम्मद यूसुफ को मारे जाने के उपरांत हुआ । यूसुफ को मार दिए जाने के उपरांत ‘बोको हरम’ गुट और हिंसक बन गया । यूसुफ की मृत्यु के उपरांत अबू बकर शेकाऊ ने ‘बोको हरम’ का नेतृत्व अपने हाथ में लिया । वर्ष २०१४ में इस संगठन ने चिबोक में २७६ विद्यालयीन ईसाई लडकियों का अपहरण किया, जिसकी पूरे विश्व में निंदा की गई । इसके कारण इस संगठन का नाम विश्व स्तर पर पहुंचा । नाइजीरिया में ‘बोको हरम’ एवं ‘आई.एस.डब्लू.ए.पी.’ (इस्लामिक स्टेट वेस्ट अफ्रिका प्रोविंस), इन २ आतंकी संगठनों में भी संघर्ष चलता रहता है । यह संघर्ष प्रांत एवं भूभाग पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए होता है । नाइजीरिया की सरकार तथा अंतरराष्ट्रीय सेना बलों ने अनेक बार इन गुटों पर कार्यवाही की है; तब भी ये दोनों गुट सक्रिय हैं । – श्री. यज्ञेश सावंत |
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