सनातन संस्था के संस्थापक सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी का ८३ वां जन्मोत्सव एवं सनातन संस्था का रजत महोत्सव इस निमित्त १७ से १९ मई की अवधि में गोवा के फर्मागुडी स्थित अभियांत्रिकी महाविद्यालय के मैदान में ‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ संपन्न हुआ । उसे भारतभर में बडे स्तर पर प्रसिद्धि दी गई; परंतु गोवा के कुछ प्रसार माध्यमों ने इसकी आलोचना कर सनातनद्वेष की खुजली से आराम पा लिया । गोवा के ‘द गोवन’ इस अंग्रेजी समाचारपत्र ने १८ मई के संपादकीय में सनातन संस्था की आलोचना की है । उसका खंडन यहां दिया है ।

१. गोवा के मुख्यमंत्री कार्यक्रम में उपस्थित रहने से ‘द गोवन’ को पेट में दर्द !
आलोचना : सनातन संस्था के संस्थापक जयंत आठवलेजी के ८३ वें जन्मोत्सव निमित्त आयोजित किए गए सनातन संस्था के २५ वें वर्धापन दिन समारोह में गोवा के मुख्यमंत्री डॉ. प्रमोद सावंत शनिवार को उपस्थित रहे । दो मंत्री, उत्तर गोवा के सांसद एवं राज्य भाजपा अध्यक्ष सहित संपूर्ण सरकारी पदाधिकारियों सहित सावंत की उपस्थिति यह गोवा सरकार ने तीव्र दक्षिणपंथी विचारधारा के संगठन को दी हुई कदाचित् पहली अधिकृत मान्यता है । मानो इतना कम हो, प्रमोद सावंत ने सनातन संस्था विश्वभर में कर रहे कार्य की मन भरकर स्तुति की ।
खंडन :
१. सनातन संस्था अध्यात्म, समाजसहाय्य, राष्ट्ररक्षण एवं धर्मजागृति इन क्षेत्रों में काम करनेवाली एक आध्यात्मिक संस्था है, जो गत २५ वर्षों से गोवा सहित संपूर्ण भारत में कार्यरत है । इस संस्था का कार्य देखकर ही मुख्यमंत्री एवं अन्य मंत्रीगण इस कार्यक्रम में उपस्थित रहे हैं । आप भी व्यर्थ में ‘दक्षिणपंथी विचारधारा की संस्था’ ऐसा रटते रहने के स्थान पर सनातन संस्था का कार्य जानने का कष्ट करें ।
२. सनातन संस्था का कार्य वैश्विक है । सनातन के साधना साधना से विश्वभर के सैकडों लोगों का जीवन प्रकाशमान हुआ है; परंतु सनातनद्वेष की पट्टी बांधे ‘द गोवन’ को पेट में दर्द उठा है ।

२. न्यायालय से स्वयं को श्रेष्ठ समझकर सनातन संस्था को कटघरे में खडा करनेवाला ‘द गोवन’ !
आलोचना : उसके अनुयायी एवं पूर्व अनुयायियों पर आरोप लगाए गए हैं एवं कुछ प्रकरणों में उन्हें हिंसा के कृत्यों के लिए दोषी ठहराया गया है, जो सरकारों को इस संगठन से दूरी बनाने में सहायक सिद्ध हुए ।
खंडन : सनातन के अनुयायी किसी भी हिंसा के कृत्य के लिए दोषी सिद्ध नहीं हुए हैं । न्यायालय ने सनातन के अनुयायियों को दोषमुक्त करते समय जांच एजेंसियों पर कडी टिप्पणी की है । लेखक को न्यायालय के निर्णय जांचने चाहिए ।
३. सनातनद्वेष के कारण सनातन संस्था की पाकिस्तान से तुलना करनेवाला ‘द गोवन’
आलोचना : निःसंदेह इस संगठन ने किसी भी हिंसक आक्रमणों में सहभाग से अस्वीकार किया है एवं ऐसा दावा किया है कि, दोषी सिद्ध हुए एक तो अब उससे संबंधित नहीं थे अथवा उससे संबंधित सभी को निर्दोष मुक्त किया गया है; पाकिस्तान ने भी भारत में प्रत्येक आतंकवादी आक्रमण में स्वयं की सहभागिता से इनकार किया है । इसलिए पाकिस्तान के समान ही सनातन के प्रत्येक नकार की वस्तुनिष्ठता से जांच की जानी चाहिए ।
खंडन : किसी हिंसक कार्रवाइयों में सनातन संस्था ने उस पर लगे आरोपों को ठुकराना एवं पाक ने उस पर लगे आतंकवादी कार्रवाइयों के आरोपों को ठुकराना इनमें जमीन-आसमान का अंतर है । सनातन संस्था किसी हिंसक कार्रवाइयों में लिप्त होने के कोई भी प्रमाण भारत की किसी भी अन्वेषण एजेंसियों को नहीं मिले हैं; परंतु पाकिस्तान भारत में आतंकवादी कार्रवाइयां कर रहा है, इसके अनेक प्रमाण भारत सरकार के पास हैं । इसलिए राष्ट्ररक्षण एवं धर्मजागृति करनेवाली एक संस्था की पाकिस्तान से तुलना करना, यह ‘द गोवन’ का बौद्धिक दिवालियापन है ।
४. न्यायालय से स्वयं को समझदार समझनेवाला ‘द गोवन’ !
आलोचना : कानून की दृष्टि से सनातन संस्था बमविस्फोट, अनेक हत्याएं एवं भूतकाल में हुए हिंसा के कृत्यों के लिए कुछ मात्रा में नकारात्मकता का दावा कर सकती है; परंतु सार्वजनिक स्मृति कायम है । प्रमाणों के अभाव में निर्दोष मुक्तता यह निर्दोषिता का प्रमाणपत्र नहीं है । हत्या के प्रकरण में यदि मुख्य आरोपी की निर्दोष मुक्तता हुई, तो इसका अर्थ यह नहीं कि हत्या नहीं हुई अथवा ‘किसी ने भी’ हत्या नहीं की ।
खंडन : मडगांव विस्फोट के प्रकरण में ‘अन्वेषण एजेंसियों द्वारा सनातन को फंसाने का प्रयास किया गया’, ऐसी कडी टिप्पणी की गई है । ‘द गोवन’ इसे जानबूझकर अनदेखा कर रहा है । न्यायाधीशों की भूमिका में व्यवहार करनेवाले संपादकों का न्याय व्यवस्था पर विश्वास नहीं है, यही इससे स्पष्ट होता है । प्रमाणों के अभाव में निर्दोष मुक्तता यह निर्दोषिता का प्रमाणपत्र नहीं, ऐसा कहनेवालों को ‘हिन्दू आतंकवाद’ दिखाने के लिए सनातन पर आरोप लगाने के साथ साध्वी प्रज्ञासिंह, कर्नल पुरोहित जैसे लोगों को भी फंसाने के पीछे मुसलमान समर्थकों का षड्यंत्र था, यह ध्यान में लेना चाहिए ।
५. गोवा के कोई भी पूर्व मुख्यमंत्री संस्था द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में उपस्थित नहीं रहे अथवा मंच पर दिखाई भी नहीं दिए ।
(इसलिए वर्तमान मुख्यमंत्री को उपस्थित नहीं रहना चाहिए, ऐसा है क्या ? ऐसे में अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य की भाषा बोलनेवालों को यह समझ में नहीं आता क्या ? – संपादक)
६. गोमंतक भूमि के मूल्यों की चिंता करनेवालों को गोवा में हो रहे संस्कृति के ह्रास के विषय में बोलना चाहिए !
आलोचना : राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में संस्था द्वारा आयोजित कार्यक्रम में सावंत की उपस्थिति यह अनुचित संकेत देती है । अपने धर्म, संस्कृति एवं स्थानीय धार्मिक प्रथाओं की विविधता को महत्त्व देनेवाले राज्य में ऐसे मूल्यों को संकट उत्पन्न करनेवाले लोगों का समर्थन करने से अधिक अपमानजनक कुछ भी नहीं हो सकता है ।
खंडन :
१. समाज एवं राष्ट्र की उन्नति के लिए कार्यरत संस्था के कार्यक्रम में मुख्यमंत्रियों का उपस्थित रहना यह उनकी समाज एवं राष्ट्र के प्रति उनकी तत्परता दर्शाता है ।
२. गोमंतकभूमि के नीति मूल्यों की चिंता करनेवाले ‘द गोवन’ को नशीले पदार्थों की तस्करी,संस्कृति के विरुद्ध कार्यक्रमों के कारण मूल्यों का होनेवाला ह्रास, बांग्लादेशी घुसपैठियों की बढती संख्या के कारण गोमंतकभूमि के मूल्यों का होनेवाला अधःपतन अपमानजनक नहीं लगता क्या ?
३. पुराने गोवा में शवप्रदर्शन भी विवादास्पद है । कुछ लोग उसे आतंकवादियों का अभ्युत्थान भी कहते हैं । वहां राज्य स्तर पर सभी व्यवस्थाएं उपलब्ध कराई जाती हैं । इस विषय में ‘द गोवन’ कुछ बोलेगा क्या ? अथवा यह सही है ?
साधकों को स्वभावदोष एवं अहं के निर्मूलन की प्रक्रिया सिखाकर स्वसूचनाओं के द्वारा स्वभावदोषों पर विजय प्राप्त करने का मार्गदर्शन करनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी !
राष्ट्ररक्षार्थ मुंबई में ‘श्री राजमातंगी महायज्ञ’ संपन्न !
अधिक मास के निमित्त निरंतर धर्मप्रसार का कार्य करनेवाले सनातन के आश्रमों को अन्नदान देकरपुण्यसंचय के साथ ही आध्यात्मिक लाभ भी प्राप्त करें !
मंदिरों के प्रतिनिधियों एवं हिन्दुओं का संगठन आवश्यक ! – रमेश शिंदे, राष्ट्रीय प्रवक्ता, हिन्दू जनजागृति समिति
Raja Matangi Yadnya : राष्ट्ररक्षार्थ मुंबई में हुआ ‘श्री राजमातंगी महायज्ञ’ !
Shri Rajamatangi Mahayagya : राष्ट्र की अभिवृद्धि के लिए १७ मई को मुंबई में होगा श्री राजमातंगी महायज्ञ !