प्रकृति का शाश्वत नियम है कि जिसका जन्म या निर्माण हुआ है, उसका अन्त निश्चित है और अन्त के पश्चात् पुनः जन्म या सृजन भी निश्चित है । श्रीमद्भगवद्गीता का सिद्धान्त है :
“जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च (२/२७)” अर्थात् जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु निश्चित है, और जो मर गया है, उसका जन्म भी निश्चित है । इस ब्रह्मांड में यह निर्माण-अन्त-निर्माण का चक्रीय क्रम प्रत्येक बड़े-छोटे, सजीव-निर्जीव इकाई में अनवरत चलता रहता है किन्तु, यह निर्माण और अन्त आकस्मिक रूप से नहीं होता है, अपितु इसकी एक निश्चित प्रक्रिया और शृंखला है। आचार्य यास्क रचित निरुक्त नामक वेदांग में इस सम्बन्ध में आचार्य वार्ष्यायणि ने छः प्रकार के भाव निश्चित किये हैं-: षडभावविकाराः भवन्तीति वार्ष्यायणि:। जायतेऽस्तिविपरिणमतेवर्धतेऽपक्षीयतेविनश्यतीति (निरुक्त १.१२)। अर्थात् प्रत्येक बड़े-छोटे, सजीव-निर्जीव इकाई का जन्म या निर्माण होता है, और वह इकाई रहता है, बढ़ता है, बदलता है, क्षीण होता है, और अन्त में नष्ट हो जाता है ।
क्या इस विश्व का निर्माण हुआ है और इसका अन्त होगा ?![]() हाँ । इस सृष्टि या विश्व का निर्माण आदि कल्प में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को हुआ है और उपर्युक्त प्राकृतिक नियमानुसार समय इसका अन्त भी होगा। |
क्या इस विश्व का अन्त शीघ्र होने वाला है ?
अनेक ब्रह्माण्ड विज्ञानियों ने, परा विज्ञानियों ने, ज्योतिर्विदों ने और रहस्यवादियों ने इस प्रश्न का उत्तर अपने-अपने अनुसार देने का प्रयास किया है और आज भी यह प्रश्न प्रासंगिक है और अनेक उत्तर समय-समय पर आते रहते हैं और कई बार तो इस प्रश्न के उत्तर मानव समाज में संशय की स्थिति उत्पन्न कर देते हैं और ऐसा लगता है कि विश्व शीघ्र ही समाप्त होने वाला है किन्तु, यह प्रश्न भी प्रासंगिक है कि इस सम्बन्ध में सत्यता क्या है और शास्त्र सम्मत विचार क्या है ।
सनातन हिन्दू शास्त्रों में चतुर्युग के रूप में काल गणना की एक निश्चित पद्धति सर्वमान्य है जिसके अनुसार सतयुग का समय ३४,५६००० वर्ष, त्रेतायुग का समय १७,२८००० वर्ष, द्वापरयुग का समय ०८,६४००० वर्ष और कलयुग का समय ०४,३२००० वर्ष बताया गया है। अब यहाँ दृष्टव्य है कि कलयुग के समय ०४,३२००० में से अभी केवल ०५,१२६ वर्ष ही व्यतीत हुये है और कलयुग अपने प्रारम्भिक काल में ही है। प्रत्येक युग में ईश्वर का पूर्ण और ऋषि-मुनियों के रूप में सूक्ष्म अवतार होता है और ये अवतार उस युग में क्षरित हो चुके धार्मिक, सामाजिक और मानवीय मूल्यों की पुनः स्थापना कर देश-काल-परिस्थिति के अनुसार नये शास्त्रों की रचना और तत्त्कालिन प्रचलित शास्त्रों में परिमार्जन करते हैं ।
चतुर्युगों में कलयुग सबसे छोटा युग है और इस युग में धार्मिक, सामाजिक और मानवीय मूल्यों का तेजी से क्षरण होता है और युगान्त में ये अपने निम्न एवं निम्नतम स्तर को स्पर्श करते हैं । इसी बीच साधु-सन्तों के रूप में ईश्वर का सूक्ष्म अवतार और कल्कि भगवान के रूप में ईश्वर का पूर्ण अवतार भी होगा जो तत्कालीन समाज में क्षरित हो चुके धार्मिक, सामाजिक और मानवीय मूल्यों की पुनः स्थापना करेंगे और कलयुग को उसके समय ०४,३२००० वर्ष तक संरक्षित करेंगे । इस बीच मानव समाज कई बार अत्यन्त प्रतिकूल एवं दुःखद परिस्थितियों का सामना करेगा और कलयुग के अन्त में प्रलय के साथ इस चतुर्युग की समाप्ति होगी और नये चतुर्युगीय चक्र का आरम्भ होगा । इस प्रकार शास्त्रीय सिद्धान्तों और गणनाओं से स्पष्ट है कि विश्व शीघ्र समाप्त होने वाला नहीं है । अतः भय करने की कोई आवश्यकता नहीं है, बल्कि विश्व युद्ध, परमाणु युद्ध, प्राकृतिक आपदा जैसे प्रतिकूल और दुःखद परिस्थितियों का सामना करने के लिये साधना एवं साधन सम्पन्न तथा शास्त्र एवं शस्त्र सम्पन्न होना अत्यन्त आवश्यक है।
– ज्योतिषाचार्य डॉ अशोक कुमार मिश्र, सभापति (एशिया चैप्टर ), विश्व ज्योतिष महासंघ, पाटलीपुत्र, बिहार


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