
मुंबई – नागपुर स्थित भोसले घराने के संस्थापक और छत्रपति शाहू महाराज के समय के शूरवीर मराठा सरदार रघुजी भोसले की ऐतिहासिक तलवार लंदन में हुई नीलामी में महाराष्ट्र शासन को प्राप्त हुई है । इस संबंध में राज्य के सांस्कृतिक कार्य मंत्री श्री आशीष शेलार ने जानकारी दी । आशीष शेलार ने इस विषय में मुख्यमंत्री श्री देवेंद्र फडणवीस से चर्चा कर ऐतिहासिक तलवार की नीलामी में भाग लिया और यह तलवार प्राप्त की ।
तलवार की कीमत सहित उसे भारत लाने, बीमा आदि का कुल खर्च ₹४७ लाख १५ सहस्त्र अनुमानित है । नागपुर के भोसले परिवार की सन् १८१७ में सीताबर्डी में ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध लडाई हुई थी । इस युद्ध में ईस्ट इंडिया कंपनी की जीत के बाद कंपनी ने नागपुर के भोसले खजाने की लूट की थी । नागपुर का राज्य जब ब्रिटिशों के अधीन हुआ, तब इस राज्य की ओर से ईस्ट इंडिया कंपनी को समय-समय पर उपहार और नजराने दिए गए थे । जानकारों के अनुसार, इसी प्रक्रिया में यह तलवार लंदन पहुँची होगी, ऐसा अनुमान व्यक्त किया जा रहा है ।
तलवार की विशेषताए
यह तलवार मराठा शैली की ‘फिरंग’ प्रकार की तलवार का उत्तम उदाहरण है । यह तलवार सीधी, एकधारी है और इसकी मूठ ‘मुल्हेरी घाट’ की बनी हुई है, जिस पर सोने की नक्काशी की गई है । तलवार का फौलादी हिस्सा यूरोपीय निर्माण का है, जिस पर निर्माता कंपनी का नाम है । यूरोपीय लोहा उस समय मध्ययुगीन भारत के उच्च वर्गों में प्रसिद्ध था । तलवार की पीठ पर नीचे की ओर ‘श्रीमंत रघुजी भोसले सेनासाहिबसुभा फिरंग’ ऐसा देवनागरी में सोने से लिखा गया है । यह जानकारी इस ओर संकेत करती है कि यह तलवार रघुजी भोसले के लिए बनाई गई थी या उनके उपयोग में रही होगी । तलवार की मूठ पर सोने से की गई कोफ्तगिरी की सुंदर नक्काशी है । तलवार का यूरोपीय फौलाद अठारहवीं सदी के भारत में अंतरराष्ट्रीय शस्त्र व्यापार की ओर भी संकेत करता है । |
सरदार रघुजी भोसले का पराक्रम !![]() सरदार रघुजी भोसले (कालावधि – सन् १६९५ से १४ फरवरी १७५५) के शौर्य और युद्धनीति से प्रसन्न होकर छत्रपति शाहू महाराज ने उन्हें ‘सेनासाहिबसुभा’ की उपाधि प्रदान की थी । रघुजी भोसले प्रथम ने सन् १७४५ और सन् १७५५ में बंगाल के नवाब के विरुद्ध युद्ध अभियानों का नेतृत्व कर मराठा साम्राज्य का विस्तार बंगाल और ओडिशा तक किया । दक्षिण भारत में कुड्डप्पा के नवाब और कर्नूल के नवाब को पराजित कर उन्होंने दक्षिण भारत में भी मराठों की धाक स्थापित की । १८वीं सदी के अत्यंत साहसी मराठा सेनानी के रूप में रघुजी भोसले को जाना जाता है । |


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