‘सनातन धर्म में सूर्य की नित्य उपासना करने के लिए कहा गया है । उसके अनुसार ‘सूर्य को अर्घ्य कैसे देना चाहिए ?’, इस संदर्भ में निम्न विश्लेषण दिया गया है ।
१. सूर्य को अर्घ्य कौन दे सकता है ?
ये चार्घ्यं सम्प्रयच्छन्ति सूर्याय नियतेन्द्रियाः ।
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः स्त्रियः शूद्राश्च संयताः ।।
– ब्रह्मपुराण, अध्याय २८, श्लोक ३७
अर्थ : इंद्रियसंयमन करनेवाले ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र एवं महिलाएं सूर्य को अर्घ्य समर्पित करती हैं ।
अर्थात इंद्रियसंयमन (साधना) करनेवाले प्रत्येक मनुष्य को सूर्य को अर्घ्य देने का अधिकार है ।
१ अ. स्त्रियों के लिए नियम : स्त्री मासिक धर्म के ५ वें दिन से सूर्य को अर्घ्य दे ।’
(साभार – ‘सनातन धर्म’ यूट्यूब चैनल)

२. अर्घ्य देने के लिए उपयुक्त स्थान
‘जलेष्वर्घ्यं प्रदातव्यं जलाभावे शुचिस्थले ।
सम्प्रोक्ष्य वारिणा सम्यक्ततोऽर्घ्यं तु प्रदापयेत् ।।
अर्थ : अर्घ्य पानी में (जलाशय में) दें । पानी न हो, तो पवित्र स्थान पर दें । वहां पानी से प्रोक्षण कर उचित पद्धति से अर्घ्य दें ।
सूर्य को किसी जलाशय के पास, किसी नदी के तट पर, मंदिर में अथवा घर की छत पर अर्घ्य दें । घर की गैलरी अथवा घर में तांबा, कांस्य अथवा अन्य धातु के बर्तन में सूर्य को अर्घ्य दिया जा सकता है ।
३. अर्घ्य कब देना चाहिए ?
प्रातःकाल में सूर्योदय के उपरांत २ घंटे के भीतर सूर्य को अर्घ्य दें । सूर्याेदय के २ घंटे उपरांत सूर्य को अर्घ्य दिया गया, तो उसके प्रायश्चित के रूप में १ प्रायश्चित अर्घ्य देना पडता है । ऐसे में आरंभ में १ प्रायश्चित अर्घ्य देकर सूर्य से क्षमायाचना कर तत्पश्चात सूर्य को ३ बार अर्घ्य दें ।
४. अर्घ्य देने के लिए आवश्यक सामग्री
‘गन्धाक्षतपुष्पयुक्तानि त्रीण्यर्घाणि दद्यात् ।’ अर्थात ‘चंदन, अक्षत एवं पुष्पसहित तीन अर्घ्य दें ।’
५. अर्घ्य देने की कृति
अ. पूर्व दिशा की ओर मुख कर सूर्य की दिशा में अर्घ्य दें । घर से सूर्य दिखाई न दे अथवा बादल होने के कारण सूर्य दिखाई न दे, तब भी पूर्व दिशा की ओर मुख कर सूर्य को अर्घ्य दें ।
आ. घर में सूर्य को अर्घ्य देने के लिए विशिष्ट स्थान न हो, तो घर में हम जहां पूजा करते हैं, उस स्थान पर खडे रहकर भूमि पर तांबा अथवा कांस्य (ब्राँज) का बरतन रखकर उसमें अर्घ्य दें ।
इ. अंजुली में पानी लेकर अथवा हाथ में पानी से युक्त धातु का बरतन लेकर विनम्रतापूर्वक अर्थात थोडासा नीचे झुककर हाथ में लिए जल को नीचे रखे गए धातु के बरतन में छोडें । पानी छोडते समय निम्न मंत्र का उच्चारण करें –
ई. जिन्हें संध्यावंदन का अधिकार प्राप्त है अथवा जिन्हें गुरु से गायत्री मंत्र की दीक्षा मिली है, वे गायत्री मंत्र का उच्चारण करें, साथ ही अन्य लोग निम्न मंत्र का उच्चारण करें –
ॐ एही सूर्य सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते ।
अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर ।।
अर्थ : हे सूर्यदेव, हे सहस्रांश, हे तेजोराशे, हे जगत्पते; आप मुझपर दया करें । हे दिवाकर, आप भक्तिभाव से समर्पित इस अर्घ्य का स्वीकार करें ।
स्त्रियां अर्घ्य देते समय ‘ॐ घृणि सूर्याय नमः ।’ (इसका अर्थ है तेजस्वी सूर्य को मेरा नमस्कार), इस मंत्र का उच्चारण करें ।
उ. उसके उपरांत अपने चारों ओर गोलाकार परिक्रमा करें । इस प्रकार कुल ३ बार सूर्य को अर्घ्य प्रदान करें ।
ऊ. अर्घ्य देने के उपरांत बरतन में स्थित जल हम तुलसी को छोडकर अन्य पौधों में डाल सकते हैं । गैलरी अथवा छत से अर्घ्य देते समय नीचे स्थित तुलसी के पौधे पर अर्घ्य का पानी न गिरे, इसका ध्यान रखें ।
ए. शास्त्र के अनुसार देवताओं के पूजन के उपरांत परिक्रमा करना अनिवार्य होता है । देवता के चारों ओर घूमकर परिक्रमा करना संभव न हो, तो अपने चारों ओर गोलाकार घूमकर ३ अथवा ७ परिक्रमा करें । उसके उपरांत सूर्य को साष्टांग नमस्कार करें ।
प्रणिधाय शिरो भूमौ नमस्कारपरो रवेः ।
तत्क्षणात्सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ।।
– भविष्यपुराण, ब्राह्मपर्व, अध्याय ८०, श्लोक १०
अर्थ : जो भूमि पर मस्तक रखकर सूर्य को नमस्कार करता है, उसी क्षण निःसंदेह उस व्यक्ति के पाप उसे छोडकर चले जाते हैं ।
साष्टांग प्रणाम करना संभव न हो, तो मस्तक झुकाकर सूर्य को नमस्कार करें ।
६. अर्घ्य देने से संबंधित कुछ नियम
अ. अंजुली से अथवा बरतन से अर्घ्य देते समय दोनों हाथों के अंगूठे का तर्जनी से स्पर्श न कर, उन्हें खुला रखें ।
मुक्तहस्तेन दातव्यं मुद्रां तत्र न कारयेत् ।
तर्जन्याङ्गुष्ठयोगेन राक्षसी मुद्रिका स्मृता ।
राक्षसी मुद्रिकार्घ्येण तत्तोयं रूधिरं भवेत् ।।
अर्थ : (अर्घ्य देते समय) खुले हाथों से दें, मुद्रा न करें । तर्जनी एवं अंगूठे का संयोग होने से उसे ‘राक्षसी मुद्रा’ मानी जाती है । राक्षसी मुद्रा में अर्घ्य देने से वह जल जल रक्त की भांति होगा । (ऐसा माना जाता है ।)
आ. सूतके तु सावित्र्याञ्जलिं प्रक्षिप्य प्रदक्षिणम् ।
कृत्वा सूर्यं तथा ध्यायन् नमस्कुर्यात् पुनः पुनः ।।
अर्थ : सूतक के समय सूर्य को मानस अर्घ्य देकर, परिक्रमा कर तथा ध्यान कर पुनः-पुनः (३ बार) नमस्कार करें ।
इ. अर्घ्य देते समय उस जल की बूंदें पैरों पर न गिरें, इसका ध्यान रखें ।
ई. कुछ लोग स्नान के उपरांत तौलिए से शरीर पोंछते हैं तथा वही तौलिया कमर को बांधकर सूर्य को अर्घ्य देते हैं । यह शास्त्र के अनुसार अनुचित है ।’
(साभार – ‘सनातन धर्म’ यूट्यूब चैनल)
संग्राहक : श्री. राम होनप, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा. (१८.१२.२०२४)
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के बताए अनुसार प्रतिदिन सूर्य कोअर्घ्य देने से हुए लाभ !‘पहले एक ज्योतिषी ने मुझे प्रतिदिन सूर्य को अर्घ्य देने के लिए कहा था । तब मैंने इस विषय में सच्चिदानंद परब्रह्म डॉक्टरजी को बताया । उन्होंने मुझसे कहा, ‘‘वैसा करो । सूर्य को अर्घ्य देने से स्वयं में क्या परिवर्तन प्रतीत होता है’, इसका अध्ययन करो तथा ये सूत्र लिखकर दो ।’’ उसके उपरांत मैंने वैसे प्रयास आरंभ किए । उससे मुझे निम्न लाभ हुए – १. मेरे स्वास्थ्य में सुधार आने लगा । मुझे बीच-बीच में बुखार, सर्दी, खांसी तथा सिरदर्द आदि कष्ट होते थे । उनकी बारंबारता अल्प होकर १-२ वर्ष उपरांत ये कष्ट होने लगे । २. किसी दिन ५ घंटे नामजप करने के पश्चात मुझे अपने शरीर में दैवी ऊर्जा प्रतीत होती है । उसकी तुलना में प्रतिदिन सूर्य को अर्घ्य देते समय मुझे सूर्य से मिलनेवाली दैवी ऊर्जा अनेक गुना होती है । इससे ‘बिना किसी परिश्रम के प्राकृतिक दृष्टि से बहुत दैवी ऊर्जा प्राप्त होती है’, यह बात ध्यान में आई । अर्घ्य देने से मुझे जो उपरोक्त शारीरिक एवं आध्यात्मिक लाभ हो रहे हैं; उसके लिए मैं सूर्यदेव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता हूं ।’ – श्री. राम होनप, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा |