गणेशोत्सव के काल में श्री गणेश चतुर्थी मनाई जाती है; परंतु ऐसा क्यों ? गणेश तृतीया, गणेश पंचमी अथवा गणेश सप्तमी के दिन क्यों नहीं मनाई जाती ? तत्त्ववेत्ता पुरुषों की भावना एवं मान्यता यह है कि मनुष्य में सत्त्व, रज एवं तम ये ३ गुण होते हैं । उन्हें सत्ता दिलानेवाला चैतन्य चौथा है ।
जागृतावस्था, स्वप्नावस्था एवं सुषुप्तावस्था, इन तीनों अवस्थाओं को देखनेवाली ‘तुर्या’ अवस्था चौथी अवस्था है । भूत, भविष्य एवं वर्तमान इन तीनों कालों को जो देखनेवाला है, वह कालातीत तथा चौथा है । जिन्हें ज्ञानमार्ग का साक्षात्कार हुआ है, उन महापुरुषों का यह अनुभव है कि उक्त ४ अवस्थाओं में से ३ अवस्थाएं सांसारिक हैं तथा चौथी अवस्था साक्षी चैतन्यस्वरूप की है । इन सभी कारणों से गणेशोत्सव का आरंभ श्री गणेश चतुर्थी को ही होता है । १०-११ दिन उत्सव मनाकर उसके उपरांत श्री गणेशमूर्ति का विसर्जन किया जाता है ।
प्रथम पूजा का सम्मान श्री गणेश को ही क्यों ?‘श्री गणेश अथर्वशीर्ष में ऋषियों ने उन्हें ‘मूलाधार स्थित’ बताया है । मूलाधार मानव शरीर के कुल ६ चक्रों में से एक है तथा वह सभी चक्रों का आधार है । श्री गणेश को मूलाधार चक्र का देवता माना जाता है । इस चक्र का स्थान प्रथम होने से प्रथम पूजा का सम्मान उन्हें प्राप्त हुआ । श्री गणेश ऋद्धि, सिद्धि, बुद्धि एवं समृद्धि के देवता हैं । उन्हें परब्रह्मस्वरूप माना जाता है । परब्रह्मप्राप्ति त्रियुग की चौथी तुर्यावस्था में प्रवेश किए बिना नहीं होगी । यह रहस्यपूर्ण सूत्र चतुर्थी व्रत में बताया गया है । तुर्यावस्था में प्रवेश कर मनोरूपी चंद्रमा के जागृत होने से ही परब्रह्म की प्राप्ति होगी । इसीलिए चतुर्थी के दिन उपवास तोडने से पूर्व चंद्रमा का दर्शन करने की प्रथा है ।’ – निवृत्ति भि. शिरोडकर (साभार : दैनिक ‘गोमंतक’, २० अगस्त २००१) |

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !
संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
हिन्दू जनजागृति समिति के हिन्दू राष्ट्र संपर्क अभियान अंतर्गत राष्ट्रीय मार्गदर्शक सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी की मध्य प्रदेश यात्रा !
ज्ञानमूर्ति, निर्गुण तत्त्व की नित्य अनुभूति देनेवाले एवं ब्रह्मानंद में निमग्न रहनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी
सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी द्वारा ३० वर्ष पूर्व दिए गए आशीर्वचन को साधक क्षण-क्षण अनुभव कर रहे हैं !
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी एकमेवाद्वितीय एवं अवतारी पुरुष क्यों हैं ?