१. ऋषि
कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि एवं वसिष्ठ ।
२. उद्देश्य
अ. ‘जिन ऋषियों ने अपने तपोबल से विश्व-मानव पर अनंत उपकार किए हैं, मनुष्य के जीवन को उचित दिशा दी है, उन ऋषियों का इस दिन स्मरण किया जाता है ।’ – परात्पर गुरु (स्व.) परशराम पांडे महाराज, सनातन आश्रम, देवद, पनवेल.
आ. मासिक धर्म, अशौच एवं स्पर्शास्पर्श के कारण स्त्रियों पर होनेवाले परिणाम इस व्रत से तथा गोकुलाष्टमी के उपवास से भी घटता है ।
३. व्रत करने की पद्धति
अ. इस दिन सवेरे अपामार्ग की लकडी से दांत घिसें ।
आ. स्नान के उपरांत पूजा से पूर्व ‘माहवारी के दौरान जाने-अनजाने में हुए स्पर्श के कारण जो दोष लगता है, उसके निराकरण हेतु अरुंधति (वसिष्ठ ऋषि की पत्नी) सहित सप्तर्षियों को प्रसन्न करने हेतु मैं यह व्रत कर रही हूं’, ऐसा संकल्प करें ।
इ. पीढे पर चावल की आठ राशियां बनाकर उसपर कश्यपादि सात ऋषि एवं एक अरुंधति का आवाहन एवं षोडशोपचार पूजन करें ।
ई. कहा गया है, इस दिन कंदमूल का आहार करें और बैलों के श्रम का कुछ भी न खाएं । अगले दिन कश्यपादि सात ऋषि एवं अरुंधति का विसर्जन करें । बारह वर्ष उपरांत अथवा पचास वर्ष की उम्र हो जाने पर इस व्रत का उद्यापन करने में कोई अडचन नहीं । उद्यापन के उपरांत भी यह व्रत जारी रख सकते हैं ।
(संदर्भ – सनातन का ग्रंथ ‘त्योहार मनानेकी उचित पद्धतियां एवं अध्यात्मशास्त्र’)
मन के विचार घटाने के लिए भावावस्था में रहना एवं उन विचारों की ओर साक्षिभाव से देखना आवश्यक !

‘तीव्र आध्यात्मिक कष्ट से पीडित साधकों के मन में विचारों की मात्रा बहुत होती है । ऐसे में विचार घटाने के लिए उन्हें स्वसूचना लेने से लाभ नहीं होता । उन विचारों से बाहर निकलने के लिए साधकों को भावस्थिति में ही रहना पडता है । इस कारण साधक मन में विचार आते ही भावावस्था में प्रवेश करें । इस कारण वे सरलता से विचारों की ओर साक्षिभाव से देख सकते हैं ।’
– (परात्पर गुरु) डॉ. आठवले

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