
श्राद्ध-जैसे अशुभ कर्म कनिष्ठ प्रकार के पृथ्वी और आप तत्त्वों से संबंधित होते हैं । इसलिए, इसमें नैवेद्य दिखाने की क्रिया अधिकांशतः भूमि (पृथ्वीतत्त्व) से संबंधित होती है । पितृकर्म (श्राद्ध) में कनिष्ठ देवताओं की तरंगें भूमि की ओर गमन करती हैं, इसलिए उस दिशा को मुख्य मानकर यह क्रिया की जाती है । श्राद्ध-जैसे अशुभ कर्म कनिष्ठ प्रकार के पृथ्वी और आप तत्त्वों से संबंधित होते हैं । इसलिए, इसमें नैवेद्य दिखाने की क्रिया अधिकांशतः भूमि (पृथ्वीतत्त्व) से संबंधित होती है । पितृकर्म (श्राद्ध) में कनिष्ठ देवताओं की तरंगें भूमि की ओर गमन करती हैं, इसलिए उस दिशा को मुख्य मानकर यह क्रिया की जाती है ।
‘वज्रासन में बैठकर दाहिना घुटना भूमि पर रखना, यह देह की शक्ति व्यय कर अपने अहंकार को घटाने तथा बाईं नाडी सक्रिय कर देवताओं की निर्गुण तरंगें ग्रहण करने का प्रतीक है । दाहिना घुटना भूमि पर टिकाकर बायां घुटना पेट के पास लाने से नाभि पर दबाव पडता है । इससे बाईं नाडी (चंद्र नाडी) सक्रिय होती है । इसके विपरीत क्रिया करने से रजोगुण बढानेवाली दाईं नाडी (सूर्य नाडी) सक्रिय होती है । इससे, पितरों के लिए श्राद्धस्थल पर आना सरल होता है ।

देवताओं नैवेद्य की थाली अथवा पत्ते के नीचे बायां हाथ रखना तथा थाली के ऊपर दाहिना हाथ रखना, यह दाहिने हाथ को अधिक महत्त्व देने तथा श्राद्ध में आए देवताओं का स्वागत करने का शुभसूचक कर्म है ।’ इसके विपरीत ढंग से देवताओं की तुलना में कनिष्ठ पितरों को अन्न-निवेदन किया जाता है । इसमें, अल्प महत्त्व के अशुभदर्शक बाएं हाथ को अधिक महत्त्व दिया जाता है । अर्थात, बायां हाथ नैवेद्य के पत्ते के ऊपर तथा दायां हाथ पत्ते के नीचे रखा जाता है ।’ – एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळ के माध्यम से, ५.८.२००६)
(संदर्भ : सनातन संस्था का ग्रंथ ‘श्राद्धविधिका अध्यात्मशास्त्रीय आधार’)
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