छत्तीसगढ में भा.ज.पा. सरकार के मंत्रिमंडल द्वारा धर्मांतरण विरोधी विधेयक पारित

रायपुर (छत्तीसगढ) – छत्तीसगढ में भा.ज.पा. सरकार के मंत्रिमंडल ने ‘छत्तीसगढ धर्म स्वतंत्रता विधेयक २०२६’ के प्रारूप को सहमती दे दी है । इस विधेयक को केवल एक कानूनी प्रपत्र के रूप में नहीं, अपितु राज्य की सांस्कृतिक एकता, आदिवासी पहचान और नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने के लिए एक व्यापक सुरक्षा व्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है । वर्तमान में चल रहे विधानसभा सत्र में यह विधेयक सदन के सामने प्रस्तुत किया जाएगा और पारित होने के उपरांत यह प्रभावी कानून बन जाएगा ।

सरकार का कहना है कि धार्मिक आस्था व्यक्तिगत विषय है, किन्तु यदि उसमें प्रलोभन, धोखाधडी या दबाव सम्मिलित हो जाए, तो वह सामाजिक सौहार्द के लिए धोकादायक हो सकता है । इस धोखे को ध्यान में रखते हुए सरकार ने पुराने नियमों में बदलाव कर अवैध धर्मांतरण की जड पर प्रहार करने वाली नई व्यवस्था तैयार की है ।

न्यूनतम दंड १० वर्ष और अधिकतम आजीवन कारावास !

यदि कोई व्यक्ति या समूह बडी संख्या में लोगों का धर्मांतरण करने का दोषी पाया जाता है, तो उसे कम से कम १० वर्ष एवं अधिकतम आजीवन कारावास (संपूर्ण जीवन कारागार में व्यतीत करने का दंड) हो सकता है । केवल कारावास ही नहीं, अपितु कम से कम ५ लाख रुपये के आर्थिक दंड का भी प्रावधान किया गया है ।

नई न्यूनतम दंड की व्यवस्था के अनुसार, यदि किसी अवयस्क, महिला, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछडे वर्ग के व्यक्ति का धर्मांतरण कराया जाता है, तो दोषी को १० से २० वर्ष तक कारावास और कम से कम १० लाख रुपये का आर्थिक दंड होगा । वहीं सामान्य प्रकरणों में न्यूनतम दंड ७ से १० वर्ष कारावास तथा ५ लाख रुपये आर्थिक दंड निर्धारित किया गया है ।

संपादकीय भूमिका 

प्रत्येक राज्य द्वारा अलग-अलग इस प्रकार का कानून बनाने की अपेक्षा केंद्र की भा.ज.पा. सरकार को संपूर्ण देश के लिए ऐसा कानून बनाना आवश्यक है ! क्योंकि कांग्रेस और अन्य हिन्दू-विरोधी राजनीतिक दलों की सरकारें कभी भी इस प्रकार का कानून नहीं बनाएंगी !