नागपुर – गुरु मंदिर परिवार के आधारस्तंभ धर्मभास्कर सद्गुरुदास महाराज अर्थात प्रसिद्ध शिवकथाकार विजयकुमार देशमुख (आयु ८४ वर्ष) का ११ फरवरी को देहांत हो गया । उन्होंने ‘शककर्ते शिवराय’ नामक शिवचरित्र ग्रंथ के माध्यम से छत्रपति शिवाजी महाराज के विचार तथा कार्य जन-जन तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया । गुरु मंदिर परिवार के माध्यम से उन्होंने स्वयं को आध्यात्मिक कार्यों में समर्पित कर दिया था ।
उनके परिवार में पुत्र अजय तथा पुत्रियां नीता काटेकर, प्रज्ञा फडणीस तथा वर्षा वेलंकीवार, नाती-पोते तथा बडा भक्तपरिवार है ।
उन्होंने १९ वर्ष की आयु से शिवकार्य का प्रारंभ किया एवं सहस्त्रों शिवभक्तों को दुर्ग-भ्रमण कराया । वे ‘छत्रपति सेवा प्रतिष्ठान’ के संस्थापक थे । उनके शोध के आधार पर ही छत्रपति शिवाजी महाराज की जन्मतिथि १९ फरवरी १६३० निश्चित की गई, जिसे शासन ने भी स्वीकार किया । इस कार्य के लिए उन्होंने अथक परिश्रम किया ।
शिवइतिहासकार तथा अध्यात्म के अधिकारी संत सद्गुरुदास महाराज को कृतज्ञतापूर्वक नमन
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी
धर्मभास्कर सद्गुरुदास महाराज (पूर्व नाम विजयकुमार देशमुख) केवल इतिहासकार ही नहीं, तथापि अध्यात्म के उच्च अधिकारी संत भी थे । उनके आध्यात्मिक सामर्थ्य के कारण ही छत्रपति शिवाजी महाराज का प्रेरणादायी तथा प्रामाणिक चरित्र समाज के सामने प्रस्तुत करने का दिव्य कार्य उनके माध्यम से संपन्न हुआ ।
जुलाई २००१ में नागपुर में उनसे हुई भेंट आज भी स्मरण में है । मैं जयप्रकाश नगर क्षेत्र में दो दिनों के लिए ठहरा हुआ था । वहीं पूज्य महाराज का निवास होने की जानकारी मिली। छत्रपति शिवाजी महाराज के तेजस्वी चरित्र का लेखन उनके द्वारा किए जाने से उनकी कीर्ति पहले से सुन रखी थी, इसलिए उनसे मिलने की मेरी तीव्र इच्छा थी ।
नागपुर पहुंचने के बाद पूज्य महाराज स्वयं मुझसे मिलने मेरे निवास स्थान पर आए । एक महान विभूति की ऐसी विनम्रता देखकर मैं भावविभोर हो गया ।
अत्यंत मृदु तथा विनम्र स्वभाव वाले सद्गुरुदास महाराज ने मुझे अपना लिखित तेजस्वी ग्रंथ ‘शककर्ता शिवराय’ भेंट किया तथा अपने समीप स्थित ‘गुरुमंदिर’ आने का प्रेमपूर्वक निमंत्रण दिया । उनके सात्त्विक प्रेम को मैं अस्वीकार नहीं कर सका । उनके इस अद्भुत स्नेह के कारण मैं एवं सनातन संस्था उनसे स्थायी रूप से जुड़ गए ।
दूसरे दिन मुझे गुरुमंदिर जाने का अवसर मिला । सद्गुरुदास महाराज की दत्त उपासना तथा तपोबल से निर्मित वह मंदिर भक्तों के लिए साक्षात चैतन्यमय तीर्थक्षेत्र जैसा प्रतीत होता था । वहां आने वाले प्रत्येक भक्त की सात्त्विकता, विनम्रता एवं गुरुभक्ति देखकर मन अत्यंत प्रसन्न हुआ ।
पूज्य महाराज ने सनातन संस्था एवं उसके साधकों पर सदैव पितृतुल्य प्रेम रखा । आज वे देह से हमारे बीच नहीं हैं, परंतु उनका चैतन्य और आशीर्वाद सभी भक्तों तथा साधकों को निरंतर धर्मस्थापना के कार्य के लिए प्रेरणा देता रहेगा, ऐसी मेरी दृढ श्रद्धा है ।
— जयंत बाळाजी आठवले, संस्थापक सनातन संस्था (२१-०२-२०२६)