जमीयत उलेमा-ए-हिन्द की धर्मांधता दर्शाने वाला राष्ट्रविरोधी वक्तव्य

नई दिल्ली – मुसलमान किसी को भी ‘वंदे मातरम्’ गाने या बजाने से नहीं रोकते; परंतु गीत की कुछ पंक्तियों में मातृभूमि को ‘देवी’ के रूप में दर्शाया गया है । यह हमारी आस्था के विरुद्ध है । एक मुसलमान केवल एक अल्लाह की इबादत करता है । इसलिए उसे यह गीत गाने के लिए बाध्य करना संविधान के अनुच्छेद २५ और सर्वोच्च न्यायालय के अनेक निर्णयों का स्पष्ट उल्लंघन है, ऐसी प्रतिक्रिया जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने ‘एक्स’ पर व्यक्त की है । केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान सम्मान देना अनिवार्य किया है । आदेश के अनुसार राष्ट्रीय गीत की सभी ६ गद्यांश गाई जाएंगी, जिनकी कुल अवधि ३ मिनट १० सेकंड है । अब तक मूल गीत की केवल पहली दो पंक्तियां ही गाई जाती थीं ।
मदनी द्वारा व्यक्त किए गए मुख्य बिंदु

१. इस गीत को अनिवार्य करना तथा नागरिकों पर थोपने का प्रयास देशभक्ति का प्रदर्शन नहीं है, अपितु यह चुनावी राजनीति, एक धार्मिक एजेंडा एवं मूल सूत्रों से लोगों का ध्यान भटकाने का प्रयास है ।
२. देश के प्रति प्रेम का वास्तविक माप घोषणाओं में नहीं, अपितु चरित्र और त्याग में है । (देश के लिए मुसलमान कितना त्याग करते हैं तथा कितने देशविरोधी कार्य करते हैं, यह भारतवासियों को ज्ञात है ! – संपादक) इसके उत्कृष्ट उदाहरण मुसलमानों एवं जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के ऐतिहासिक संघर्ष में देखे जा सकते हैं । (मुसलमानों द्वारा जिन ‘ऐतिहासिक संघर्षों’ का उल्लेख किया जाता है, वे भारत के लिए नहीं, अपितु मुगलों अर्थात मुसलमानों के इस देश पर शासन को बनाए रखने के लिए थे, यह हिन्दुओं को ज्ञात है ! – संपादक)
३. ऐसे निर्णय देश की शांति, एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों को निर्बल (कमजोर) करते हैं और संविधान की भावना को भी आहत करते हैं । ‘वंदे मातरम्’ को अनिवार्य करना संविधान, धार्मिक स्वतंत्रता तथा लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर स्पष्ट आक्रमण है । (लोकतांत्रिक तरीके से और संवैधानिक स्वतंत्रता के अनुसार ही यह गीत अनिवार्य किया गया है; किंतु हर बार संविधान एवं लोकतंत्र का नाम लेकर झूठा विरोध करने का प्रयास मुसलमान करते रहते हैं, यह उसी प्रकार का प्रयास है ! – संपादक)
संपादकीय भूमिका
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