सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव देहली २०२५

नई दिल्ली, १४ दिसंबर (वार्ता.) – भले ही हिन्दू राष्ट्र रहा नेपाल धर्मनिरपेक्ष हो गया हो, पर यदि सभी ठान लें, तो नेपाल सहित भारत भी हिन्दू राष्ट्र बनेगा ही, ऐसी हुंकार ‘सनातन राष्ट्र नेपाल’ संवाद में सहभागी नेपाल के हिन्दुत्वनिष्ठों ने भरी । इस परिसंवाद का संचालन हिन्दू जनजागृति समिति के उत्तर प्रदेश और बिहार राज्य समन्वयक श्री. विश्वनाथ कुलकर्णी ने किया । इस परिसंवाद में नेपाल के वरिष्ठ हिन्दुत्वनिष्ठ नेता श्री. शंकर खराल, नेपाल स्थित ‘टुडेज यूथ एशिया’ के श्री. संतोष शाह, हिन्दू जनजागृति समिति के राष्ट्रीय मार्गदर्शक सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळे ने भाग लिया ।
नेपाल की आत्मा हिन्दू होने के कारण वह हिन्दू राष्ट्र ही है ! – शंकर खराल, वरिष्ठ हिन्दुत्वनिष्ठ
नेपाल अभी भी हिन्दू राष्ट्र ही है । नेपाल की आत्मा हिन्दू ही है । नेपाल में आज भी हिन्दू राजसत्ता शेष है । नेपाल हिन्दू संस्कृति को बचाने के लिए प्रयत्नशील है । वहां पर्वतीय प्रदेश में धर्मांतरण (धार्मिक रूपांतरण) चल रहा है । जब तक हिन्दू राष्ट्र नहीं होगा, तब तक नेपाल में शांति नहीं आ सकती । अभी ‘जेन जी’ आंदोलन हुआ; किंतु उसके बाद व्यवस्था में अपेक्षित परिवर्तन नहीं हुआ है ।
नेपाल में हिन्दुओं के धर्मांतरण (धार्मिक रूपांतरण) के लिए करोडों रुपये का फंड मिलता है ! – संतोष शाह
हमारे पास ‘सेक्युलर’ (धर्मनिरपेक्ष) की कोई संज्ञा नहीं है । कोई भी धर्म धर्मनिरपेक्ष नहीं है । नेपाल में भारत की तुलना में जनसंख्या और आकार बहुत कम होते हुए भी वहां धर्मांतरण कराने के लिए दो बिलियन डॉलर (२०० करोड डॉलर) धन आता है । इससे यह ज्ञात होता है कि कितना बडा षड्यंत्र रचा जा रहा है । पशुपतिनाथ की कृपा से, सीता माता की भूमि होने के कारण पर्वतीय प्रदेश को छोडकर अन्यत्र उतना धर्मांतरण नहीं हुआ है ।
नेपाल में सनातन परंपरा की उच्च अभिव्यक्ति ! – सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळे
नेपाल में सनातन परंपरा की उच्च अभिव्यक्ति है । वे अभी भी हिन्दू कालगणना का पालन करते हैं । वे अंग्रेजी कैलेंडर पर विचार नहीं करते । भारत की स्थिति पर विचार करते समय हमें महाभारत काल में जाकर अर्जुन की स्थिति पर विचार करना पडता है । युद्ध में अपने सभी रिश्तेदारों को देखकर अर्जुन भ्रमित हो गया था । उसे लगा कि वे उसके अपने लोग हैं । ऐसी ही स्थिति भारत को स्वतंत्रता मिलने के पश्चात हुई । वर्ष १९४६ में अपने लोग आए, इसलिए भारतीय भ्रमित हो गए और उन्हें संकट समझ में नहीं आया । यदि भारत और नेपाल जागरूक रहें, तो हिन्दू पताका दोनों स्थानों पर फिर से फहराएगी ।
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