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मुंबई – कोरेगांव भीमा दंगा भड़काने का आरोप लगे दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राध्यापक हनी बाबू की जमानत याचिका पर मुंबई उच्च न्यायालय में सुनवाई हुई । इस याचिका के विषय में गुण के आधार पर नहीं, बल्कि बिना परिवाद के दीर्घकाल कारागार में रहने के आधार पर निर्णय लिया जाएगा, ऐसा कहते हुए न्यायमूर्तियों के खंडपीठ ने निर्णय सुरक्षित रखा ।
कोरेगांव भीमा दंगे के प्रकरण में एल्गार परिषद में भड़काऊ भाषण देने का आरोप बाबू पर है । राष्ट्रीय अन्वेषण संस्था ने वर्ष २०२० में उसे बंदी बनाया था ।
बाबू के अधिवक्ता द्वारा किया गया युक्तिवाद !
पिछले ५ वर्ष २ मास से बाबू कारागार में हैं । उनके विरुद्ध अभी तक आरोप भी निश्चित नहीं हुए हैं । अतः किसी व्यक्ति को बिना मुकदमे के कारागार में रखना, यह उसके मौलिक अधिकारों का हनन है, ऐसा सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है — ऐसा युक्तिवाद बाबू के अधिवक्ताओं ने किया ।
बाबू के विरोध में पर्याप्त प्रमाण हैं । गंभीर अपराधों में केवल दीर्घ कारावास के आधार पर जमानत प्रदान नहीं की जा सकती — ऐसा युक्तिवाद केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त महान्यायाभिकर्ता अनिल सिंह ने किया और बाबू की जमानत याचिका का विरोध किया ।
संपादकीय भूमिकायही न्याय हिन्दुत्वनिष्ठ व्यक्तियों के संदर्भ में भी लागू होना चाहिए, ऐसी हिन्दुओं की अपेक्षा है । |
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