Minority Education : अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों को छूट देने के निर्णय पर होगा पुनर्विचार ! – सर्वोच्च न्यायालय

नई देहली – सर्वोच्च न्यायालय ने १ सितंबर २०२५ को दिए गए एक निर्णय में वर्ष २०१४ को उसके स्वयं के द्वारा दिए गए निर्णय का पुनर्विचार करने की बात कही है । सर्वोच्च न्यायालय के वर्ष २०१४ के एक निर्णय में अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों को शिक्षा के अधिकार के कानून से छूट दी गई थी । सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश दीपंकर दत्ता एवं न्यायाधीश मनमोहन की खंडपीठ ने कहा है कि अनेक शिक्षा संस्थान इस कानून को बचने के लिए ही अल्पसंख्यक श्रेणी प्राप्त करने के लिए प्रयास कर रहे हैं । यह छूट समान शिक्षाप्रणाली एवं सामाजिक समावेशिता इन सिद्धांतों के विरोध में हो सकती है । इस प्रकरण को बडे खंडपीठ के पास हस्तांतरित करते हुए उन्होंने कहा कि वर्ष २०१४ का यह निर्णय संविधान के अनुच्छेद २१ अ (शिक्षा का अधिकार) एवं अनुच्छेद ३०(१) (अल्पसंख्यकों का शिक्षा संस्थान की स्थापना का अधिकार) इनके मध्य संतुलन स्थापित नहीं करता ।

खंडपीठ ने कहा है कि,

१. शिक्षा अधिकार कानून का दायित्व टालने के लिए शिक्षा संस्थानों द्वारा स्वयं को अल्पसंख्यक घोषित करना समाज के दुर्बल घटकों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित रखना है ।

२. शिक्षा के अधिकार के अंतर्गत शिक्षक योग्यता परीक्षा (टीईटी) जैसी शिक्षकों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की शर्तें भी इन शिक्षा संस्थानों पर लागू नहीं हैं, उसके कारण शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है ।

३. अल्पसंख्यकों के लिए चलाए जानेवाले अनेक विद्यालय विद्यालयीन शिक्षा अधिकार कानून द्वारा सुनिश्चित सुविधाएं नहीं देतें । उसके कारण वहां शिक्षा ले रहे छात्र समानता एवं परिचय की भावना से वंचित रह रहे हैं ।

४. यह प्रकरण अब बडे खंडपीठ के सामने जानेवाला है । वहां अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों को शिक्षा के अधिकार के कानून से पूर्णरूप से छूट देना उचित है अथवा अनुचित, इसका निर्णय होगा । इस निर्णय से पूरे देश के लाखों बच्चों की शिक्षा प्रभावित हो सकती है ।

शिक्षा अधिकार कानून (आरटीई) क्या है ?

‘शिक्षा अधिकार कानून २००९’ भारत सरकार द्वारा पारित कानून है । इस कानून के अंतर्गत ६ से १४ वर्ष आयूसमूह के बच्चों को निशुल्क एवं अनिवार्यरूप से शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार प्रदान किया गया है । इस कानून की धारा १२(१)(क) के अंतर्गत निजी विद्यालयों को २५ प्रतिशत स्थान आर्थिकदृष्टि से दुर्बल एवं वंचित घटकों के बच्चों के लिए आरक्षित रखनी पडती हैं । समाज के सभी घटकों के लिए शैक्षिक समानता तथा उनका सामाजिक समावेश सुनिश्चित करना उसका उद्देश्य है ।