Malegaon Blast Verdict : मालेगांव बम विस्फोट प्रकरण में निर्दोष आरोपियों के वकीलों की प्रतिक्रियाएं

ए.टी.एस्. के दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई होने हेतु प्रयास करेंगे ! – अधिवक्ता संजीव पुनाळेकर

न्यायालय ने अपने निर्णय में आतंकवादविरोधी दल के (ए.टी.एस्. के) अन्वेषण पर फटकार लगाई है । १७ वर्ष उपरांत यह न्याय मिला है । इस प्रक्रिया में इन आरोपियों के अमूल्य १७ वर्ष व्यर्थ हुए हैं । ए.टी.एस्.ने आरोपियों के नाम बदलकर उन्हें बंदी बनाने से पूर्व ही ‘इंडिया बुल्स’ प्रतिष्ठान के विमान से अन्य राज्यों में ले जाया । बंदी बनाने से पूर्व ही उनका ‘ब्रेन मैपिंग’ (सत्य स्वीकार करनेवाला) परीक्षण किया गया । एन्.आई.ए. के पास इसकी प्रविष्टियां नहीं हैं । वर्ष २०१३ में ही हमने एक याचिका प्रविष्ट कर इसकी जांच की मांग की थी । अब न्यायालय के इस निर्णय से ही ये सूत्र सामने आए हैं; इसलिए हम इस याचिका को आगे ले जानेवाले हैं । ए.टी.एस्. के दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई के लिए हम प्रयास करेंगे, साथ ही इसके पीछे का अदृश्य राजनीतिक हाथ सामने आने हेतु हम प्रयास करेंगे !

मालेगांव बमविस्फोट अभियोग समाप्त तो हुआ; परंतु अनेक प्रश्न हैं अनुत्तरित ! – अधिवक्ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर, राष्ट्रीय अध्यक्ष, हिन्दू विधिज्ञ परिषद

मालेगांव प्रकरण के दिलीप पाटीदार का क्या हुआ ? जिनके कारण वे लापता हुए, उन पर कार्रवाई करना तत्कालिन सरकार ने अस्वीकार किया । तो वर्तमान सरकार इस पर क्या करेगी ? आतंकवादविरोधी दल ने कैसे निजी विमान प्रतिष्ठान ‘इंडिया बुल्स’ से किराए पर लिया ? वर्तमान सरकार उसके पैसे वसूलेगी ? जिन अधिकारियों ने सुधाकर चतुर्वेदी के घर में आर्.डी.एक्स. रखा, क्या उन अधिकारियों की जांच होगी ?, ऐसे अनेक प्रश्नों के उत्तर हमें खोजने पडेंगे, अन्यथा इतिहास हमें ये प्रश्न पूछेगा ।

‘बेस्ट बेकरी’ घटना के दो आरोपी छूटे, मालेगांव के दो आरोपी छूटे; परंतु दाभोलकर प्रकरण के दोनों को दंड मिलना दुर्भाग्यजनक है । अब वे भी उच्च न्यायालय से बरी होंगे तथा हिन्दू आतंकवाद के शेष अभियोग में उन्हें कैसे फंसाया गया था, यह सिद्ध करने के लिए हम प्रयास करेंगे ।

२. क्या महाराष्ट्र में भिन्न-भिन्न अन्वेषण करने की पद्धति स्थापित हो रही है ? तथा क्या वह कांग्रेस ने स्थापित की है ? यही बात दाभोलकर एवं पानसरे प्रकरण में हुई है । इस परंपरा को तोड डालना चाहिए ।

राजनीतिक व्यक्तियों के आरोपों के कारण अन्वेषण विभागों पर दबाव बना ! – अधिवक्ता प्रकाश साळसिंगीकर (आरोपी सुधाकर चतुर्वेदी के अधिवक्ता)

अधिवक्ता प्रकाश साळसिंगीकर

मालेगांव बमविस्फोट में ६ लोग मारे गए तथा १०१ लोग घायल हुए । ऐसा होते हुए भी विभिन्न राजनीतिज्ञों ने जो वक्तव्य दिए, उससे अन्वेषण विभागों पर दबाव बन गया तथा इससे जो अन्वेषण हुआ तथा जो आरोपपत्र प्रविष्ट हुआ, वह कैसे अनुचित था, यह बात स्वयं एन्.आई. ने (नैशनल इंवेस्टिगेंटींग एजेंसी अर्थात राष्ट्रीय अन्वेषण विभाग ने) सामने रखा है । वर्ष २०१६ में एन्.आई.ए. ने जो आरोपपत्र प्रविष्ट किया, उसमें एन्.आई.ए. के यह ध्यान में आया कि अनेक साक्ष्यियों को ‘टॉर्चर’ कर (उत्पीडन कर) उनसे उत्तर लिए गए । उसके उपरांत आरोपियों को भी ‘टॉर्चर’ कर बलपूर्वक उनसे अपराध की स्वीकृति ली गई है । सुधाकर चतुर्वेदी के घर में आर्.डी.एक्स. रखा गया, ऐसे अनेक कृत्य ए.टी.एस्. ने किए हैं, यह बात एन्.आई.ए. के ध्यान में आईं तथा यही अब न्यायालय ने बताया है । न्यायालय ने कहा कि इस प्रकरण में आरोपियों को दंड देने योग्य प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं । न्यायालय में जो ३२५ साक्ष्यियों की साक्ष ली गई, उसमें भगवा आतंकवाद का अस्तित्व होने की बात एक भी साक्ष्य से सामने नहीं आई है ।

षड्यंत्र रचकर अपनी सुविधा के अनुसार‘फेक नैरेटिव’ के अंतर्गत हिन्दू संतों तथा व्यक्तियों को फंसाया गया ! – अधिवक्ता रणजीत सांगळे, बचाव पक्ष के अधिवक्ता (शंकराचार्य स्वामी अमृतानंद देवतीर्थजी के अधिवक्ता)

अधिवक्ता रणजीत सांगळे

सुधाकर चतुर्वेदी के घर में आर्.डी.एक्स. रखने तक यदि पुलिस की मजाल जा सकी है, तो वहां की मिट्टी में आर्.डी.एक्स. के ‘ट्रेसेस’ (अंश) मिलना कोई कठिन नहीं थश । एक तटस्थ व्यक्ति के रूप में भी इसकी ओर देखा जाए, तो ऐसा कोई भी ठोस प्रमाण न्यायालय के सामने नहीं आया है, जिससे आरोपियों की इस प्रकरण में सदोष संलिप्तता हो । इसका कोई भी हवाला दिया जा सकता है । भोपाल की बैठक के संदर्भ में साक्ष्य के रूप में दिखाए गए लोग वहां गए ही नहीं थे, उन्हें बलपूर्वक झूठा वक्तव्य देने के लिए बाध्य किया गया है । यशपाल भडाना को भोपाल से कोई भी संबंध न होते हुए भी उन्हें ‘तुमने आरोपियों को चाय एवं अल्पाहार दिया’, ऐसी असत्य साक्ष्य देने के लिए बाध्य किया गया । आज यदि कोई इस निर्णय पर प्रश्न उठा रहा हो, तो वह केवल न्यायव्यवस्था पर ही नहीं, अपितु संविधान पर ही प्रश्न उठा रहा है ।

मूल आरोपियों का बचाव होकर जो निर्दाेष छूट गए आरोपी हैं, उन्हें इस प्रकरण में फंसाने का काम जिन लोगों ने किया, उन्हीं लोगों को इस बमविस्फोट के विषय में पूछा जाना चाहिए । षड्यंत्र रचकर अपनी सुविधा के अनुसार ‘फेक नैरेटिव’ के अंतर्गत हिन्दू संतों तथा व्यक्तियों को इसमें फंसाया गया है ।