
छत्तीसगढ एवं तेलंगाना की सीमा के पास स्थित कर्रेगुट्टा की पहाडियों में जहां नक्सलियों का मुख्य शिविर है, उसे लगभग १० सहस्र से अधिक सैनिकों ने घेर लिया है । इस शिविर में ५०० से अधिक क्रूर नक्सलवादी हैं । नक्सलवाद के विरुद्ध देश की इस लडाई में पहली बार ही इतनी बडी संख्या में सैनिकों ने नक्सलियों के विरुद्ध लडाई आरंभ की है । इन सैनिकों में महाराष्ट्र के ‘सी-६०’ दल के कमांडो, तेलंगाना का ‘ग्रेहाउंड्स’ दल तथा छत्तीसगढ का ‘डी.आर.जी.’ दल अर्थात कुल ३ राज्यों के सैनिक इस अभियान में सहभागी हैं । इसमें महत्त्वपूर्ण बात यह है कि २०० कि.मी. के इस घेरे में सैनिकों द्वारा घेरे गए क्षेत्र में नक्सलियों के मुख्य तथा कुख्यात कमांडर, जिनमें हिडमा, देवा, विकास इत्यादि नक्सली कार्यरत हैं । इसलिए यह घेराव एक बडा अवसर है । यहां की नक्सलियों की सभी रसद तोडी गई है, अतः उनके सामने केवल २ ही विकल्प उपलब्ध हैं – एक तो आत्मसमर्पण करना, अन्यथा मरने के लिए तैयार रहना । कर्रेगुट्टा एवं पुजारीकांकेर क्षेत्रों में नक्सली विगत २ दशकों से अधिक समय से अपनी गतिविधियां चला रहे हैं । इसी क्षेत्र में नक्सलियों की ‘बटालियन क्रमांक १’ है, जिसे अब घेर लिया गया है । उसके कारण यह लडाई अब वास्तव में आरपार की लडाई बन चुकी है ।
तीन राज्यों का सहभाग !

देश में एक ओर कश्मीर के पहलगाम में आतंकियों ने २८ हिन्दू पर्यटकों की हत्या की, उसके कारण भारतीय सेना ने अब पाकिस्तान के विरुद्ध बडी तैयारी कर आतंकियों को नष्ट करने का निश्चय किया है । उस मोर्चे पर एक लडाई चल रही है, तो दूसरी ओर नक्सलियों के विरुद्ध बडी लडाई चल रही है । देश के गृहमंत्री अमित शाह ने देश से नक्सलवाद नष्ट करने के लिए सुरक्षा बलों को ३१ मार्च २०२६ तक की समयसीमा दी है । इसलिए इन ३ राज्यों द्वारा मिलकर नक्सलवाद के विरुद्ध आरंभ किए गए इस अभियान का विशेष महत्त्व है । महाराष्ट्र का विचार किया जाए, तो गढचिरोली जैसे दुर्गम क्षेत्र में नक्सलियों के शिविर थे । नक्सली मानवीय बस्तियों में आकर ग्रामवासियों, पुलिस के सहायकों तथा गुप्तचरों सहित सरकारी अधिकारियों तथा पुलिसकर्मियों की हत्याएं करते थे । इसलिए महाराष्ट्र में नक्सलवाद के निर्मूलन हेतु ‘सी-६०’ कमांडो दल गठित किया था । इस दल ने गढचिरोली में बहुत अच्छा काम कर अनेक कुख्यात नक्सलियों को यमलोक भेजा, जबकि जिन नक्सलियों को पकडने के लिए लाखों रुपए के पुरस्कार घोषित किए गए थे, उनमें से अनेक नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है । इन नक्सलियों में से कुछ लोग अब पुलिस की भी सहायता कर रहे हैं । उसके कारण महाराष्ट्र में पुलिस तथा सैनिक नक्सलियों पर भारी पड गए हैं । नक्सलियों का निर्मूलन कैसे करना चाहिए ?, इसका आदर्श महाराष्ट्र की पुलिस ने देश के सामने रखा है । उसके अनुसार अब देश में चल रहे नक्सलवाद के विरुद्ध आगे बढना आवश्यक है ।
देश में नक्सलवाद से सबसे अधिक प्रभावित राज्य है छत्तीसगढ ! छत्तीसगढ, तेलंगाना, ओडिशा तथा आंध्र प्रदेश का कुछ क्षेत्र मिलकर दंडकारण्य बनता है । दंडकारण्य में आज भी स्थित घने वन का क्षेत्र नक्सलियों की आश्रयस्थली है अर्थात नक्सलियों के शिविर तथा उनके छिपने का स्थान इसी क्षेत्र में हैं । यह क्षेत्र घने पेडों से घिरा होने के कारण नक्सली पुलिसकर्मियों पर आक्रमण कर घने जंगल में भागने में सफल होते हैं । उन्हें ढूंढकर उन तक पहुंचना असंभव होता है । इसका कारण यह है कि स्थानीय आदिवासियों में से कुछ लोग इस नक्सली आंदोलन में सहभागी होने से तथा उन्हें जंगल की प्रत्येक नदी, गुफाएं, छिपने के लिए सुरक्षित स्थान तथा पगडंडियां ज्ञात होने से सुरक्षाबलों को उनतक पहुंचना संभव नहीं होता । इन घने जंगलों में कोई भी ‘नेटवर्क’ काम नहीं करता, यहां केवल मानवीय संदेश के द्वारा ही संपर्क किया जा सकता है, उसके कारण संपर्क की भी समस्या रहती है । नक्सली उनकी सुरक्षा के प्रति जागरूक होते हैं इसलिए उनतक पहुंचनेवाले प्रत्येक क्षेत्र में बारूदी सुरंग लगे होते हैं । यदि कोई नक्सलियों की खोज करना चाहे, तो इन बारूदी सुरंग का अनुमान न होने से मार्ग में ही उसके मारे जाने की संभावना होती है ।
बडे ‘ऑपरेशन’ की आवश्यकता !

इन विभिन्न समस्याओं का समाधान करते हुए ऐसा कोई बडा ‘ऑपरेशन’ (अभियान) चलाना चुनौतीपूर्ण ही है; ऐसा होते हुए भी, आधुनिक प्रौद्योगिकी तथा नक्सलियों के तंत्र का अध्ययन कर आज नहीं तो कल, उनके विरुद्ध अभियान चलाना अति आवश्यक ही था । नक्सली घातक माओवादी विचारधारा के सशस्त्र रूप हैं । माओवाद एवं साम्यवाद भले ही भिन्न-भिन्न दिखाया जाता हो, तब भी वह एक ही है, यह ध्यान में आता है । इस तथाकथित साम्यवाद को लागू करने के हठ के कारण पूरे विश्व में करोडों लोग मारे जा चुके हैं । भारत में यह साम्यवाद ‘अर्बन नक्सलियों’ के रूप में शहरी क्षेत्र में, जबकि जंगलों में नक्सलियों के रूप में कार्यरत है । नक्सलियों को केवल उनकी विचारधारा ही महत्त्वपूर्ण लगती है, अन्य कोई शासनतंत्र उन्हें अच्छे नहीं लगते तथा समानांतर सरकार चलाना, न्यायतंत्र तथा दंडव्यवस्था चलाकर वे ही कैसे उस प्रदेश के मालिक हैं, यह बात उन्हें स्थानीय लोगों के मन पर अंकित करनी होती है । वर्तमान में देश में हिन्दुत्वनिष्ठ सरकार होने के कारण नक्सलियों के समर्थकों को अथवा उन्हें संरक्षण देनेवाले समाज के नक्सल समर्थक बुद्धिजीवियों के गुट में अस्वस्थता है । कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में नक्सली आंदोलन बडे स्तर पर बढा था । छत्तीसगढ में नक्सली अभी भी समूह में आकर पुलिसकर्मियों तथा सुरक्षा बलों के सैनिकों की हत्याएं करते हैं, तो इसका अर्थ यह हुआ कि समाज में दहशत फैलाने की उनकी हठधर्मिता अभी भी जागृत है । भारत को एक ही समय में नक्सलियों तथा आतंकियों की चुनौतियों का सामना करना पड रहा है । जहां एक शांत होता है, तब दूसरा अपना सिर उठाता है । इसलिए इनमें से एक-एक को पूर्णत: मिटाना आवश्यक है । नक्सली आंदोलन का अंत करने के लिए नक्सलियों के जो प्रमुख नेता सुरक्षाबलों से छुपकर भाग जाने में तथा उसके उपरांत सुरक्षाबलों पर प्रतिआक्रमण करने में सफल हो रहे हैं, अब उन्हें तथा उन्हें संरक्षण देनेवालों को लक्ष्य बनाकर उनका नाश किया जाए, तो उससे नक्सली आंदोलन समाप्त हो सकता है । इसके लिए देश के विभिन्न राज्यों के सुरक्षा बलों तथा सेना को एक-दूसरे के साथ अच्छा समन्वय रखकर प्रभावकारी अभियान चलाना आवश्यक है । तेलंगाना में चल रहे इस नक्सलवाद के निर्मूलन अभियान से नक्सलियों में एक अच्छा संदेश जाना चाहिए । अनेक निर्दाेष लोगों की हत्याएं करनेवाले इन नक्सलियों को किसी प्रकार की दया दिखाए बिना उन्हें मार दिया जाए, यही देश की जनता की अपेक्षा है । उन्हें दया दिखाकर जीवित छोडा गया, तो वे पुनः कब नक्सली आंदोलन का अंग बनेंगे, इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता । इसके साथ ही नक्सलियों को विभिन्न प्रकार की रसद पहुंचानेवालों को भी नक्सली मानकर उनपर भी कठोर कार्यवाही की जाना आवश्यक है ।
संपादकीय भूमिकानिर्दोष नागरिकों एवं पुलिसकर्मियों की हत्या करनेवाले नक्सलियों का पूर्ण रूप से नाश करना ही एकमात्र उपाय है ! |
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