
वर्ष २०११ के ९ सितंबर ‘९/११’ को जिस ‘वर्ल्ड ट्रेड सेंटर’ के ‘ट्वीन टॉवर’ पर हुए आतंकवादी आक्रमण में ३ सहस्र से अधिक अमेरिकी नागरिक मारे गए थे, उसका प्रतिशोध अमेरिका ने अंततः १ अगस्त २०२२ को ले ही लिया । इस आक्रमण का सूत्रधार (मास्टरमाइंड) तथा इसके लिए दोषी अल्-कायदा संगठन के प्रमुख ओसामा बिन लादेन का दायां हाथ तथा उसके पश्चात इस संगठन का सर्वेसर्वा बने आयमन-अल-जवाहिरी को अमेरिका ने ‘ड्रोन’ क्षेपणास्त्र (मिसाइल) से मार गिराया ।
मिस्र के एक धनी परिवार में जन्मा, व्यवसाय से नेत्रचिकित्सक और अरब राष्ट्रों की सरकारों को सत्ताच्युत करानेवाला, सुन्नी इस्लामिक विचारों को पुनर्जीवित करने के काम में लगा जवाहिरी, लादेन से जा मिला और अपने आतंकवादी गुट को अल्-कायदा में विलीन कर दिया । इजिप्त में भूमिगत रहकर और गुप्तचर संस्थाओं को चकमा देते हुए अल जवाहिरी अल्-कायदा में आतंकवादियों को भरती कर उन्हें प्रशिक्षित करता था । उसने भारत, बाली, मोम्बासा, रियाध, जकार्ता, इस्तांबुल, इंग्लैंड सहित विश्व के अनेक नगरों में आतंकवादी आक्रमण किए । उसने अमेरिकी जहाज पर आक्रमण कर उसके १७ नौसैनिकों को मार डाला था, तो केनिया और तंजानिया में स्थित अमेरिकी दूतावासों पर आक्रमण कर भी कुछ कर्मचारियों को मार डाला था । ‘९/११’ को हुए आक्रमण के लिए उसने आत्मघाती आक्रमणकारी तैयार किए तथा धन की भी व्यवस्था की थी । विश्व का पहला और विगत २१ वर्षाें से अमेरिका को वांछित इस आतंकवादी को इसके पहले भी २ बार मारने का प्रयास किया गया था । अमरीकी सेना अफगानिस्तान में १० वर्ष रही । वहां से सेना हटाते समय अमेरिका और अफगानिस्तान के बीच समझौता हुआ था; फिर भी शत्रु को पूर्णत: समाप्त करने की तीव्र आकांक्षा के कारण अमेरिकाने अपने देश पर आक्रमण करनेवाले सूत्रधारको अन्तत: समाप्त कर ही दिया ! अफगानिस्तान के गृहमंत्री हक्कानी ने काबुलस्थित अपने घर में शरण दिया था । इससे सिद्ध होता है, ‘आतंकवादियों को स्थान नहीं देंगे’, इस नियम का उसने स्पष्ट उल्लंघन किया है । इसलिए, अमेरिका ने आक्रमण के विषय में किए गए समझौते का उल्लंघन किया है, यह कहने का अधिकार अफगानिस्तान को नहीं है । इसमें विशेष बात यह है कि पाकिस्तानी गुप्तचर संस्था आई.एस.आई. की सुरक्षा में जवाहिरी रह रहा था ! इसलिए, इस प्रकरण में पाक का भी हाथ होने की शंका व्यक्त की जा रही है । लक्ष्य दिखाई देने पर, ‘यही अचूक लक्ष्य है’, यह ड्रोन के छायाचित्र से जुडी प्रणाली को पता लग जाता है और तब घातक ६ धारदार ब्लेड से युक्त ‘हेलफायर’ क्षेपणास्त्र अचूकता से उसपर दाग दिया जाता है ।’ ऐसी विशेष प्रणाली से सज्जित क्षेपणास्त्र अमेरिका ने अफगानिस्तान जैसे प्रदेश पर आक्रमण करने के लिए बनाया है । हिन्द महासागर में तैनात विमानवाहक युद्धपोत पर से उडा यह ड्रोन जब अपने निर्धारित लक्ष्य के पास पहुंचा, तब यह क्षेपणास्त्र छोडा गया और अनेक वर्षाें के प्रयत्न के पश्चात सहस्त्रों कि.मी. दूर स्थित शत्रु को समाप्त किया गया ।

भारत को भी धाकड नीति अपनानी आवश्यक !
अमेरिका और भारत के मध्य ३ सुरक्षा समझौते हुए हैं । उसके अनुसार भारत की गुप्तचर संस्था और अमेरिका की गुप्तचर संस्था एक-दूसरे के साथ गुप्त सूचनाओं का आदान-प्रदान करेंगी । भारत की सीमा पाक और अफगानिस्तान से सीमा से लगती है । इसलिए, इस आधार पर भारत की दी हुई स्थानीय गुप्त जानकारी और अमेरिका की उच्च तकनीक की सहायता से यह लक्ष्य साधा गया है, यह बात सेना के एक निवृत्त अधिकारी ने बताई है । अमेरिका की भांति भारत में भी अनेक स्तरों पर हुए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष आतंकवादी कृत्यों के पीछे जवाहिरी का हाथ था । इसलिए, भारत के लिए भी यह घटना महत्त्वपूर्ण है । नूपुर शर्मा प्रकरण में भारत का वातावरण बिगाडने के पीछे भी अल्-कायदा का बडा हाथ है । उसके पश्चात हुई हिन्दुओं की हत्याओं के पीछे भी इस संगठन के लोग थे, यह उजागर हुआ है । इसलिए, इस घटना के पश्चात भाजपा के नेता रवि किशन ने जो प्रतिक्रिया दी है, वह अत्यंत विचारणीय है । उन्होंने कहा, ‘‘भारत में आतंकवादी गतिविधियां आरंभ रखनेवाले ‘स्लिपर सेल’ सक्रिय हैं । भारत में ऐसे कितने ही अल्-जवाहिरी छिपे हैं ! ये लोग अपने पीछे सहस्त्रों आतंकवादी बनाकर रखते हैं ।’’ उन्होंने इस बात पर बल दिया कि आतंकवादियों को ढूंढ-ढूंढ कर मारना चाहिए । कदाचित, धर्मनिरपेक्षतावादियों को उनकी यह बात अच्छी न लगे और वे उसका विरोध करना भी आरंभ कर दें; परंतु ‘आतंकवाद को समाप्त ही करना पडता है’, यह एक अटल सत्य है । विश्व के सभी देशों की भांति भारत को भी यह देखना होगा कि इन आतंकवादियों को होनेवाली वित्तीय सहायता और शस्त्रों की आपूर्ति का स्रोत, उन्हें दिए जानेवाले शस्त्रों के प्रशिक्षण केंद्र, उन्हें कट्टरता की शिक्षा देकर उनका मन परिवर्तन करनेवाले शिक्षाकेंद्र, आतंकवादियों को सब प्रकार से सहायता करनेवाले सामाजिक प्रसारमाध्यम आदि सभी माध्यमों से आतंकवादियों को मिलनेवाली सहायता कैसे बंद होगी । २ बार ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ कर भारत ने अपना सामर्थ्य दिखा दिया है । फिर भी, वर्तमान में कश्मीर में प्रतिदिन होनेवाली आतंकवादियों की घुसपैठ और सामान्य नागरिकों की हत्या को देखते हुए ‘और अधिक कठोर कार्रवाई करनी अपेक्षित है’, ऐसा लगता है । ‘२६/११’ (मुंबई पर २६ नवंबर २००८ को हुए आतंकवादी आक्रमण) के सूत्रधार हाफिज सईद हो अथवा दाऊद, वे अभी भी खुले में घूम रहे हैं । ‘अमेरिका अपने पर हुए आक्रमण का प्रतिशोध लिए बिना नहीं चूकता’, यह बात वहां के अध्यक्ष जो. बायडेन ने अभिमान के साथ कही । पूरे भारत में धर्मांधों के अनेक छोटे-बडे कृत्यों और आक्रमणों से प्रतिदिन उत्पन्न होनेवाला आतंकवादियों का भय सर्वदा के लिए समाप्त होना चाहिए । ‘भारत को भी आतंकवादी तैयार करनेवाली संस्थाओं को समूल नष्ट करने के लिए इसी प्रकार की कठोर कार्रवाई करनी चाहिए’, ऐसा राष्ट्रप्रेमियों को लगता है !
Asim Munir Assassination Plan : इजरायल के गुप्तचर संगठन ‘मोसाद’ने रचा था पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर की हत्या का षड्यंत्र ।
१० सहस्त्र से १ लाख लोगों की मृत्यु की आशंका ।
‘भारत ऐसी चीजों पर कभी पैसा खर्च नहीं करेगा’, यह कहकर Trump ने ही प्रस्ताव निरस्त किया ।
हमें हिन्दू धर्म के प्रति घृणा के विरोध में दृढतापूर्वक खडा होना चाहिए ! – US Congressman Sanford Bishop
Resolution Over Iran War : ईरान के विरुद्ध सैन्य कार्यवाही रोकने वाला प्रस्ताव अमेरिका की संसद के उच्च सदन में पारित
(और इनकी सुनिए…) ‘मानवाधिकारों का उल्लंघन होने पर भारत की आलोचना करने से पीछे नहीं हटेंगे !’ – US Lawmakers