
नई दिल्ली – बुरखे से स्वयं को ढंकना, यह मैं अधिकार नहीं समझती, यह स्त्री पर हुए अत्याचार का प्रतीक है । बुरखा और हिजाब (मुसलमान महिलाओं के गले और गर्दन ढंकने का वस्त्र) का ‘महिलाओं को लैंगिक वस्तु बनाना’, यह एक ही उद्देश्य है । यह कपडे का टुकडा मुसलमान महिलाओं पर हुए अत्याचार और अपमान का प्रतीक है । स्त्रियों को देखते ही लार टपकाने वाले पुरुषों से स्त्रियों को स्वयं को छुपाना पडता है, यह वस्तुस्थिति स्त्री और पुरुष दोनों के लिए सम्माननीय नहीं, ऐसा मत बांगलादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने ‘द प्रिंट’ इस वृत्त संकेतस्थल पर प्रकाशित हुए लेख में व्यक्त किया है ।
बुरखा, हिजाब ब्रेन वॉशिंगचा परिणाम! https://t.co/vAN4FaIV8l
— taslima nasreen (@taslimanasreen) February 13, 2022
तस्लीमा नसरीन द्वारा लेख में प्रस्तुत किए सूत्र
१. जब किसी महिला को हिजाब पहनने के लिए बाध्य किया जाता है, ऐसे समय मैं हिजाब फेंकने वालों की ओर से खडी रहती हूं । व्यक्तिगत तौर पर मैं बुरखा और हिजाब के विरोध में हूं । ‘महिलाओं को बुरखा पहनने के लिए विवश करना यह पितृ सत्ता का षडयंत्र है’, ऐसा मुझे लगता है ।
२. हिजाब पर हो रहा संघर्ष रोकने के लिए समान नागरिक कानून और एक समान गणवेश आवश्यक है । धर्म का अधिकार यह शिक्षा के अधिकार से ऊपर का नहीं ।
३. बुरखा और हिजाब, स्त्री की पसंद कभी भी नहीं हो सकते । पसंद हटा दिए जाने के बाद ही उसे पहना जाता है । राजनीतिक इस्लाम के समान बुरखा और हिजाब भी आज राजनीतिक है । परिवार के लोग महिला को बुरखा और हिजाब पहनने के लिए विवश करते हैं । यह बचपन से नियमित बुद्धिभेद (माइंडवाश) करने का परिणाम है । बुरखा और हिजाब जैसे धार्मिक परिधान, व्यक्ति की पहचान कभी नहीं हो सकते ।
४. बंटवारे के ७४ वर्षों बाद भी हिन्दू और मुसलमान के बीच अंतर कम नहीं हुआ है । पाकिस्तान भारत से अलग होकर ‘धार्मिक राष्ट्र’ बना है; लेकिन भारत को कभी भी पाकिस्तान नहीं होना था । यह ७४ वर्ष पहले आसानी से ‘हिन्दू राज्य’ बन सकता था । भारतीय संविधान धर्मनिरपेक्षता का समर्थन करता है, धर्म का नहीं । बहुसंख्यक हिन्दू जनसंख्या होने वाला भारत विश्व के दूसरे क्रमांक की मुसलमान जनसंख्या होने वाला देश है । भारत के कानून सभी धर्म, जाति, भाषा, पंथ और संस्कृति के लोगों को समान अधिकार देते हैं ।
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