आश्विन पूर्णिमा (१९ अक्टूबर)

कोजागरी पूर्णिमा के दिन रात्रि को लक्ष्मी तथा इंद्र की पूजा की जाती है । कोजागरी पूर्णिमा की कथा इस प्रकार है कि बीच रात्रि में लक्ष्मी पृथ्वी पर आकर जो जागृत है, उसे धन,अनाज तथा समृद्धि प्रदान करती है । इस लेख द्वारा इस दिन का महत्त्व तथा पूजाविधि की जानकारी देखेंगे ।
१. तिथि
कोजागरी पूर्णिमा का उत्सव आश्विन पूर्णिमा की तिथि को मनाया जाता है ।
२. इतिहास
श्रीमद्भागवत के कथनानुसार इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने व्रजमंडल में रासोत्सव मनाया था ।
३. उत्सव मनाने की पद्धति
‘इस दिन नवान्न (नए धान्य से) भोजन बनाते हैं । इस व्रत के रात्रिकाल में लक्ष्मी एवं ऐरावत पर बैठे इंद्र की पूजा की जाती है । पूजा के पश्चात देव व पितरों को कच्चा चिवडा (पोहे) एवं नारियल का जल समर्पित कर उसका प्राशन नैवेद्य के रूप में करते हैं; तदुपरांत उसे सभी में बांटते हैं । शरद ऋतु की पूर्णिमा की श्वेत चांदनी में चंद्र को गाढे किए गए दूध (खीर) का नैवेद्य चढाते हैं । चंद्र के प्रकाश में एक प्रकार की आयुर्वेदिक शक्ति है । इसलिए यह दूध आरोग्यदायी है । इस रात जागरण करते हैं । मनोरंजन के लिए विविध खेल बैठकर खेलते हैं । अगले दिन सवेरे पूजा के उपरांत पारण (व्रत के उपरांत पहला भोजन करने की क्रिया) करते हैं ।’’
४. कोजागरी पूर्णिमा के दिन लक्ष्मी तथा इंद्र की पूजा की जाती है । उसके कारण इस प्रकार हैं ..
इन दो देवताओं को पृथ्वी पर तत्त्व रूप से अवतरने के लिए चंद्र आग्रहात्मक आवाहन करता है । लक्ष्मी आल्हाददायक तथा इंद्र शीतलतादायक देवता है । इस दिन वातावरण में ये दो देवता तत्त्वरूप में आते हैं तथा उनका तत्त्व अधिक मात्रा में कार्यरत रहने के कारण उनकी पूजा की जाती है ।
(संदर्भ : सनातन का ग्रंथ ‘धार्मिक उत्सव एवं व्रतों का अध्यात्मशास्त्रीय आधार’)
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