धर्मांधों का शाहीन बाग का ‘सी.ए.ए.’ विरोधी आंदोलन
न्यायालय को जो लगता है, क्या वह प्रशासन और पुलिस को नहीं लगता ? उन्होंने उसी समय अवैध पद्धति से आंदोलन करनेवालों के विरुद्ध कार्यवाही क्यों नहीं की ? न्यायालय को आंदोलकों सहित जनता को कष्ट सहन करने के लिए बाध्य करनेवाले पुलिसवालों और प्रशासन के विरुद्ध भी कार्यवाही करनी चाहिए !

नई देहली – कोई भी व्यक्ति अथवा समूह सार्वजनिक स्थान को रोककर नहीं रख सकता । कोई सार्वजनिक स्थान अनिश्चित समय के लिए नियंत्रण में नहीं लिया जा सकता । विरोध प्रदर्शन अथवा आंदोलन करने का अधिकार एक अलग बात है; परंतु अंग्रेजों के कार्यकाल में जिस प्रकार विरोध किया जाता था, वैसा आज करना उचित नहीं होगा, इन शब्दों में सर्वाेच्च न्यायालय ने धर्मांधों द्वारा ‘नागरिकता सुधार अधिनियम (सीएए)’के विरुद्ध किए गए अवैध आंदोलन के लिए उन्हें फटकारा है ।
न्यायालय ने आगे कहा कि,
१. विरोध दर्शाने हेतु सार्वजनिक स्थान अथवा सडकें नहीं रोकी जा सकती । ऐसी स्थिति उत्पन्न होने पर सरकारी अधिकारियों को सडकें और सार्वजनिक स्थानों को तत्काल खोलने के लिए कार्यवाही करनी चाहिए । किसी भी प्रकार का विरोध अथवा आंदोलन निर्धारित स्थानों पर ही होना चाहिए । आंदोलकों द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर किया जानेवाला विरोध अथवा उस स्थान को रोककर रखना जनता के अधिकारों का हनन है और कानून इसकी अनुमति नहीं देता ।
२. शाहीन बाग में मध्यस्थता के प्रयास सफल नहीं हुए; परंतु हमें इसका कोई पश्चाताप नहीं है । कोई भी आंदोलन निर्धारित किए हुए स्थानों पर ही होने चाहिए । भारत का संविधान विरोध करने का अधिकार अवश्य देता है; परंतु उसके साथ कर्तव्य का पालन भी किया जाना चाहिए ।
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