साधकों को नामजपादि उपचार रूपी आध्यात्मिक संजीवनी देनेवाले पूज्य (डॉ.) मुकुल गाडगीळजी सद्गुरु पद पर विराजमान !

विनम्रता, शोध वृत्ति और साधकों के आध्यात्मिक कष्ट अल्प
होने हेतु दिन-रात उन पर नामजपादि उपचार करने के लिए तत्पर
पू. (डॉ.) मुकुल गाडगीळजी (आयु ५६ वर्ष) समष्टि सद्गुरु पद पर विराजमान !

परात्पर गुरु डॉ. आठवले

‘वर्ष २००० से सनातन के कार्य के लिए समर्पित पू. (डॉ.) मुकुल गाडगीळजी ने आश्रम को ही अपना सबकुछ माना । ‘ईश्‍वर के प्रति भावभक्ति तथा उसके साथ प्राप्त वैज्ञानिक दृष्टि’ पू. (डॉ.) मुकुल गाडगीळजी की विशेषता है । ऐसा उदाहरण बहुत दुर्लभ होता है । सूक्ष्म समझने की अपार क्षमता होने से किसी व्यक्ति के स्पंदनों से उन्हें उसे हो रहे अनिष्ट शक्तियों के कष्टों के संदर्भ में ज्ञात होता है । साधकों के आध्यात्मिक कष्ट दूर हों; इसके लिए वे साधकों को अचूकता एवं तत्परता के साथ नामजपादि उपचार ढूंढकर देते हैं । उनके द्वारा बताए उपचार करने से साधकों के कष्ट तुरंत घट जाते हैं । रात्रि-मध्यरात्रि कभी भी वे साधकों पर आध्यात्मिक उपचार करने हेतु तत्पर रहते हैं । उनके बताए उपचार इतने परिणामकारक हैं कि उनके कारण साधकों के कष्ट तुरंत घट जाते हैं । प्रतिदिन अनेक साधकों के लिए उपचार ढूंढकर उन्हें कष्टमुक्त करनेवाले पू. गाडगीळजी एकमेवाद्वितीय हैं । उनके कारण ‘अब साधकों पर आध्यात्मिक उपचार कौन करेगा’, मेरी यह चिंता दूर हो गई है ।’

विनम्र, शांत, शोधवृत्ति से युक्त, अभ्यासी वृत्ति तथा सहजावस्था में रहनेवाले पू. (डॉ.) गाडगीळजी ने आज के इस मंगल दिवस पर ८१ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर प्राप्त किया है तथा अब वे सनातन के समष्टि सद्गुरु पद पर विराजमान हो गए हैं ।

‘महर्षियों ने सद्गुरु (डॉ.) गाडगीळजी की पत्नी श्रीमती अंजली गाडगीळजी को; श्री चित्शक्ति; कहकर गौरवान्वित किया है ।’ सद्गुरु मुकुल गाडगीळजी के सास-ससुर अर्थात पू. परांजपे दंपति संतपद पर विराजमान हैं । एक ही परिवार के ४ सदस्यों का उच्च आध्यात्मिक स्तर प्राप्त करना एक अलौकिक घटना है तथा उनके रूप में सनातन को एक अद्वितीय परिवार मिला है ।

इसी प्रकार सद्गुरु (डॉ.) गाडगीळजी की उन्नति भी तीव्र गति से हो, यह भगवान श्रीकृष्णजी के चरणों में प्रार्थना !   

– (परात्पर गुरु) डॉ. आठवले

सद्गुरु (डॉ.) मुकुल गाडगीळजी

     सनातन आश्रम, रामनाथी (गोवा) – चाहे साधकों को हो रहे आध्यात्मिक स्वरूप के कष्ट हों, समष्टि कार्य में आनेवाली अनिष्ट शक्तियों की बाधाएं हों अथवा साधकों की गंभीर बीमारियां हों; आध्यात्मिक स्तर पर सभी प्रकार के कष्टों के निवारण हेतु साधकों को सनातन के पू. (डॉ.) मुकुल गाडगीळजी का ही स्मरण होता है ! अल्प अहं, सूक्ष्म समझने की अपार क्षमता तथा अखंड आनंदित एवं उत्साहित रहकर साधकों की सहायता हेतु दिन-रात तत्पर पू. (डॉ.) मुकुल गाडगीळजी (आयु ५६ वर्ष) ३१ मई २०२० को सनातन के समष्टि सद्गुरु पद पर विराजमान हुए ! आश्रम के फलक द्वारा साधकों को यह शुभ समाचार दिया गया । तत्पश्‍चात सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत बाळाजी आठवलेजी की आध्यात्मिक उत्तराधिकारिणी श्रीसत्शक्ति श्रीमती बिंदा सिंगबाळजी एवं श्रीचित्शक्ति श्रीमती अंजली गाडगीळजी (सद्गुरु (डॉ.) मुकुल गाडगीळजी की पत्नी) ने उनसे भेंट की ।

     इस समय उन्होंने पू. (डॉ.) मुकुल गाडगीळजी को उनके सद्गुरु पद पर विराजमान होने के उपलक्ष्य में सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत बाळाजी आठवलेजी का दिया संदेश बताया । श्रीचित्शक्ति श्रीमती अंजली गाडगीळजी ने सनातन संस्था की ओर से सद्गुरु (डॉ.) मुकुल गाडगीळजी को माल्यार्पण कर तथा भेंटवस्तु प्रदान कर उन्हें सम्मानित किया ।

सद्गुरु पद पर विराजमान होने के विषय में सद्गुरु (डॉ.) मुकुल गाडगीळजी का विनम्र मनोगत

     सद्गुरुपद पर विराजमान होने की वार्ता सुनकर आनंद हुआ । श्रीसत्शक्ति श्रीमती बिंदा सिंगबाळजी और श्रीचित्शक्ति श्रीमती अंजली गाडगीळजी समान मेरी भी हिन्दू राष्ट्र-स्थापना के लिए कार्य करने की इच्छा है । मैं प्रार्थना करता हूं कि ‘ईश्‍वर मुझसे वैसे प्रयत्न करवाकर लें ।’

(सद्गुरु (डॉ.) मुकुल गाडगीळजी के इस मनोगत से उनकी विनम्रता और हिन्दू राष्ट्र-स्थापना की तीव्र लगन दिखाई देती है । इसके साथ ही श्रीसत्शक्ति श्रीमती बिंदा सिंगबाळजी और श्रीचित्शक्ति श्रीमती अंजली गाडगीळजी के प्रति उनका आदरभाव व्यक्त होता है । – संकलनकर्ता)

सद्गुरु (डॉ.) गाडगीळजी को पूर्वसूचना के रूप में दिखाई दिया दृश्य !

     जिस दिन आश्रम के फलक पर मेरे सद्गुरु पद पर विराजमान होने का लिखा गया था, उस दिन दोपहर मुझे अंदर से प्रतीत हुआ था कि आज फलक पर मेरे संदर्भ में ही कुछ है । अतः मैं उस संदर्भ में सूत्र निकालने बैठा था; उस समय मुझे यह प्रतीत हुआ कि ईश्‍वरीय प्रवाह मेरी दिशा में आ रहा है । उसके कारण मुझे शीघ्र ही सूत्र निकालना संभव हुआ । उस समय मुझे दृश्य दिखाई दिया कि ‘एक देवी मेरे गले में पुष्पमाला डाल रही हैं ।’ तब मैं छोटे बालक समान था और वह देवी विराट रूप में थीं । वास्तव में उसी दिन मेरे सद्गुरु पद पर विराजमान होने की घोषणा हुई और श्रीचित्शक्ति श्रीमती अंजली गाडगीळजी ने ही मेरे गले में पुष्पमाला डालकर मुझे सम्मानित किया । महर्षियों ने नाडीवाचन के माध्यम से समय-समय पर बताया है कि ‘श्रीसत्शक्ति श्रीमती बिंदा सिंगबाळजी एवं श्रीचित्शक्ति श्रीमती अंजली गाडगीळजी क्रमशः भूदेवी एवं श्रीदेवी हैं । दोनों एकरूप होने के कारण मुझे दिखाई दिए दृश्य में एक ही देवी दिखाई दीं ।’

– (सद्गुरु) डॉ. गाडगीळ

श्रीचित्शक्ति श्रीमती अंजली गाडगीळजी की अनुभूति

(श्रीचित्शक्ती) श्रीमती अंजली गाडगीळ

     इस अनुभूति में सद्गुरु (डॉ.) गाडगीळजी को मैं देवी की भांति विराट, तो वे छोटे बालक की भांति दिखाई दिए । महर्षियों ने भी एक नाडीवाचन में कहा था, ”हे कार्तिकपुत्री (श्रीचित्शक्ति श्रीमती अंजली गाडगीळजी), तुम्हें तो वास्तव में १ संतति नहीं, अपितु २ संतानें हैं । एक है तुम्हारी पुत्री श्रीमती सायली करंदीकर और दूसरे तुम्हारे पति पू. (डॉ.) मुकुल गाडगीळजी (वर्तमान सद्गुरु (डॉ.) गाडगीळजी) ! तुम्हारे पति पू. (डॉ.) मुकुल गाडगीळजी का मन अत्यंत निर्मल है । उनका आचरण एक बालक के समान है ।” ‘अध्यात्म में बाह्य संबंधों का कोई महत्त्व नहीं होता । इस प्रकार नया-नया शास्त्र सीखने को मिलता है, इससे यह समझ में आता है ।’

– (श्रीचित्शक्ति) श्रीमती अंजली गाडगीळ

 

संतों को प्रतीत गुणविशेषताएं !

प.पू. दास महाराज

     ‘मेरा अनेक जन्मों का पुण्य है; इसलिए मुझे यह शुभसमाचार सुनने का अवसर मिला । श्रीरामचंद्रजी ने जिस प्रकार हनुमानजी को तैयार किया, उसी प्रकार परात्पर गुरुदेवजी ने सद्गुरु मुकुल गाडगीळजी को तैयार किया है । त्रेतायुग में हनुमानजी ने संजीवनी लाकर लक्ष्मणजी के प्राण बचाए, उसी प्रकार नामजपादि उपायों के माध्यम से सद्गुरु मुकुल गाडगीळजी साधकों को संजीवनी प्रदान कर रहे हैं !’

– प.पू. दास महाराज

सद्गुरु गाडगीळजी सनातन के साधकों के लिए संजीवनी !

पू. पृथ्वीराज हजारे

     ‘सद्गुरु गाडगीळजी सनातन के साधकों के लिए संजीवनी हैं’, ऐसा कहा जाए तो उसमें अतिशयोक्ति नहीं होगी । बाहर के चिकित्सालयों में विविध सुविधाएं होती हैं । अलग-अलग चिकित्साओं के लिए अलग-अलग विभाग होते हैं । बीमारी का अनुमान लगाने हेतु रक्त के परीक्षणों का ब्यौरा मिलने में न्यूनतम १ दिन तो लगता ही है । भले ही चिकित्सकीय अनुमान के लिए ऐसा हो; परंतु आध्यात्मिक स्तर पर निदान होने हेतु एक कक्ष में एक ही शरीर में सभी सुविधाओं से युक्त सद्गुरु गाडगीळजी हैं । उनके पास आध्यात्मिक कष्ट का तुरंत निदान होता है । हमारे लिए सद्गुरु गाडगीळजी गुरुदेवजी द्वारा प्रदान किए गए एक अनमोल वरदान हैं ।

– (पू.) श्री. पृथ्वीराज हजारे

सद्गुरु (डॉ.) मुकुल गाडगीळजी का आध्यात्मिक उन्नत परिवार !

नाम संबंध आध्यात्मिक स्तर
(प्रतिशत)
१.   श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली मुकुल गाडगीळ पत्नी ८७ (सद्गुरु)
२.   पू. सदाशिव नारायण परांजपे ससुर ७१ (संत)
३.   पू. (श्रीमती) शैलजा सदाशिव परांजपे सास ७१ (संत)
४.   श्री. माधव परमानंद गाडगीळ पिता ६८ (टिप्पणी)
५.   श्रीमती माधुरी माधव गाडगीळ माता ६२
६.   श्रीमती शैलजा फडके बुआ ६१
७.   श्री. मंदार गाडगीळ भाई ६१
८.   श्रीमती शीतल गोगटे साली ६५
९.   श्री. मनोज सहस्रबुद्धे साढू ६१

टिप्पणी : ६० से ६९ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर प्राप्त साधक जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हुए हैं ।

     ‘सनातन में सहस्रों साधक हैं; परंतु एक ही परिवार से संत और ६० प्रतिशत से अधिक स्तर प्राप्त सदस्योंवाला एक भी परिवार नहीं है; इसलिए गाडगीळ परिवार की जितनी प्रशंसा की जाए, अल्प ही है !’

– (परात्पर गुरु) डॉ. आठवलेजी                     

श्रीसत्शक्ति श्रीमती बिंदा सिंगबाळजी, श्रीचित्शक्ति श्रीमती अंजली गाडगीळजी एवं
सद्गुरु (डॉ.) मुकुल गाडगीळजी के संवाद से खुली सद्गुरु (डॉ.) गाडगीळजी की गुणविशेताएं !

१. ईश्‍वरप्राप्ति हेतु समर्पित सद्गुरु (डॉ.) मुकुल गाडगीळजी का दैवी परिवार !

(श्रीसत्शक्ति) श्रीमती बिंदा सिंगबाळ

     गाडगीळ परिवार की विशेषताएं बताते हुए श्रीसत्शक्ति श्रीमती बिंदा सिंगबाळजी ने कहा, ”समाज में स्थित परिवारों का झुकाव माया की ओर होता है । जब ऐसे परिवार एकत्रित होते हैं, तब वहां माया के विचारों का ही आदान-प्रदान होता है । वे एकत्रित दूरदर्शन के कार्यक्रम देखते हैं और घूमने के लिए जाते हैं । सनातन परिवार में स्थित अनेक परिवार माया के प्रवाह से दूर रहते हैं । गाडगीळ परिवार ईश्‍वरप्राप्ति तथा राष्ट्र एवं धर्म हेतु एक ऐसा ही समर्पित परिवार है । मैं विगत अनेक वर्षों से गाडगीळ परिवार के संपर्क में हूं । इतने वर्षों में मैंने ऐसे एक भी क्षण का अनुभव नहीं किया जब उनमें माया से संबंधित संवाद हो रहा हो । चाहे किसी भी समय मैं उनके यहां जाऊं, मैंने उनमें ईश्‍वरप्राप्ति हेतु प्रयास तथा साधना से संबंधित संवाद ही सुने हैं ।”

२. सद्गुरु (डॉ.) गाडगीळजी में विद्यमान अल्प अहं
के संदर्भ में परात्पर गुरु डॉक्टरजी द्वारा व्यक्त गौरवोद्गार !

(श्रीचित्शक्ती) श्रीमती अंजली गाडगीळ

     सद्गुरु अंजली गाडगीळजी ने कहा, ”वर्ष २००० में मेरी संगीत साधना आरंभ ही हुई थी । उस समय एक दिन परात्पर गुरुदेवजी ने मुझे उनके कक्ष में स्थित दर्पण के सामने खडे रहने के लिए कहा । उस समय दर्पण के सामने खडे रहकर मुझे क्या देखना है, यह समझ में नहीं आया । तब परात्पर गुरुदेवजी ने कहा, आप स्वयं का परीक्षण करें ।” मैंने दर्पण में स्वयं को देखा, उसके पश्‍चात उन्होंने मुझसे कहा, ”कितना अहं है न आपमें !” आप अपने पति गाडगीळजी का स्मरण करें । ”जब आपकी आंखों के सामने उनका मुखमंडल आता है, तब आपको क्या लगता है, यह बताईए ।”

     इस पर गाडगीळजी के मुखमंडल का स्मरण करने पर मुझे अच्छा लगा । मेरे वैसा बताने के पश्‍चात गुरुदेवजी ने कहा, ”उनमें अहं अल्प है; इसी कारण आपको अच्छा लगा । आपका भी मुखमंडल उनके जैसा होना चाहिए । गाडगीळजी में जन्म से ही अहं अल्प है और उसके पश्‍चात भी उन्होंने स्वयं में अहं को बढने नहीं दिया ।”

     उस अवधि में एक साधिका को अनुभूति हुई । उसे सद्गुरु गाडगीळजी के मुखमंडल के स्थान पर मेरा मुखमंडल दिखाई दिया । यह अनुभूति मेरे पढने में आने पर परात्पर गुरुदेवजी ने मुझे बुलाया और उस अनुभूति को दिखाते हुए उन्होंने कहा, ”केवल पति-पत्नी एक दूसरे के साथ एकरूप हुए, यह पर्याप्त नहीं है, अपितु इसके आगे जाकर हमें ईश्‍वर के साथ एकरूप होना है ।” इस प्रकार गुरुदेवजी प्रत्येक संबंधित चरण में हमें आगे ले जाते हैं ।

– श्रीचित्शक्ति श्रीमती अंजली गाडगीळ

३. साधकों को नामजप बताने की सेवा से स्वयं में
विद्यमान प्रगाढता एवं प्रेमभाव बढानेवाली सद्गुरु गाडगीळजी !

     श्रीसत्शक्ति श्रीमती बिंदा सिंगबाळजी ने बताया, ”देश-विदेश के साधक भी निःसंकोच पू. गाडगीळजी को नामजपादि उपचार पूछते हैं । पू. गाडगीळजी की विशेषता यह है कि साधक उन्हें अपनी सभी समस्याएं बता सकते हैं । साधक अपना कोई भी कष्ट उन्हें खुलकर बता सकते हैं । पू. गाडगीळजी चाहे किसी भी सेवा में हों; पहले वे साधकों का ध्यान रखते हैं । वे भले ही प्रसाद-महाप्रसाद ग्रहण कर रहे हों; परंतु जब साधक अपनी समस्याएं लेकर आते हैं, तो वे पहले उनकी समस्या का समाधान करते हैं । वे साधक को पूर्ण महत्त्व देकर तथा उनकी समस्या समझकर उपचार बताते हैं । यज्ञ अथवा किसी पूजा के समय भी साधक लघुसंदेश के द्वारा नामजप पूछते हैं । गाडगीळजी उस स्थिति में भी समय निकालकर तत्परता से सभी उपचार सूचित करते हैं ।”

     श्रीचित्शक्ति श्रीमती अंजली गाडगीळजी ने इस संदर्भ में कहा, ”आजकल यातायात बंदी के कारण मैं लंबे समय से आश्रम में ही हूं । तब मैंने बहुत निकटता से देखा कि उनकी रात की नींद भी पूर्ण नहीं होती । एक दिन सवेरे उन्होंने अल्पाहार नहीं किया था । दोपहर के भोजन का समय बीत गया; परंतु तब भी वे उपचार बताने की ही सेवा कर रहे थे । ऐसा होते हुए भी किसी कारण उन्हें चिडचिड नहीं होती । कभी-कभी नामजपादि उपचार करते समय ग्लानि आकर संबंधित साधक को कष्ट न हो; इसलिए वे मुझे बताते हैं कि नामजपादि उपचार करते समय मुझे नींद आए, तो मुझे जगा देना ।” उन्हें तीव्रता से लगता है कि ‘हमारे साधकों के कष्ट दूर होने चाहिए, उनकी साधना होनी चाहिए और साधक सदैव अच्छी स्थिति में रहने चाहिए ।’

४. सद्गुरु गाडगीळजी की सूक्ष्म को समझने की अपार क्षमता !

४ अ. साधक द्वारा कष्ट सूचित करने से पूर्व ही ईश्‍वरीय प्रेरणा से उपचार करना : ”उपचारों के प्रति सद्गुरु गाडगीळजी की लगन के कारण ईश्‍वर नींद में भी उन्हें यह सुझाते हैं कि ‘अमुक साधक को कष्ट हो रहा है ।’ ऐसे समय में वे नींद से जागकर साधकों के लिए नामजप करते हैं । ‘केवल साधक के पूछने पर ही उपचार बताया, ऐसा नहीं’, अपितु ‘उपचार पूछने में भी साधक का समय व्यर्थ न हो’; इसके लिए वे प्रयासरत रहते हैं । वे यह सब बिना आलस किए, बिना थके और निरंतर करते हैं ।” श्रीसत्शक्ति श्रीमती बिंदा सिंगबाळजी ने कहा, ”सद्गुरु गाडगीळजी श्रीचित्शक्ति श्रीमती अंजली गाडगीळजी के प्रति आदरभाव से बोलते हैं । सद्गुरु गाडगीळजी सदैव उनसे सीखने की स्थिति में रहते हैं ।”

५. अध्यात्म में उन्नत पत्नी से सीखने की स्थिति में होना

     ‘श्रीचित्शक्ति श्रीमती गाडगीळजी के प्रति आपका भाव क्या रहता है ?’, इस प्रश्‍न का सद्गुरु गाडगीळजी ने जो उत्तर दिया, उससे उनके उदात्त विचारों के दर्शन होते हैं । उन्होंने कहा, ”साधना में आने से पूर्व भी हम दोनों पति-पत्नी के रूप में एक-दूसरे का आदर करते थे । अब उनका आध्यात्मिक स्तर अधिक होने से वे आदरणीय ही हैं । मुझे कोई समस्या आई अथवा कोई व्यवधान आया, तो मैं सहजता से उनसे पूछता हूं । ‘उन्हें कैसे पूछें ?’, ऐसा नहीं लगता ।”

     श्रीचित्शक्ति श्रीमती अंजली गाडगीळजी ने बताया, उन्होंने एक बार कहा, ”कई बार पत्नी के पश्‍चात पति पत्नी के आगे बढता है । अब तुम्हारे पीछे मैं आऊंगा । उनमें पौरुष अहं नहीं है ।”

६. सम्मान के पश्‍चात परात्पर गुरु डॉक्टरजी की उत्तराधिकारिणी के नाते
श्रीचित्शक्ति श्रीमती अंजली गाडगीळजी के चरणों पर मस्तक रखकर नमस्कार !

     श्रीचित्शक्ति श्रीमती अंजली गाडगीळजी जब सद्गुरुपद पर विराजमान हुईं, तब उनका सम्मान करने के उपरांत भी सद्गुरु गाडगीळजी ने ‘परात्पर गुरु डॉक्टरजी की आध्यात्मिक उत्तराधिकारिणी’ के नाते श्रीमती गाडगीळजी के चरणों पर मस्तक रखकर नमस्कार किया ! सद्गुरु गाडगीळजी का वह भाव और उसी समय हाथ जोडे मुद्रा में श्रीचित्शक्ति श्रीमती अंजली गाडगीळजी के नेत्रों से अविरल बह रहे भावाश्रु कलियुग का एक अलौकिक दृश्य उत्पन्न कर रहे थे । उस प्रसंग से इन दोनों की ही उच्च आध्यात्मिक स्थिति के दर्शन हुए । इस अवसर पर श्रीचित्शक्ति श्रीमती गाडगीळजी ने अपना भाव व्यक्त करते हुए कहा, ”सभी साधकों के आशीर्वाद ने हमें बडा बनाया है ।”

साधकों को नामजपादि उपचार बतानेवाले सनातन के उपचारगुरु सद्गुरु (डॉ.) मुकुल गाडगीळजी !

कु. मधुरा भोसले

अ. सूक्ष्म समझने की क्षमता : ‘संगीत के कौन से राग बजाने पर किस कुंडलिनी चक्र पर परिणाम होता है’, ‘पंचतत्त्व के स्तर पर कौन सा परिणाम होता है’, इसका प्रगाढ अध्ययन कर वे कुछ क्षणों में ही उसका उत्तर देते हैं ।

आ. अखंड आंतरिक सान्निध्य तथा उसी समय समष्टि के साथ संपर्क होना उच्च आध्यात्मिक अवस्था का लक्षण : अखंड ईश्‍वर के आंतरिक सान्निध्य में रहते हुए भी वे उतनी ही सहज स्थिति में रहते हैं । उस स्थिति में भी वे समष्टि के साथ खुलेपन से बोल सकते हैं । अखंड आंतरिक सान्निध्य तथा उसी समय समष्टि से संपर्क उनकी उच्च अवस्था दर्शाते हैं । उनके सद्गुरु पद पर विराजमान होने की घोषणा के पश्‍चात सूक्ष्म से ‘उनके सहस्रार चक्र पर स्थित सहस्रदल कमल खिल उठा और संपूर्ण वातावरण में ब्रह्मकमल की सुगंध फैल गई’, ऐसा प्रतीत हुआ । अब उनके द्वारा अस्तित्व के स्तर पर उपाय होनेवाले हैं, यह इसी का दर्शक है ।
– कु. मधुरा भोसले, रामनाथी, गोवा.  

श्री. श्रीरामप्रसाद कुष्टे

     ‘कोरोना प्रकोप के काल में भी आध्यात्मिक बल बढाने हेतु नामजप बताकर सभी साधकों की रक्षा होने हेतु दिन-रात परिश्रम उठानेवाले सद्गुरु गाडगीळजी के चरणों में कृतज्ञता !’

– श्री. श्रीरामप्रसाद कुष्टे, फोंडा, गोवा.

     इस अंक में प्रकाशित अनुभूतियां, ‘जहां भाव, वहां भगवान’ इस उक्ति अनुसार साधकों की व्यक्तिगत अनुभूतियां हैं । वैसी अनूभूतियां सभी को हों, यह आवश्यक नहीं है । – संपादक

आध्यात्मिक कष्ट : इसका अर्थ व्यक्ति में नकारात्मक स्पंदन होना । व्यक्ति में नकारात्मक स्पंदन ५० प्रतिशत अथवा उससे अधिक मात्रा में होना । मध्यम आध्यात्मिक कष्ट का अर्थ है नकारात्मक स्पंदन ३० से ४९ प्रतिशत होना; और मंद आध्यात्मिक कष्ट का अर्थ है नकारात्मक स्पंदन ३० प्रतिशत से अल्प होना । आध्यात्मिक कष्ट प्रारब्ध, पितृदोष इत्यादि आध्यात्मिक स्तर के कारणों से होता है । किसी व्यक्ति के आध्यात्मिक कष्ट को संत अथवा सूक्ष्म स्पंदन समझनेवाले साधक पहचान सकते हैं ।

सूक्ष्म : व्यक्ति का स्थूल अर्थात प्रत्यक्ष दिखनेवाले अवयव नाक, कान, नेत्र, जिह्वा एवं त्वचा, ये पंचज्ञानेंद्रिय हैं । जो स्थूल पंचज्ञानेंद्रिय, मन एवं बुद्धि के परे है, वह ‘सूक्ष्म’ है । इसके अस्तित्व का ज्ञान साधना करनेवाले को होता है । इस ‘सूक्ष्म’ ज्ञान के विषय में विविध धर्मग्रंथों में उल्लेख है ।

बुरी शक्ति : वातावरण में अच्छी तथा बुरी (अनिष्ट) शक्तियां कार्यरत रहती हैं । अच्छे कार्य में अच्छी शक्तियां मानव की सहायता करती हैं, जबकि अनिष्ट शक्तियां मानव को कष्ट देती हैं । प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों के यज्ञों में राक्षसों ने विघ्न डाले, ऐसी अनेक कथाएं वेद-पुराणों में हैं । ‘अथर्ववेद में अनेक स्थानों पर अनिष्ट शक्तियां, उदा. असुर, राक्षस, पिशाच को प्रतिबंधित करने हेतु मंत्र दिए हैं ।’ अनिष्ट शक्ति के कष्ट के निवारणार्थ विविध आध्यात्मिक उपचार वेदादि धर्मग्रंथों में वर्णित हैं ।