Sanatan Prabhat Exclusive : महाराष्ट्र के तीर्थस्थलों की नदियां प्रदूषण के चंगुल में !

  • गांवों का गंदा पानी, औद्योगिक अपशिष्ट आदि बिना शुद्धिकरण के सीधे नदियों में छोडा जा रहा है । 

  • शुद्धिकरण के लिए कठोर कदम उठाने की आवश्यकता ।

श्री अजय केळकर, विशेष प्रतिनिधि, सनातन प्रभात

कोल्हापुर – कोल्हापुर स्थित साढे तीन शक्तिपीठों में से एक श्री महालक्ष्मी देवी के शक्तिपीठ के पास बहने वाली पंचगंगा नदी, वारकरियों के लिए पवित्र मानी जानेवाली पंढरपुर की चंद्रभागा, आळंदी की इंद्रायणी, पुणे की मुळा-मुठा नदी तथा आगामी कुंभमेले के लिए प्रसिद्ध नाशिक की गोदावरी सहित राज्य के तीर्थस्थलों के पास की नदियां प्रदूषण की चपेट में हैं । इतना ही नहीं, राज्य की ५३ नदियां प्रदूषण से प्रभावित हैं । बिना शुद्धिकरण के शहरों एवं गांवों का गंदा पानी सीधे नदियों में छोडा जाना, कारखानों का औद्योगिक अपशिष्ट बिना प्रक्रिया के नदी में मिलाना आदि स्पष्ट रूप से दिखाई देनेवाली समस्याओं पर प्रदूषण नियंत्रण मंडल एवं स्थानीय प्रशासन द्वारा केवल दिखावटी कार्रवाई किए जाने से नदियां प्रदूषित हो गई हैं ।

वर्ष २०२५ के आंकडों के अनुसार महाराष्ट्र में लगभग ९० करोड लीटर गंदा पानी उत्पन्न होता है । इसमें से ५० प्रतिशत से अधिक पानी बिना प्रक्रिया के सीधे नदियों में छोड दिया जाता है । आळंदी की इंद्रायणी नदी इतनी प्रदूषित हो चुकी है कि वारी के समय नगरपालिका प्रशासन को यह बोर्ड लगाना पडता है कि “इस पानी से स्नान न करें, इससे त्वचा रोग हो सकते हैं ।” इससे अधिक लज्जाजनक बात और क्या हो सकती है !

आध्यात्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होने के उपरांत भी, पंचगंगा नदी के शुद्धिकरण के प्रयास नहीं !

कोल्हापुर शहर के लिए जीवनदायिनी मानी जानेवाली और पांच नदियों के संगम से बनी पंचगंगा नदी में शहर के प्रमुख नाले सीधे मिलते हैं । एक रिपोर्ट के अनुसार कोल्हापुर शहर में प्रतिदिन ११०० लाख लीटर बिना प्रक्रिया का गंदा पानी उत्पन्न होता है । इसमें से १७० लाख लीटर से अधिक पानी बिना शुद्धिकरण के सीधे नदी में मिल जाता है । शहर के विभिन्न नालों के शुद्धिकरण की कोई व्यवस्था न होने से यह दूषित पानी सीधे नदी में जाता है, जिससे नागरिकों के स्वास्थ्य के साथ-साथ जलचर जीवों पर भी दुष्प्रभाव पडता है । हर वर्ष तेरवाड बांध सहित जिले के कई स्थानों पर मछलियां मरती हैं; परंतु प्रदूषण नियंत्रण मंडल को इसकी कोई चिंता नहीं होती । वे हमेशा की तरह दूषित पानी के नमूने लेते हैं, कागजी कार्रवाई करते हैं तथा चले जाते हैं । इस नदी के प्रदूषण का दोष महानगरपालिका प्रशासन एवं प्रदूषण नियंत्रण मंडल हमेशा श्रीगणेश मूर्ति विसर्जन पर डालते हैं ।

वारकरियों की श्रद्धा के साथ खिलवाड ! 

आळंदी की इंद्रायणी नदी अधिकांश महीनों में जलकुंभी से ढकी रहती है । लगातार बननेवाला सफेद झाग तथा आसपास के अनेक कारखानों से बिना प्रक्रिया का छोडा जानेवाला गंदा पानी अब सामान्य बात हो गई है । इंद्रायणी नदी की सफाई के लिए अनेक बैठकें हुईं, घोषणाएं की गईं; परंतु सब कुछ केवल कागजों तक सीमित रहा । वर्ष २०१७ में “नमामि चंद्रभागा” योजना की घोषणा हुई । लगभग ११० किलोमीटर क्षेत्र को इसमें समाहित किया गया । पुणे, सातारा और सोलापुर जिलों ने संयुक्त रूप से काम करने का निर्णय लिया; परंतु इच्छाशक्ति के अभाव में आगे कुछ नहीं हुआ । पंढरपुर की नदी के किनारों पर अब अतिक्रमण तथा अवैध रेत खनन बडी मात्रा में हो रहा है । इस पर भी लगातार ध्यान देने की आवश्यकता है ।

पुणे की मुळा-मुठा नदी की स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि उसका पानी काला पड गया है तथा उसमें पैर डालने का साहस भी सामान्य व्यक्ति नहीं कर सकता । इन सभी समस्याओं पर अब शासन एवं प्रशासन – दोनों स्तरों पर कठोर निर्णय लेने की आवश्यकता है । केवल वास्तविक कार्रवाई होने पर ही इन नदियों को प्रदूषण से मुक्त किया जा सकेगा ।

संपादकीय भूमिका

  • राज्य की प्रमुख नदियों की यह भयावह स्थिति होने के लिए उत्तरदायी कौन है ? हर बार हिन्दुओं के त्योहारों के समय प्रदूषण न हो, इस नाम पर हिन्दुओं को शास्त्रानुसार श्रीगणेश मूर्तियों का विसर्जन एवं अन्य धार्मिक क्रियाएं करने से रोकनेवाला प्रशासन, प्रदूषित नदियों की इस स्थिति के लिए किसे दंड देगा - या स्वयं को दंडित करेगा ? यदि नदियों की यह दुर्दशा ऐसी ही बनी रही, तो जनभावनाओं का विस्फोट नहीं होगा, इसकी क्या गारंटी है ?
  •  क्या नदियों के इस प्रदूषण पर अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति (अंनिस) वाले तथा तथाकथित बुद्धिवादी कुछ बोलेंगे ?