Malegoan Bomb Blast : वर्ष २००६ के बम विस्फोट घटना में ठप (ठहराव) स्थिति – मुंबई उच्च न्यायालय

  • राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने महाराष्ट्र आतंकवाद विरोधी दल तथा केंद्रीय जांच ब्यूरो के साक्ष्य की अनदेखी की ।

  • न्यायालय द्वारा न्यायिक विवेक का उपयोग न करने की टिप्पणी ।

मालेगांव – यहां वर्ष २००६ में हुए बम विस्फोटों की घटना की सुनवाई पूरी तरह ठप स्थिति में है, ऐसा निरीक्षण मुंबई उच्च न्यायालय ने इस विषय में ४ आरोपियों को आरोपमुक्त करते समय अपने निर्णय में प्रविष्ट किया । “संबंधित एजेंसियों द्वारा एकत्र किए गए साक्ष्यों की राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने पूरी तरह अनदेखी की । जांच में ऐसी विसंगतियों को विशेष NIA न्यायालय ने भी अनदेखा किया”, ऐसी गंभीर टिप्पणी उच्च न्यायालय ने की है ।

८ सितंबर २००८ को नासिक जिले के मालेगांव में ४ बम विस्फोट हुए थे । इस घटना में महाराष्ट्र आतंकवाद विरोधी दल तथा केंद्रीय जांच ब्यूरो ने ९ मुसलमान युवकों को गिरफ्तार कर उनके विरुद्ध आरोपपत्र प्रविष्ट किया था, परंतु राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने उन्हें “क्लीन चिट”(दोष मुक्त) करके राजेंद्र चौधरी, धनसिंह, मनोहर नरवरिया एवं लोकेश शर्मा इन ४ आरोपियों को बंदी बनाकर उनके विरुद्ध आरोपपत्र प्रविष्ट किया।


इस पर खंडपीठ ने कहा कि –

  1. आतंकवाद विरोधी दल की जांच में ९ मुसलमान आरोपियों द्वारा षड्यंत्र रचने का स्पष्ट उल्लेख था। मिट्टी के नमूनों एवं एक आरोपी के गोदाम से मिले नमूनों में आरडीएक्स के अंश पाए गए थे, परंतु राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने उस जांच तथा आरोपपत्र को पूरी तरह अनदेखा कर दिया ।
    इन ४ आरोपियों के विस्फोट में सम्मिलित होने का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं था । फिर राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने आगे जांच कर साक्ष्य क्यों नहीं जुटाए ?, यह एक गंभीर प्रश्न है ।
  2. महाराष्ट्र आतंकवाद विरोधी दल तथा राष्ट्रीय जांच एजेंसी के आरोपपत्रों में पूरी तरह विरोधाभास है । इसके कारण यह घटना इस समय ठप (ठहराव) की स्थिति में है ।
  3. हत्या जैसे गंभीर अपराध में आरोप तय करते समय निचली अदालत को पर्याप्त साक्ष्य हैं या नहीं, इसकी सावधानीपूर्वक जांच करना आवश्यक होता है,परन्तु जांच एजेंसी द्वारा प्रस्तुत तथ्यों की विसंगतियों को अनदेखा कर केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर आरोप तय किए गए ।
  4. न्यायालय ने न्यायिक विवेक का उचित उपयोग नहीं किया । आरोपियों के विरुद्ध अभियोग चलाने के लिए पर्याप्त साक्ष्य न होने के कारण आरोप तय करने का आदेश समाप्त कर उन्हें आरोपमुक्त किया जाता है ।