न्यायालय का संदेह है कि नए नियमों में किए गए प्रावधानों में स्पष्टता न होने से उनका दुरूपयोग हो सकता है !

नई देहली – विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के (यूजीसी – यूनिवर्सिटी ग्रांट कमिशन के) नए नियमों में किए गए प्रावधानों में स्पष्टता नहीं है, जिससे उनका दुरूपयोग हो सकता है, यह कारण देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने इन नियमों पर अंतरिम रोक लगाई है । न्यायालय ने केंद्र सरकार को इन नियमों का प्रारूप पुनः तैयार करने का निर्देश दिया । इसकी अगली सुनवाई मार्च के महिने में होगी तथा तब तक यह रोक जारी रहेगी ।
⚖️ Vishnu Jain: Supreme Court stays new UGC equity rules 🚨
Counsel @Vishnu_Jain says the Court has kept the new UGC regulations in abeyance and ordered that UGC Regulations, 2012 will continue till further orders.
📅 Next hearing: March 19
The General Category students had… https://t.co/H5XbfL0eXW pic.twitter.com/B3ixZn8OOW
— Sanatan Prabhat (@SanatanPrabhat) January 29, 2026
क्या हम विपरीत दिशा में जा रहे हैं ?

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने केंद्र सरकार से पूछा कि हमने जातिविहीन समाज की दिशा में कितनी प्रगति की है ? हमें स्वतंत्रता मिलकर ७५ वर्ष बीत गए, तब भी हम समाज को जातिमुक्त नहीं कर पाए । अब इस नए कानून के कारण क्या हम और पीछे जा रहे हैं ? पीडित लोगों को न्याय से वंचित रखा नहीं जा सकता । हमें सामान्य प्रवर्ग की शिकायतों से कोई लेना-देना नहीं है । हमारी चिंता यह है कि आरक्षित समुदायों के लिए निवारण प्रणाली लागू बनी रहनी चाहिए ।
कुछ विधिज्ञों की समिति इस पर विचार करेगी ! – मुख्य न्यायाधीश का मत
सुनवाई के समय याचिकाकर्ताओं ने इन नियमों को निरस्त करने की मांग करते हुए उस पर तुरंत रोक लगाने की मांग की । याचिकाकर्ताओं ने ऐसा कहा कि हमें अनुमति मिली, तो हम उचित नियम तैयार कर सकते हैं । इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि कुछ विधिज्ञों की समिति इस पर विचार करे, यह हमारी इच्छा है ।
सामान्य प्रवर्ग के छात्रों के उत्पीडन की संभावना ! – याचिकाकर्ता
एका याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने बताया कि मैं यदि सामान्य प्रवर्ग का हूं, तो वरिष्ठ छात्र मुझे देखकर मैं नया हूं, यह समझ जाएंगे तथा उसके उपरांत मेरा उत्पीडन होगा । वह वरिष्ठ छात्र यदि अनुसूचित जाति का होगा, तो मुझ पर कार्रवाई होगी । इस पर न्यायालय ने पूछा, ‘इन प्रावधानों को देखते हुए क्या आपकी उत्पीडन की शिकायत पर विचार किया जाएगा ?’ अधिवक्ता ने उत्तर देते हुए कहा, ‘नहीं; परंतु मेरे पास अन्य कोई विकल्प ही नहीं है । इसमें अग्रीम जमानत का विकल्प ही शेष नहीं है; क्योंकि सरकार ने इसमें संशोधन किए हैं । इससे छात्र का ‘करियर’ ध्वस्त होगा । जिस छात्र को उत्पीडन सहना पडा, उसके संदर्भ में उत्पीडन की व्याख्या इन नियमों से हटाई क्यों गई ? ये विनियम केवल जाति पर आधारित सूत्रों तक ही सीमित हैं । वे प्रत्यक्ष वास्तविकता का विचार नहीं करते । इसमें वरिष्ठ एवं कनिष्ठ के मध्य का अंतर अंतर्भूत नहीं है ।
नए नियमों के कारण समाज में शत्रुता बढेगी ! – अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन

सुनवाई के समय अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने बताया कि हम यूजीसी नियमों में अंतर्भूत ‘अनुच्छेद ३’ को चुनौती दे रहे हैं; क्योंकि उसमें जातिगत भेदभाव का उल्लेख है । इन नियमों में दी गई भेदभाव की व्याख्या संपूर्णतः उचित नहीं है । वह संविधान में समाहित समानता की भावना के विरुद्ध है । संविधान के अनुसार भेदभाव की समस्या देश के सभी नागरिकों से संबंधित है; परंतु यूजीसी का यह कानून केवल विशिष्ट प्रवर्ग तक ही सीमित है । सर्वोच्च न्यायालय ने इसके पूर्व जो आदेश दिए हैं, उस भावना के भी यह विरुद्ध है । इसके कारण समाज में शत्रुता बढेगी । यह संविधान के समानता के सिद्धांत को आहत करनेवाला है ।
नियमों का विरोध जारी !

पूरे देश में सवर्ण छात्रों एवं सामान्य नागरिकों का इन नए नियमों का विरोध करना जारी है । २९ जनवरी को छात्रों ने देहली विश्वविद्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन किया । उत्तरप्रदेश के लखनऊ विश्वविद्यालय परिसर में भी छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किया ।
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