Shankhnad Mahotsav Delhi : श्रीराम मंदिर के लिए कानूनी लडाई श्रीराम द्वारा दी गई अनुभूति ही है ! – अधिवक्ता श्रीधर पोतराजू, सर्वोच्च न्यायालय

  • सत्र : मंदिर-रक्षा चर्चासत्र

  • ‘मंदिर-रक्षा चर्चासत्र’ में दैवी अनुभूति सुनकर धर्मप्रेमी मंत्रमुग्ध !

बाएं से श्री. सुनील घनवट, वेदप्रचाररत्न वेदकुलपति श्री. जी.के. सीतारामन्, समाचार वाचिका श्वेता त्रिपाठी, अधिवक्ता श्रीधर पोतराजू, श्री. प्रमोद मुतालिक ।

भारत मंडपम्, देहली (वार्ता.) – श्रीराम मंदिर के लिए हिन्दुओं द्वारा न्यायालय के बाहर की गई लडाई अभूतपूर्व है; परंतु हम अधिवक्ताओं ने उस विषय में न्यायालय में जो लडाई लडी, वह हम सभी के लिए श्रीराम द्वारा उनके अस्तित्व की दी गई अनुभूति ही है । श्रीराम की कृपा के कारण ही ऋषितुल्य ज्येष्ठ अधिवक्ता केशव परासरन् ने ९२ वर्ष की आयु में भी यह लडाई दृढता (मजबूती) से लडी । उनमें दुर्दम्य श्रद्धा निर्माण करनेवाले भी श्रीराम ही हैं ! मैं अधिवक्ता परासरन् से वर्ष २०१७ में जुडा; परंतु इस संपूर्ण अभियोग के कारण मेरा दृढ मत हो गया कि ‘जीवन में ‘संयोग’ कभी नहीं होते, अपितु केवल दैवी कृपा ही होती है’, ऐसा भावपूर्ण प्रतिपादन सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीधर पोतराजू ने किया ।

अधिवक्ता श्रीधर पोतराजू

वह ‘भारत मंडपम्’ में चल रहे ‘सनातन राष्ट्र शंखनाद महोत्सव’ में १३ दिसंबर को आयोजित ‘मंदिर-रक्षा चर्चासत्र’ में बोल रहे थे । इस चर्चासत्र में तंजावूर, तमिलनाडु के श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के दैवी अंशों को संजोकर रखनेवाले परिवार के वेदप्रचाररत्न वेदकुलपति श्री. जी.के. सीतारामन्, कर्नाटक के श्रीराम सेना के संस्थापक श्री. प्रमोद मुतालिक एवं मंदिर महासंघ की ओर से हिन्दू जनजागृति समिति के महाराष्ट्र तथा छत्तीसगढ समन्वयक श्री. सुनील घनवट ने सहभाग लिया । प्रख्यात समाचार वाचिका श्वेता त्रिपाठी ने इस अवसर पर सूत्र संचालन किया ।

चर्चासत्र के आरंभ में सनातन संस्था के अधिवक्ता पू. सुरेश कुलकर्णी ने उपस्थितों का सत्कार किया । उसके उपरांत श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के दैवी अंशों के संदर्भ में जानकारी देनेवाली लघु फिल्म दिखाई गई । इस समय अधिवक्ता श्रीधर पोतराजू एवं श्री. जी.के. सीतारामन् द्वारा बताई गई अनुभूतियां सुनकर धर्मप्रेमी मंत्रमुग्ध हो गए ।

अब हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए कार्य करना है ! – वेदप्रचाररत्न वेदकुलपति श्री. जी.के. सीतारामन्, तंजावूर, तमिलनाडु

मेरी अनेक पीढियों ने श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के इन अंशों को संजोकर रखा एवं उनकी नित्य पूजा की । मुझे भी यह क्या है, यह ज्ञात नहीं था, फिर भी मैं १८ वर्ष तक उनका पूजन करता रहा । उसके उपरांत इन अंशों में विद्यमान चुंबकीय शक्ति के विषय में अनुसंधान करने के लिए मैंने इन अंशों को अनेक प्रयोगशालाओं में भेजा था; परंतु मेरे गुरुस्वरूप शंकराचार्य विजयेंद्र सरस्वती ने मुझे रोक दिया । उन्होंने कहा, ‘ये सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के अंश हैं ।’ ३० जनवरी २०२६ से ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ के संस्थापक गुरुदेव श्री श्री रविशंकरजी के मार्गदर्शन के अनुसार इन अंशों की भारतभर में दर्शन यात्रा रामेश्वरम् से आरंभ होगी । मैंने गत ३० वर्षों में ३६० विद्यार्थियों को वेद सिखाए । अब मेरी पत्नी के निधन के कारण मैनित्य अग्निहोत्र आदि विधियों से मुक्त हो गया । बेटा वेदपाठशाला का कार्य देख रहा है, इसलिए मुझे अब ‘हिन्दू राष्ट्र’ की स्थापना के कार्य में सहभागी होना है । जिन्हें इन श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंगों के दर्शन चाहिए हों, वे हमसे संपर्क करें, हम उनके पास आकर वह व्यवस्था करेंगे ।

मंदिरों की रक्षा हेतु शासनकर्ताओं को भी सहयोग करना चाहिए ! – प्रमोद मुतालिक, संस्थापक, श्रीराम सेना

प्रमोद मुतालिक

कर्नाटक के चिकमंगलूरु से ३० किलोमीटर की दूरी पर स्थित स्थान अर्थात दत्तपीठ ! इस स्थान पर श्री गुरु दत्तात्रेय ने साधना की थी; परंतु टीपू सुल्तान ने वहां बाबा बुडन दरगाह स्थापित कर दी । उसके बाद वहां के सैकडों एकड परिसर का मजारों, कब्रिस्तानों, दफनभूमि, दरगाह एवं गोमांस भक्षण के कारण इस्लामीकरण हो गया था; परंतु गत ३० वर्षों में विश्व हिन्दू परिषद, श्रीराम सेना तथा हिन्दुत्वनिष्ठ संगठनों द्वारा किए गए आंदोलनों तथा लडी गई न्यायालयीन लडाई के कारण ९० प्रतिशत परिसर दत्त भक्तों का बन गया है । अब केवल शुक्रवार को नमाज पढने के लिए मौलवी आता है । वह भी शीघ्र ही न्यायालय के आदेश से बंद हो जाएगा । मंदिर हिन्दुओं का जीवन हैं । इसलिए उनकी रक्षा के लिए आज के शासनकर्ताओं को भी सहायता करनी चाहिए ! यदि वल्लभभाई पटेल एक शासकीय आदेश निकालकर धर्मांधों द्वारा तोडे गए श्री सोमनाथ मंदिर को फिर से बनवा सकते हैं, तो उसी प्रकार आज सभी मंदिरों की रक्षा होनी चाहिए । मैं हिन्दुओं से आह्वान करता हूं कि वे इसके पश्चात धर्मांधों का सामना करने के लिए लडने की तैयारी रखें ।

मंदिर संस्कृति की रक्षा के लिए कार्यरत ‘मंदिर महासंघ’ ! – सुनील घनवट, महाराष्ट्र तथा छत्तीसगढ संगठक, हिन्दू जनजागृति समिति

सुनील घनवट

मंदिर महासंघ का कार्य मंदिर की परंपराओं की रक्षा, मंदिरों की रक्षा, मंदिरों-मंदिरों में समन्वय, मंदिरों का संगठन, तथा मंदिर ही धर्म शिक्षा के केंद्र—इस पंचसूत्री के अनुसार चालू है । गत ३ वर्षों में मंदिर महासंघ के माध्यम से १५ सहस्र मंदिरों के प्रतिनिधियों का संगठन किया गया है तथा २ सहस्र ३०० से अधिक मंदिरों में वस्त्र संहिता (ड्रेस कोड) लागू की गई है । मुंबई के मंदिर में वस्त्र संहिता लागू होने के उपरांत उसके परिणामस्वरूप केवल देश में ही नहीं, अपितु ऑस्ट्रेलिया जैसे देश में भी वस्त्र संहिता लागू हुई । वर्ष २००८ में महाराष्ट्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने साढे ४ लाख मंदिरों को अधिग्रहित करने के लिए कानून बनाया था; परंतु महासंघ द्वारा संगठित रूप से किए गए विरोध के कारण उस कानून को बस्ते में डालना पडा । आज भी कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने मंदिरों पर कर लगाने के लिए विधानसभा एवं विधान परिषद में कानून पारित किया था; परंतु महासंघ के विरोध के कारण राज्यपाल ने उस पर हस्ताक्षर नहीं किए । मंदिर धर्म शिक्षा के केंद्र बनें, इसके लिए किए गए प्रयासों के कारण प्रत्येक सप्ताह २० सहस्र हिन्दू आरती के लिए एक साथ आते हैं । कुल मिलाकर, मंदिर हिन्दुओं की आधारशिला हैं । इसलिए उनकी रक्षा के लिए एक होना, यह हमारा धर्मकर्तव्य ही है ।

अधिवक्ता श्रीधर पोतराजू द्वारा बताए गए विशिष्ट सूत्र

१. अभियोग की निरंतर ४० दिन तक सुनवाई चल रही थी, तब अधिवक्ता परासरन् आयु के कारण चल नहीं पाते थे । हम उन्हें पहिए वाली कुर्सी (व्हीलचेयर) पर बिठाकर न्यायालय ले जाते थे । उन्हें कृत्रिम दांत, कान में सुनने का यंत्र लगा हुआ था । घुटनों का दर्द होते हुए भी उन्होंने दृढता नहीं छोडी ।

२. अधिवक्ता परासरन् बताते थे कि उन्हें उनके एक कंधे पर श्रीकृष्ण एवं दूसरे कंधे पर श्रीराम बैठे हुए, ‘वही न्यायालय में सब कुछ सुझा रहे हैं’, ऐसा प्रतीत होता था ।

३. विरोधी पक्ष द्वारा ‘एक बार बनाई गई मस्जिद सदा मस्जिद ही रहती है’, ऐसा कहने पर उसका प्रतिवाद कैसे करना है, इस विषय में हम भ्रमित थे; परंतु तभी अधिवक्ता परासरन् ने दृढता से कहा, ‘एक बार बनाया गया मंदिर सदा मंदिर ही रहता है !’

४. अभियोग के समय साथ में रहे सह-अधिवक्ता योगेश्वरन् एवं भक्तिवर्धन सिंह जिस ग्रंथ पर भी हाथ रखते थे, वहां संबंधित प्रश्नों के उत्तर देने वाले प्रमाण मिलते थे ।

५. इस अभियोग में अचानक पुरातत्व विभाग ने ‘ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार’ (भूमि के नीचे के भाग की रडार द्वारा जांच करना) परीक्षण करने की मांग की । उससे भी ‘वहां भूमि के नीचे मंदिर था’, यही सिद्ध हुआ । इस अभियोग की प्रत्येक बात राम ही करवा रहे थे ।

६. यह अभियोग हिन्दुओं के अस्तित्व का प्रश्न था । ‘सनातन संस्कृति जीवित है’, यह सिद्ध करने की लडाई थी ।

यहां प्रसिद्ध की गई अनुभूतियां ‘जहां भाव है, वहीं देव हैं’ इस उक्ति के अनुसार साधकों की व्यक्तिगत अनुभूतियां हैं । वे सभी को एक समान आएंगी, ऐसा नहीं है । – संपादक