अगले सत्र में इस पर चर्चा होगी ।

नई दिल्ली – भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद डॉ. भीम सिंह ने राज्यसभा में दो निजी विधेयक प्रस्तुत किए । एक विधेयक में उन्होंने नियोजित नगरीय विकास हेतु प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय प्राधिकरण की स्थापना की मांग की, यद्यपि दूसरे विधेयक में उन्होंने भारतीय संविधान से ‘समाजवाद’ तथा ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों को हटाने की मांग की । इस निजी विधेयक का विपक्षी दलों ने तीव्र विरोध किया ।
🇮🇳 Debate Over the Preamble Heats Up! 🔥
BJP RS MP Bhim Singh has introduced a Private Member’s Bill to remove ‘Secular’ & ‘Socialist’ from the Preamble – calling their Emergency-era insertion “undemocratic.”
📜 He also cited Dr. Ambedkar, saying the Constitution was already… pic.twitter.com/6rkBvx0UET
— Sanatan Prabhat (@SanatanPrabhat) December 7, 2025
इस विषय में डॉ. भीम सिंह ने कहा –
१. भारत का संविधान २६ नवम्बर १९४९ को अंगीकृत किया गया था तथा २६ जनवरी १९५० को लागू हुआ । मूल संविधान में ‘समाजवाद’ तथा ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द नहीं थे । ये शब्द १९७६ में तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने आपातकाल के समय ४२वें संशोधन के माध्यम से जोडे थे, जो पूर्णतया अनावश्यक था । इन्दिरा गांधी ने विदेशी प्रभाव तथा मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों का समाधान करने हेतु ये शब्द सम्मिलित किए थे ।
२. संविधान-निर्माताओं ने विचारपूर्वक यह निर्णय लिया था । ऐसा नहीं है कि उन्होंने इन शब्दों पर ध्यान नहीं दिया । उन्होंने प्रस्तावना में इन शब्दों को जोडने अथवा न जोडने पर व्यापक विचार-विमर्श किया तथा इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि इन शब्दों को जोडना आवश्यक नहीं है । डॉ० आंबेडकर ने स्वयं कहा था, “भारत प्राचीन काल से ही धार्मिक सहिष्णुता के सिद्धान्त का पालन करता रहा है एवं धर्मनिरपेक्षता भारत का स्वभाव है ।” समाजवाद शब्द के विषय में डॉ० आंबेडकर ने कहा था कि हम भावी पीढियों पर किसी विशिष्ट आर्थिक सिद्धान्त को ग्रहण करने का कोई दायित्व नहीं थोप सकते ।
३. संविधान में ‘धर्मनिरपेक्ष’ तथा ‘समाजवाद’ शब्दों को जोडने की कोई आवश्यकता नहीं है । जब हमारे राष्ट्र-निर्माताओं ने गहन विचार-विमर्श के पश्चात् यह निर्णय लिया कि इन शब्दों को जोडना उचित नहीं है, तो बाद में इनका समावेश करना भी उचित नहीं था तथा आज भी इनका बने रहना अनुचित है । इस कारण इन दोनों शब्दों को हटाने के उद्देश्य से यह विधेयक प्रस्तुत किया गया, जिसे सदन ने स्वीकार कर लिया है । अगले सत्र में इस पर चर्चा की जाएगी तथा उपयुक्त निर्णय लिया जाएगा ।
संपादकीय भूमिकाइन शब्दों को हटाकर वहां ‘हिन्दू राष्ट्र’ शब्द भी जोडना आवश्यक है । |
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