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नई दिल्ली – ६ अक्टूबर को सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान ७१ वर्षीय अधिवक्ता राकेश किशोर ने मुख्य न्यायाधीश भूषण गवई पर जूता फेंकने का प्रयास किया । पुलिस ने उनसे तीन घंटे तक पूछताछ की तथा बिना कोई प्रकरण प्रविष्ट किए उन्हें छोड दिया । इस घटना के संबंध में, अधिवक्ता राकेश किशोर ने समाचार एजेंसी ‘एएनआई’ (एशियन न्यूज़ इंटरनेशनल) को दिए एक साक्षात्कार में अपने कृत्य का बचाव किया । उन्होंने स्पष्ट किया, “मुख्य न्यायाधीश द्वारा भगवान विष्णु के बारे में दिए गए बयान पर मुझे बुरा लगा । यह उस पर मेरी प्रतिक्रिया थी । मैंने शराब नहीं पी थी । जो हुआ उसका मुझे कोई पश्चाताप नहीं है तथा मैं किसी से नहीं डरता ।
🚨 “Paramatma made me do it, I won’t apologise.” ⚖️
Adv. @RakeshKishore_l, who attempted to throw a shoe at CJI BR Gavai, explained his act:
🗣️ Angered by CJI’s remark on Bhagwan Vishnu idol in the Khajuraho case.
📖 Alleged CJI mocks Hindu beliefs but protects other… https://t.co/mLJg7ZlBZC pic.twitter.com/2pJg5MPdZ2
— Sanatan Prabhat (@SanatanPrabhat) October 7, 2025
“खजुराहो के वामन मंदिर में भगवान विष्णु की खंडित मूर्ति को बदलने की मांग वाली एक याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश गवई ने याचिकाकर्ता से कहा था कि “जाओ तथा भगवान को इसके बारे में बताओ” ऐसा कहते हुए उन्होंने याचिका निरस्त की थी । इसकी समाज में व्यापक आलोचना हुई ।
अधिवक्ता राकेश किशोर द्वारा एक साक्षात्कार में व्यक्त की गई भावनाएं !
मुख्य न्यायाधीश अन्य धर्मों के संबंध में बड़े निर्णय लेते हैं !
१६ सितंबर को वामन मंदिर में खंडित मूर्ति के प्रकरण की सुनवाई के समय, मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता से कहा, “आप जाकर मूर्ति की पूजा करें । भगवान की मूर्ति से कहिए कि वह अपना सिर वापस अपनी मूल स्थिति में ले आएं ।” उनके इस कथन से मुझे बहुत ठेस पहुंची । हम देखते हैं कि यही मुख्य न्यायाधीश दूसरे धर्मों के विरुद्ध मामला आने पर उनके पक्ष में बड़े-बड़े निर्णय सुनाते हैं। इसका एक उदाहरण हल्द्वानी (उत्तराखंड) में रेलवे की भूमि पर एक विशेष समुदाय (मुसलमानों) का नियंत्रण है । जब इसे हटाने का प्रयास किया गया, तो सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगा दी तथा आज तक यह रोक है ।
सर्वोच्च न्यायालय सनातन धर्म के संबंध में निर्णय देते समय भेदभाव करता है !
पूर्व भाजपा प्रवक्ता नूपुर शर्मा द्वारा कथित तौर पर पैगंबर मोहम्मद का अपमान करने का प्रकरण जब सर्वोच्च न्यायालय में आया, तो न्यायालय ने उनसे कहा, ‘आपने वातावरण बिगाड दिया है ।’ जब भी सनातन धर्म से जुड़ा कोई प्रकरण आता है, चाहे वह जल्लीकट्टू (तमिलनाडु में बैलों को नियंत्रण करने का एक पारंपरिक खेल) हो अथवा दही हांडी की ऊंचाई निश्चित करने का, सर्वोच्च न्यायालय ऐसे आदेश देता रहा है जिनसे मुझे बहुत दुख होता है । सर्वोच्च न्यायालय को ऐसा नहीं करना चाहिए । अगर आप उस व्यक्ति को राहत नहीं देना चाहते, तो न दें; लेकिन उसका मउपहास भी न करें । सर्वोच्च न्यायालय ने मूर्ति के संबंध में याचिकाकर्ता से कहा, ‘उस मंदिर में मूर्ति के सामने ध्यान करो ।’ वह याचिका भी निरस्त कर दी गई, जो अन्याय है । मैं इन सब बातों से बहुत दुखी हूं ।
मैं किसी भी समूह का भाग नहीं हूं ।
मैं हिंसा के विरुद्ध हूं; लेकिन आपको ये भी देखना चाहिए कि एक अहिंसक व्यक्ति, जिसका कभी कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं रहा, जो किसी भी समूह से जुड़ा नहीं है, उसे ये सब क्यों करना पडा ? ये अवश्य सोचने वाली बात है । मैं भी कम पढ़ा-लिखा नहीं हूं । मैंने एम.एस.सी., पी.एच.डी., एल.एल.बी. की शिक्षा ली है तथा मैं गोल्ड मेडलिस्ट हूं ।
दैवीय शक्ति मुझसे कह रही थी, ‘देश जल रहा है तथा तुम सो रहे हो ?
‘१६ सितंबर को वामन मंदिर में टूटी मूर्ति पर आए निर्णय के पश्चात, मुझे नींद नहीं आ रही थी । कोई दिव्य शक्ति मुझे नींद से जगा रही थी और कह रही थी, “क्या कर रहे हो ? देश जल रहा है तथा तुम सो रहे हो ?” तो मुझे ये करना पडा ।
सरकारी संपत्तियों पर नियंत्रण पाने वालों के विरुद्ध बुलडोजर का उपयोग किया जा रहा है !
संवैधानिक पद पर आसीन मुख्य न्यायाधीश को ‘माई लॉर्ड’ का अर्थ समझना चाहिए तथा उसकी गरिमा बनाए रखनी चाहिए । अगर आप किसी को भीख नहीं दे सकते, तो कम से कम उसके बर्तन तो मत तोड़िए । उसका इतना अपमान मत कीजिए । उसके सामने आप (मुख्य न्यायाधीश) मॉरीशस जैसे देश में जाकर कहते हैं, ‘देश बुलडोजर से नहीं चलेगा ।’ मेरे मुख्य न्यायाधीश एवं मेरा विरोध करने वालों से प्रश्न यह है कि जिन लोगों पर बुलडोजर चलाया जा रहा है, उन्होंने सरकारी संपत्ति पर नियंत्रण कर लिया है । उन्होंने उस भूमि पर अतिक्रमण करके बड़े-बड़े महल तथा होटल बना लिए हैं । क्या यह गलत है कि योगीजी (योगी आदित्यनाथ) उन पर बुलडोजर चला रहे हैं ?
हिन्दू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाने के बाद मुख्य न्यायाधीश अब दलित नहीं रहे !
दलित मुख्य न्यायाधीश पर आक्रमण के पश्चात विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं । इस पर राकेश किशोर ने कहा, “मेरा नाम डॉ. राकेश किशोर है । क्या कोई मुझे मेरी जाति बता सकता है ? मैं दलित भी हो सकता हूं । आप इस बात का लाभ उठा रहे हैं कि मुख्य न्यायाधीश दलित हैं । वह दलित नहीं हैं । वह पहले सनातनी हिन्दू थे । वह हिन्दू दलित थे और फिर उन्होंने सब कुछ त्यागकर बौद्ध धर्म अपना लिया, यह मैं भी जानता हूं । यदि बौद्ध धर्म अपनाने के बाद उन्हें लगा कि उन्होंने हिन्दू धर्म छोड़ दिया’, तो अब दलित कहां हैं ? यह मानसिकता की बात है । जो लोग मुख्य न्यायाधीश को ‘दलित’ कह रहे हैं, वे यही चाह रहे हैं कि सरकार गिर जाए तथा देश पुनः परतंत्र हो जाए, यही उनकी राजनीति है ।”
परमात्मा ने जो करवा लिया है उसके लिए मैं क्षमा नहीं मांगूंगा !
मुझे कोई पछतावा नहीं है तथा मैं क्षमा नहीं मांगूंगा । मैंने कुछ नहीं किया । आप मुझसे प्रश्न कर रहे हैं । मैंने वही किया जो परमात्मा मुझसे करवाना चाहते थे । चाहे उनकी इच्छा हो कि मैं जेल जाऊं अथवा फांसी पर चढ जाऊं, ये परमात्मा की इच्छा है तथा वह पूर्ण होनी चाहिए ।
राकेश किशोर की बिना लाइसेंस वाले
सर्वोच्च न्यायालय बार एसोसिएशन ने अधिवक्ता राकेश किशोर का लाइसेंस रद्द कर दिया है । उनका पंजीकरण २०११ से है । बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है । निलंबन अवधि के समय, किशोर कहीं भी वकालत नहीं कर सकेंगे । १५ दिनों के भीतर उन्हें कारण बताओ नोटिस भी जारी किया जाएगा ।
प्रधानमंत्री मोदी ने विरोध किया था !
प्रधानमंत्री मोदी ने मुख्य न्यायाधीश पर ‘X’ लिखकर जूता फेंकने के प्रयास की घटना की निंदा की थी । उन्होंने लिखा था कि मुख्य न्यायाधीश पर हुए आक्रमण से प्रत्येक भारतीय आक्रोशित है । इस प्रकार के घृणित कृत्यों के लिए हमारे समाज में कोई स्थान नहीं है । मैं ऐसी स्थिति में मुख्य न्यायाधीश गवई द्वारा दिखाए गए संयम की सराहना करता हूं । उनका यह संयम न्याय तथा संविधान के मूल सिद्धांतों को दृढ करने के प्रति उनकी पूर्ण प्रतिबद्धता को दर्शाता है ।
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