‘ईडी’ के पूर्व अध्यक्ष कर्नाल सिंह का रहस्योद्घाटन (खुलासा),

नई दिल्ली – काला धन वह धन होता है, जिसकी सूचना आयकर विभाग को नहीं दी जाती है । अर्थात, उस धन के विषय में शासन को कोई सूचना नहीं होती । काले धन को श्वेत, अर्थात अधिकृत करने का सबसे सरल मार्ग है बैंकिंग क्षेत्र । लोग ‘भूमि की क्रय विक्रय की व्यापरिक गतिविधि खरीद’ में धन लगाते हैं अथवा ‘हवाला’ के माध्यम से (बिना बैंक की प्रक्रिया के) विदेशों में धन भेजते हैं, ऐसा रहस्योद्घाटन प्रवर्तन निदेशालय अर्थात ‘ईडी’ के पूर्व अध्यक्ष कर्नाल सिंह ने किया । उन्होंने बताया कि बड़े अपराधी तथा भ्रष्ट राजनेता भारत में काले धन को वैध कैसे करते हैं, इसकी सूचना उन्होंने एक भेंटवार्ता के समय दी । पूर्व आई.पी.एस. अधिकारी कर्नाल सिंह वर्ष २०१५ से २०१८ तक ईडी के प्रमुख पद पर कार्यरत रहे ।
कर्नाल सिंह ने आगे कहा कि व्यापार के माध्यम से भी ‘ मनी लॉन्ड्रीग ‘(विदेश से धन मंगवाना अथवा भेजना) होता है । इसके अंतर्गत वस्तुओं के मूल्य को ‘अधिक मूल्यांकन’ अथवा ‘कम मूल्यांकन’ के रूप में क्रमशः अधिक अथवा न्यून दर्शाया जाता है, जिससे धन देश के बाहर भेजा जा सके । भारत में लोग बेनामी संपत्तियां खरीदते हैं अथवा दूसरों के नाम पर संस्थान प्रारंभ करते हैं ।
‘काले धन को वैध करने की प्रक्रिया’ – सामान्य जनता की समझ में आनेवाले शब्दों में !
कर्नाल सिंह ने ‘काले धन को वैध करने की प्रयोगात्मक पद्धति’ समझाते हुए कहा कि, मान लीजिए किसी ने अपराध के माध्यम से काला धन कमाया हो, तो उसे श्वेत करने के लिए वह एक योजना बनाता है । इसके अंतर्गत वह बैंक से ऋण लेता है, कोई व्यवसाय प्रारंभ करता है तथा (व्यवसाय में वस्तुओं के आदान-प्रदान का झूठा चित्र प्रस्तुत करने हेतु) बनावटी बिलों के माध्यम से उसमें काले धन का निवेश करता है । वास्तविकता में वह व्यवसाय प्रारंभ भी नहीं किया गया होता है ; परंतु यह दर्शाया जाता है कि उससे लाभ प्राप्त हुआ है । इस प्रकार मूल काला धन श्वेत, अर्थात विधिसम्मत प्रतीत होने लगता है, अपितु उसे विधिसम्मत बना दिया जाता है ।
इसका प्रत्यक्ष उदाहरण देते हुए सिंह ने महाराष्ट्र के एक राजनेता का उल्लेख किया, जिसमें उस नेता ने भ्रष्टाचार से अर्जित धन को श्वेत करने के लिए ३०० से ४०० ‘शेल कंपनियों’ (केवल कागजों पर अस्तित्व में रहनेवाले बनावटी संस्थानों) का जाल चलाया । ये ऐसे संस्थान होते हैं, जो अधिकांशतः केवल कागजों पर अस्तित्व में होते हैं । उस राजनेता ने इन संस्थानों को ₹४५ सहस्त्र की किश्तों में धन भेजा । यह राशि ₹५० सहस्त्र से कम थी । इसका कारण यह है कि ₹५० सहस्त्र से अधिक के व्यवहारों की सूचना ‘आर्थिक गुप्तचर इकाई’ (Financial Intelligence Unit) को दी जाती है । यह एक शासकीय संस्था है, जो आर्थिक अपराधों पर ध्यान रखती है । उन्होंने आगे बताया कि यह धन अनेक बैंक खातों के माध्यम से भेजा जा रहा था और अंततः उसी राजनेता के ही एक संस्थान में पुनः निवेशित किया जा रहा था ।
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