अंतरिक्ष से पडोसी देशों की गतिविधियों पर दिया जाएगा ध्यान !

मुंबई (महाराष्ट्र) – आगामी ५ वर्षाें में हम ५० उपग्रह प्रक्षेपित करने की सिद्धता में हैं । पृथ्वी की विविध कक्षाओं में ये उपग्रह स्थापित किए जाएंगे । इनमें सेना की गतिविधियां तथा सहस्रो किलोमीटर परिसर के छायाचित्र एकत्रित करने की क्षमता होगी । अंतरिक्ष यान देश की सीमा तथा पडोसी क्षेत्रों पर ध्यान देने के लिए सक्षम है । इस बात को अत्यंत महत्त्व देकर हम काम कर रहे हैं; क्योंकि किसी भी राष्ट्र की शक्ति ‘उसके आसपास क्या हो रहा है ?’, यह समझ लेने की क्षमता पर निर्भर होती है, ऐसी जानकारी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के (इसरो के) प्रमुख डॉ. एस्. सोमनाथ ने यहां दी । वे यहां के ‘मुंबई आईआईटी’ के वार्षिक विज्ञान महोत्सव में बोल रहे थे ।
इसरो के प्रमुख डॉ. एस्. सोमनाथ ने कहा कि आगामी समय में मौसम अत्यंत महत्त्वपूर्ण होगा । जलवायु प्रदूषण, ग्रीन हाऊस गैसेस, महासागरों में होनेवाले परिवर्तन, मिट्टी और विकिरण जैसे घटकों का अध्ययन कर भारत इन क्षेत्रों में अपना योगदान देना चाहता है । हमने इसके लिए एक उपग्रह बनाने का प्रस्ताव रखा है । हम चाहते हैैं कि जी-२० देश भारत में आएं और इसके लिए उपकरण तथा अन्य योगदान दें । यह उपग्रह हम २ वर्षाें में प्रक्षेपित करेंगे और संसार के लिए भारत का यह योगदान रहेगा । हम चाहते हैं कि इससे प्राप्त जानकारी पूरे संसार के लिए उपलब्ध हो, जिससे कि अन्य देश उनके शोधकार्य में इसका उपयोग कर पाएंगे ।
६ जनवरी को दोपहर ४ बजे लॅग्रेंज प्वाईंट पर पहुंचेगा आदित्य-एल १ उपग्रह !
(‘लँग्रेज प्वाईंट’, एक ऐसा बिंदू है, जहां से सूर्य बिना किसी बाधा पूर्णतः दृष्टि की कक्षा में आता है ।)
देश के पहले सौर अभियान के संदर्भ में डॉ. एस्. सोमनाथ ने कहा कि, ‘आदित्य-एल् १’ उपग्रह ६ जनवरी को दोपहर ४ बजे लॅग्रेंज प्वाईंट पर पहुंचेगा । ‘आदित्य एल् १’ के सभी उपकरणों की जांच की गई है तथा वे सभी अच्छा कार्य कर रहे हैं ।
श्रीहरिकोटा (आंध्रप्रदेश) के सतीश धवन स्पेस सेंटर से २ सितंबर २०२३ को ‘आदित्य एल् १’ का प्रक्षेपण किया गया । सूर्य का अध्ययन करने के लिए यह अभियान प्रारंभ किया गया है । लँग्रेज प्वाईंट पृथ्वी से १५ लाख किमी दूर है ।
सोमनाथ ने कहा कि लँग्रेज प्वाईंट, एक ऐसा प्रदेश है, जहां सूर्य और पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल कार्य नहीं करता । आदित्य एल् १ यहां पहुंचने पर सूर्य का अध्ययन कर पाएगा । हमें आशा है कि ‘सोलर कोरोना’ (सूर्य के बाह्य उष्ण वातावरण को सोलर कोरोना’ कहते है) ‘मास इजेक्शन’ (सूर्य की सतह पर होने वाले सबसे विशाल विस्फोटों में से एक) और इनका हमारे मौसम पर पडनेवाला प्रभाव, इनमें क्या संबंध आहे, यह हम खोज पाएंगे ।
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