
‘शाकाहार से मनुष्य सत्त्वगुणी बनता है । सत्त्वगुण के संवर्धन से उसकी आध्यात्मिक उन्नति होती है, अर्थात नरजन्म का सार्थक करनेवाले सत्त्वगुणी आहार का सेवन करना धर्मपालन है । धर्मपालन का अर्थ है योग्य आचारसंहिता को स्वीकार कर, उस अनुसार आचरण कर धर्म को, परिणामस्वरूप ईश्वर को अच्छा लगना !
शाकाहार से देह के तमोगुण का लय होता है और मनुष्य देवसंस्कृति की ओर यात्रा करने लगता है । शाकाहार, नर से नारायण बनाने का कार्य करता है । इसलिए शाकाहार करना, धर्मपालन करने समान ही है ।’
– एक विद्वान (श्रीचित्शक्ति [श्रीमती] अंजली गाडगीळजी ‘एक विद्वान’ इस नाम से यह भाष्य करती हैं । ४.३.२००८)
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