कोलकाता – बंगाल में भारतीय संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था की परीक्षा है । मैं पुलिस और प्रशासन के साथ सभी को चेतावनी देना चाहता हूं कि, उन्होंने कुछ गलत किया, तो परिणाम बुरा होगा । कानून की पकड उन तक पहुंची है, ऐसा निश्चित प्रतिपादन बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड ने किया है ।
बंगाल विधानसभा चुनाव के परिणाम निकलने के बाद वहां बडे पैमाने पर हिंसा हुई । उसमें अनेक हिंदुओं को मारा गया, सहस्रो हिंदू घायल हुए, साथ ही महिलाओं पर भी अत्याचार किए गए । इस पृष्ठभूमि पर बंगाल के राज्यपाल धनखड ने बंगाल में जहां हिंसा हुई ,उन क्षेत्रों का दौरा किया और पीडित हिंदुओं से मुलाकात की । इस विषय में मीडिया से बात करते समय धनखड ने कहा कि,
१. आज का दिन मेरे जीवन में न आता, तो अधिक अच्छा होता । इन लोगों पर जो अत्याचार हुए हैं, वो सुनने की अपेक्षा मृत्यु आने का पर्याय मेरे सामने होता, तो मैंने उसका भी विचार किया होता ।
२. स्वतंत्रता के बाद चुनाव के बाद इतनी बडी मात्रा में पहली बार हिंसा हुई । इस कारण लाखों की संख्या में लोगों ने घर छोडे । उनके घरों को बम से उडा दिया गया, उनके घरों को आग लगाई गई । नंदीग्राम में १०० से अधिक दुकानों को चुनकर उद्ध्वस्त कर दिया गया ।
३. भविष्य में ऐसी आतंकवादी और दायित्वशून्य व्यवस्था होगी, ऐसी डॉ. बाबासाहेब अंबेदकर ने भी कल्पना नहीं की होगी ।
पुलिस को शिकायत की, तो हमें ही गुनहगार ठहराएगी !
राज्यपाल धनखड ने प्रत्येक पीडित को पूछा कि, आप पुलिस के पास क्यों नहीं जाते ? तब एक पीडित ने कहा, ‘‘हम पुलिस में तकरारदार बनकर जाएंगे; लेकिन पुलिस हमें ही गुनहगार बनाएगी (हमारे ऊपर गुनाह प्रविष्ट करेगी) । इतना होने पर भी वे रुकेंगे नही । पुलिस में जाने के बाद सत्ताधारी पार्टी के लोग हमारे साथ क्या करेंगे, यह बता नहीं सकते ।’’
जनता पुलिस से डरती है और पुलिस सत्ताधारी पार्टी के लोगों से डरती है । ऐसी व्यवस्था को लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं कह सकते । कूचबिहार के छोटे बच्चों ने मुझे कहा, ‘‘सर, वे फिर आएंगे !’’ उनके आंखों के दर्द को मैं भूल नही सकता । मैंने जो सुना उसमें से आपको बहुत कम जानकारी दी जा रही है; कारण मेरा उद्देश्य किसी की भावनाएं भडकाना नहीं है । ’’
तृणमूल कांग्रेस के विरोध में मतदान करने के बाद हिंदुओं को धर्म परिवर्तन का खतरा !
कुछ पीडितों ने, ‘लोकतंत्र में स्वयं की इच्छानुसार मतदान कर सकते हैं; लेकिन यहां ऐसा करने पर मिलने वाली ‘सजा’ से बचने के लिए, ‘हम धर्मपरिवर्तन करने को तैयार हैं । आप हमें मार्ग दिखायें और आप हमें आश्वासन दें कि, धर्मांतरण करने से हमारी जान बचेगी !’, ऐसे शब्दों में व्यथा बताई । यह बात मेरे सामने आई, तब मुझे बहुत दुख हुआ । हमारा लोकतंत्र इतना कमजोर है क्या ? कि उसे कोई भी छिन्नभिन्न करे और संवैधानिक व्यवस्था को उद्ध्वस्त करे ?
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