
नई देहली – सर्वाेच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया है कि अनुसूचित जाति अथवा जनजातियों में से किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध किसी ने कोई अपमानजनक बोला अथवा उसका कोई साक्षी नहीं होगा, तो ऐसी घटना अपराध प्रमाणित नहीं हो सकती । साथ ही न्यायालय ने इस संदर्भ में याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध एट्रॉसिटी कानून के अंतर्गत प्रविष्ट अपराध रद्द करने का आदेश दिया ।
१. सर्वोच्च न्यायालय ने बताया कि एट्रॉसिटी कानून में सभी प्रकार के अपमान और धमकियां अंतर्भूत नहीं हैं, तो जिसमें पीडित व्यक्ति को समाज के सामने अपमान, शोषण और कष्ट का सामना करना पडा, तो ऐसी घटनाएं अंतर्भूत हैं । इस कानून के अंतर्गत अपराध प्रविष्ट करने के लिए पीडित और आरोपी के अतिरिक्त अन्य व्यक्तियों की उपस्थिति में अपराध की घटना होना आवश्यक है ।
२. न्यायालय ने आगे कहा कि सार्वजनिक स्थान अथवा ऐसा स्थान, जहां लोग उपस्थित होने चाहिए । यदि सार्वजनिकरूप से कोई भी अपमानजक कृत्य होती हो और लोग उसे देख अथवा सुन रहे हों, तो ऐसी घटना ऐट्रॉसिटी कानून की श्रेणी में आती है ।
३. उत्तराखंड की इस घटना में एक महिला ने हितेश वर्मा नामक व्यक्ति के विरुद्ध अपमानजनक भाषा का उपयोग करने का आरोप लगाया था । उसके आधार पर पुलिस ने संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध एट्रॉसिटी कानून के अंतर्गत अपराध प्रविष्ट किया था ।
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