इतिहास एवं मनाने की पद्धति
इस दिन नई फसल की बालियां लाकर उन्हें घर के देवता को अर्पण कर नवान्न भक्षण करते हैं । इस तिथि पर सरस्वतीदेवी उत्पन्न हुईं, इसलिए उनकी पूजा करते हैं । इस दिन को लक्ष्मी का भी जन्मदिन माना जाता है, अर्थात इस तिथि को श्रीपंचमी भी कहते हैं ।’
उद्देश्य
इस त्योहार का उद्देश्य है – इस दिन हुए सृष्टि के नवचैतन्य एवं नवनिर्माण के कारण प्राप्त आनंद को प्रकट करना एवं मौज मनाना ।’
(संदर्भ – सनातन का ग्रंथ
‘धार्मिक उत्सव एवं व्रतों का अध्यात्मशास्त्रीय आधार’)
अपनी सहज बातचीत एवं सरल व्यवहार से भक्तों को सिखानेवाले प.पू. भक्तराज महाराजजी !
परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी द्वारा साधकों को किया गया अनमोल मार्गदर्शन !
हिन्दू धर्मप्रेमी युवक-युवतियों, ऋषि-मुनियों तथा देवताओं द्वारा की जानेवाली स्थूल कृतियों के पीछेका सूक्ष्म धर्मशास्त्र समझे बिना उनका अनुकरण न करें ! – श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली मुकुल गाडगीळ
‘श्रीसत्शक्ति, श्रीचित्शक्ति और सच्चिदानंद’ अध्यात्म के शब्दब्रह्म हैं तथा उनमें अत्यधिक शक्ति विद्यमान होती है और उन शब्दों का उच्चारण करने पर उनसे शक्ति, चैतन्य एवं तत्त्व प्राप्त होता है ! – श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली मुकुल गाडगीळजी
प.पू. भक्तराज महाराजजी के पावन सान्निध्य की कुछ हृदयस्पर्शी स्मृतियां !