१. प्रादेशिक मौसम के अनुसार शिक्षा की समय-सारणी बनाना छात्रों के लिए सुविधाजनक !
‘कोविड-१९’ के परिणाम के रूप में शिक्षा क्षेत्र में भी बडी उथल-पुथल होना, स्वाभाविक ही है । इस उपलक्ष्य में अभिभावकों और शिक्षकों की मांग के अनुसार विद्यालयों के समय और पाठ्यक्रम को कम करने की मांग सरकार के विचाराधीन है, यह बहुत ही अच्छी और सकारात्मक बात है । शिक्षा क्षेत्र में जून से अप्रैल तक शैक्षिक वर्ष माना जाता है; परंतु भारत के प्रत्येक राज्य में अलग-अलग प्राकृतिक परिस्थितियां हैं । प्रत्येक स्थान का मौसम भिन्न-भिन्न है । प्रायः ‘राज्य में सर्वत्र एक ही दिनांक को शैक्षिक वर्ष आरंभ और समाप्त हो’, यह आग्रह रखना उचित नहीं है, साथ ही कोंकण क्षेत्र में जहां आषाढ अर्थात जुलाई तथा अगस्त महीने में बहुत वर्षा होती है, उस समय विद्यालय खुले रखने का आग्रह करना उचित नहीं है ।
शिक्षाविशेषज्ञ मेघना सावंत का ‘शैक्षिक वर्ष जनवरी में आरंभ होकर दिसंबर में समाप्त हो’, यह मत विचारणीय है । उसमें जनवरी से अप्रैल अर्थात निरंतर ४ महीने तक अध्यापन किया जा सकेगा । उसके पश्चात प्रत्येक जनपद के स्थानीय मौसम के अनुसार तथा प्राकृतिक आपदाओं के आधार पर जब आवश्यक लगे, तब छुट्टियां दी जा सकती हैं । इससे गणेशोत्सव, दीपावली आदि त्योहारों के लिए सप्ताहभर की छुट्टी दी जा सकेगी और दूसरे सप्ताह में परीक्षा ली जा सकेगी । अंग्रेजों ने अपनी सुविधा के अनुसार शैक्षिक वर्ष जून से आरंभ किया था; परंतु अब हमें अपनी सुविधा के अनुसार शैक्षिक वर्ष की रूपरेखा तैयार करने का अवसर मिला है ।
२. अंग्रेजों की लिपिक (क्लर्क) तैयार करनेवाली नहीं, अपितु छात्रों का सर्वांगीण विकास करनेवाली शिक्षा नीति चाहिए !
अंग्रेजों ने उनकी आवश्यकता के अनुसार केवल लिपिक तैयार हो; इसके लिए शिक्षा नीति बनाई थी; परंतु स्वतंत्रता के पश्चात भारत को अपनी आर्थिक आवश्यकताओं पर विचार कर उसे पूरा करनेवाले नागरिक तैयार हों; इस प्रकार की शिक्षा नीति बनाना बहुत आवश्यक
है । (स्वतंत्रता के ७२ वर्ष पश्चात भी यह बताना पडता है, जो सर्वदलीय शासनकर्ताओं के लिए लज्जाजनक है ! – संपादक) भारत एक कृषिप्रधान देश है; तो देश के विद्यालय में चौथी कक्षा के पश्चात कृषिप्रधान अथवा कृषि विद्यालय बनने चाहिए । बच्चों को विद्यालयों में कृषि के काम तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था से संबंधित ज्ञान नहीं सिखाया जाता । इसलिए विद्यालय जानेवाले बच्चे कृषि में हमारी कोई सहायता नहीं कर पाते; अपितु धरोहर में मिली खेती और उसके लिए आवश्यक शारीरिक परिश्रम के लिए ये बच्चे अनुपयोगी सिद्ध होते हैं । केवल विद्यालयीन शिक्षा के पश्चात ये बच्चे अपनी और अपने परिवार की जीविका चलाने में भी सक्षम नहीं होते, अर्थात ‘विद्यालयीन शिक्षा हमारे किसी उपयोग की नहीं है’, किसान, श्रमिक और मजदूरों के मन में यह भावना उत्पन्न होना उचित नहीं है । ऐसी भावना उत्पन्न होती है; इसीलिए श्रमिक और किसान अपने बच्चों को विद्यालय भेजने के लिए तैयार नहीं होते । उसके लिए बच्चों को कृषि और अन्य सभी प्रकार के लघुउद्योगों का प्रशिक्षण देना आवश्यक है, साथ ही उत्तम कुशलता संपन्न नागरिक तैयार करना ही विद्यालयों का लक्ष्य होना चाहिए ।
३. केवल चौखटबद्ध शिक्षा देनेवाले नहीं, अपितु जीवन की शिक्षा देनेवाले विद्यालय चाहिए !
वर्तमान शिक्षाप्रणाली में छात्रों को केवल अलग-अलग विषयों का वाचन और लेखन करना ही अपेक्षित होता है । उनका मूल्यांकन भी लेखन और वाचन से किया जाता है । इस मूल्यांकन में छात्रों के शारीरिक गुण, कुशलता, उनकी कल्पनाशक्ति तथा उनकी रुचि-अरुचि का ही नहीं, अपितु उनके व्यक्तित्व का प्रतिबिंब हो; इसके लिए किसी प्रकार का अवसर नहीं दिया जाता, केवल कंठस्थ पद्धति से उनकी स्मरणशक्ति की परीक्षा ली जाती है । यह बिलकुल उचित नहीं है; अपितु उन्हें संबंधित विषय का अनुभव देना अत्यंत आवश्यक है । विद्यालयीन पाठ्यक्रम और शिक्षाप्रणाली में ऐसा आमूलचूल बदलाव लाना चाहिए, जिससे विद्यालय केवल चौखटबद्ध और व्यवहार से संबंधित प्रत्यक्ष बातों की शिक्षा प्रदान करनेवाले सिद्ध हों ! छात्रों को स्वयं कार्यानुभव और प्रायोगिक करने का अवसर दिया जाना चाहिए, जिसमें सामान्य बिजली के उपकरणों को जोडना और उनका रखरखाव, बैंक के लेन-देन, सिलाई, रसोई, परिसर स्वच्छता आदि नित्य जीवन के आवश्यक काम भी उन्हें सिखाए जाने चाहिए । इतना ही नहीं, बच्चों को स्वास्थ्य से संबंधित ज्ञान भी मिलना चाहिए । इसके लिए विद्यालयों को योगासन, ध्यान, सूर्यनमस्कार, व्यायाम, पौष्टिक आहार का महत्त्व, प्राथमिक चिकित्सा, घरेलु सामान्य औषधीय चिकित्सा इत्यादि विषयों का ज्ञान दिया जाना चाहिए । स्वच्छता, घरेलू कचरे का व्यवस्थापन, आपत्ति प्रबंधन, सुरक्षा नियमों का पालन और प्रकृति का संवर्धन एवं पर्यावरण की रक्षा, इनसे संबंधित जागृति भी विद्यालय में होनी चाहिए । शहरी क्षेत्रों में जहां कृषि का प्रत्यक्ष प्रदर्शन करना संभव नहीं है, वहां बच्चों को वाटिका से संबंधित शिक्षा दी जा सकती है । उन्हें उनका परिसर, उनका छज्जा, इमारत का परिसर जैसे स्थानों पर तथा घर में भी किन पेडों का संवर्धन किया जा सकता है, विद्यालय में इसकी भी शिक्षा मिलनी आवश्यक है । राज्य में केवल ४ ही कृषि विश्वविद्यालय हैं; परंतु उनमें दी जानेवाली कृषि की शिक्षा समाज में प्रकृतिप्रेमी पीढी बनाने में सक्षम नहीं है ।
४. भारत को ‘आत्मनिर्भर’ बनने हेतु संस्कारी पीढी बनाना शिक्षा क्षेत्र का आद्यकर्तव्य !
सभी विद्यालयों में सभी कक्षाओं में केवल विशिष्ट विषयों के पाठ्यक्रम सर्वत्र समान होने चाहिए, ऐसा क्यों ? इस प्रकार की चौखटबद्ध शिक्षा के कारण साहित्य, संगीत, कला, खेल आदि का विकास नहीं होता । चौथी कक्षा तक सभी को समान विषयों की शिक्षा देकर उसके पश्चात कुछ विद्यालयों में कृषि का प्रशिक्षण, तो कुछ विद्यालयों में खेलों का, कुछ में अभिजात कलाएं, संगीत, नृत्य, नाट्यशाला क्यों नहीं होने चाहिए ? अपितु शारीरिक श्रम से संबंधित उद्योगों के लिए भी विद्यालय होने चाहिए । प्रत्येक जनपद में ऐसे विविध प्रकार के विद्यालय बनाकर उनमें कुछ समान विषयों के विशिष्ट सीमित पाठ्यक्रम होने चाहिए । इसमें विशिष्ट सीमा तक भाषा, विज्ञान, गणित आदि की शिक्षा, साथ ही इतिहास, भूगोल एवं नागरिक शास्त्र की भी शिक्षा देना पर्याप्त होगा और छात्रों की रुचि के अनुसार वे कला, खेल, संगीत, नृत्य अथवा कृषि, साथ ही अन्य उद्योगों का प्रशिक्षण ले सकेंगे । वे अपनी रुचि के विषय का अध्ययन कर स्वयं में कुशलता अंतर्भूत कर पाएंगे । विविध परिसरों में विविध प्रकार के उद्योग विकसित होते हैं । इन उद्योगों के लिए आवश्यक मानव संसाधन तैयार करने हेतु इन उद्योगों को भी विशिष्ट प्रकार के विद्यालयों को प्रायोजित करना चाहिए । स्थानीय स्तर पर ऐसे विद्यालय बनने से स्थानीय बच्चों को उनमें प्रशिक्षण मिलेगा और उससे उन्हें उद्योगों में रोजगार भी मिलेगा । बच्चों को इस प्रकार का प्रशिक्षण मिलना चाहिए, जिससे छात्रों में उद्योग की वृत्ति भी बढे । भारत को ‘आत्मनिर्भर’ बनने हेतु यह आवश्यक है । साथ ही अब भारत के प्रत्येक छात्र को काल के अनुसार अर्थव्यवस्था को बल देनेवाली शिक्षा मिलनी चाहिए, उससे बेरोजगारी न्यून होने में सहायता मिलेगी । कचरे का व्यवस्थापन, पानी का नियोजन, वरिष्ठ नागरिकों की सहायता जैसे कार्याें के लिए भी महाविद्यालयीन छात्रों को साथ में लिया जा सकता है । उनकी शक्ति का उपयोग देश की समस्याओं के समाधान के उपयोग में लाना आवश्यक है । इस युवाशक्ति का उपयोग पर्यावरण की रक्षा के लिए भी किया जा सकता है ।
५. भारतीय संस्कृति और राष्ट्रभक्ति प्रस्फुटित करनेवाली शिक्षा आवश्यक !
विद्यालयीन शिक्षा मातृभाषा में ही दी जानी चाहिए । ग्रामीण एवं आदिवासी विभागों में बोली भाषा में न्यूनतम ४ थी कक्षा तक की शिक्षा देकर उसके पश्चात बच्चों को राज्यभाषा की ओर मोडना चाहिए । अंग्रेजी विषय किसी भी कक्षा में अनिवार्य नहीं होना चाहिए । भारतीय संविधान में उल्लेखित २२ भाषाओं में कोई भी ३ भाषाएं सीखने का अवसर छात्रों के लिए उपलब्ध होना चाहिए । उसमें संस्कृत की शिक्षा तो अवश्य होनी
चाहिए । विद्यालय और महाविद्यालय में भारतीय संस्कृति एवं राष्ट्रभक्ति का बीज बोनेवाली शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए !
६. ‘ऑनलाइन’ शिक्षा शिक्षक के सिखाने का विकल्प नहीं, अपितु पूरक !
‘कोविड-१९’ के कारण प्रत्यक्ष शिक्षा की अपेक्षा प्रौद्योगिकी की सहायता से शिक्षा देने का विकल्प अपनाना आरंभ हुआ; परंतु उसके कारण बच्चे लंबे समय तक ‘स्क्रीन’ के सामने बैठे रहते हैं; इसलिए इसके विरुद्ध आवाज उठने लगी है । ‘ऑनलाइन’ शिक्षा पूर्ण रूप से बुरी नहीं है । जब प्रत्यक्ष संपर्क संभव नहीं होता, तब अनिवार्य रूप से ही क्यों न हो; परंतु ‘ऑनलाइन’ अध्यापन उपयोगी है । अध्ययन का अर्थ आवर्त्तन ! मैं ११ वीं और १२ वीं कक्षा के वर्गाें को शिक्षा देनेवाली शिक्षिका हूं । जब १२ वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षाएं रहती हैं, तब ११ वीं कक्षा के वर्गाें को छुट्टी दी जाती है । तब ये छात्र जुलाई से लेकर जनवरी तक पढाया हुआ पाठ भूल जाते हैं । तब ११ वीं की वार्षिक परीक्षा भी नहीं हुई होती है । घर बैठे इन बच्चों तक शिक्षक कैसे पहुंचेंगे और १२ वीं के पेपर्स की पडताल में व्यस्त होते हुए वे शिक्षक ११ वीं कक्षा के छात्रों को समय कैसे देंगे ? ऐसे समय में इन बच्चों के लिए ‘ऑनलाइन’ अध्यापन उपयोगी सिद्ध होगा । ७. प्रौद्योगिकी की सहायता से हमारे बच्चों का व्यक्तित्व तैयार करने के लिए पहला कदम उठाएंगे !
विज्ञान की कुछ संकल्पनाएं तो केवल पुस्तक में पढकर अथवा उनके चित्र देखकर भी ठीक से समझ में नहीं आतीं । वो संकल्पनाएं ‘थ्री डी’ में स्क्रीन पर देखकर अच्छी तरह से समझ में आती हैं और स्मरण में भी रहती हैं; इसलिए प्रौद्योगिकी की सहायता लेना अध्ययन के लिए पूरक है । हम अध्ययन के लिए अपनी जितनी ज्ञानेंद्रियों का उपयोग करते हैं, बच्चों को हम उतने ही अच्छे अनुभव दे सकते हैं । बच्चों को उतनी ही अच्छे ढंग से उस ज्ञान का आकलन होता है, साथ ही उन्हें उसका स्मरण भी रहता है । साहित्य, संगीत, कला एवं खेल के क्षेत्रों में भी प्रौद्योगिकी की सहायता से हम अपने बच्चों के व्यक्तित्व का विकास कर सकते हैं । उसके लिए नियोजन व कल्पनाशीलता का उपयोग करना चाहिए । प्रश्न उठता है छोटी आयु में बच्चों के हाथ में स्क्रीन सौंपने का ! किसी भी बात का अतिरेक बुरा है; परंतु आगे की प्रत्येक पीढी अल्पायु में ही प्रौद्योगिकी का उपयोग कर सकती है, यह सच्चाई है । उसका उत्तर यह है कि स्क्रीन का विरोध करने की अपेक्षा किस प्रकार सीमित पद्धति से हम उसका उपयोग कर सकते हैं व कैसे उसका गुणात्मक उपयोग किया जाता है, इसे देखना महत्त्वपूर्ण है । कल्पनाशीलता एवं सृजनता के लिए बच्चों को खाली समय उपलब्ध कराना आवश्यक तो है ही । उसके लिए विद्यालय के समय और पाठ्यक्रम को कम करने की आवश्यकता है; परंतु केवल इस वर्ष के लिए तात्कालिक उपाय के रूप में नहीं; अपितु यह पद्धति अपने बच्चों को सक्षम, उत्पादक एवं कार्यकुशल बनाने हेतु हमारी शिक्षाप्रणाली में बदलाव लाने में पहला कदम सिद्ध होना चाहिए ।’
– डॉ. (श्रीमती) माधवी दीपक जोशी, संस्कृत व्याख्याता, डीबीजे महाविद्यालय, चिपळूण, महाराष्ट्र. (साभार – दैनिक ‘सागर’)

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