डॉक्टरों का प्रिस्क्रिप्शन पढने में अन्यों के लिए सिरदर्द !
छोटे बच्चों की भांति बार-बार बताना ‘अक्षर स्पष्ट लिखें’, डॉक्टरों के लिए लज्जाजनक ! ऐसे लोगों को सरकार द्वारा दंडित करने पर ही स्थिति में सुधार होगा !

भुवनेश्वर (ओडिशा) – सरकारी, निजी चिकित्सालयों और अन्य स्वास्थ्य शिविरों में काम करनेवाले डॉक्टरों का रोगियों को दिया जानेवाले औषधियों का ‘प्रिस्क्रिप्शन’ पढना संभव हो; इसलिए उसे ‘कैपिटल लेटर्स’ में लिखने का ओडिशा उच्च न्यायालय ने डॉक्टरों को आदेश दिया ।
यह आदेश न्यायाधीश एस्.के. पानीगराही ने एक आवेदक द्वारा अपनी पत्नी की देखभाल के लिए जमानत देने के संदर्भ में प्रविष्ट आवेदन की सुनवाई के समय दिया । इस व्यक्ति ने आवेदन के साथ अपनी पत्नी की चिकित्सा संबंधी डॉक्टर द्वारा दिए प्रिस्क्रिप्शन और अन्य कागदपत्र न्यायालय को प्रस्तुत किए थे ।
‘लाइव लॉ’ ने अपने समाचार में कहा कि ‘इन कागदपत्रोंपर लिखे अक्षर किसी भी सामान्य मनुष्य की समझ में नहीं आनेवाले हैं ; केवल अनुमान लगाना पडता है । इससे रोगियों को बहुत कष्ट होता है । इतना ही नहीं, अपितु औषधि विक्रेता, पुलिसकर्मी, अधिवक्ता और न्यायाधीशों को भी ऐसे कागदपत्र पढने में कठिनाई होती है । ‘फिजिशियन्स’ का प्रिस्क्रिप्शन, ओपीडी के संदर्भ में संदेश अथवा सूचनाएं, शवविच्छेदन ब्यौरा (रिपोर्ट) तथा घायलों के संदर्भ में ब्यौरे इत्यादि पढने के लिए स्पष्ट अक्षरों और विस्तृतरूप से लिखना आवश्यक है । डॉक्टरों को इसपर ध्यान देना चाहिए ।’
पढने में कठिन ‘प्रिस्क्रिप्शन’ को ‘चिकित्सकीय दायित्वशून्यता’ भी कहा जा सकता है ! – न्यायालयन्यायालय का कहना है कि ‘मेडिकल काऊन्सिल ऑफ इंडिया (व्यावसायिक आचार, शिष्टाचार एवं नीतिशास्त्र) (संशोधित) २०१६’ के नियम क्रमांक १.५ के अनुसार प्रत्येक डॉक्टर को ‘कैपिटल लेटर्स’ में ही औषधियां लिखकर देनी चाहिए; परंतु डॉक्टरों द्वारा इन नियमों का पालन नहीं किया जाता । पढने में कठिन अक्षरों के कारण चिकित्सकीय अथवा कानूनी समस्याएं भी उत्पन्न हो सकती हैं । ‘ऐसे ‘प्रिस्क्रिप्शन’को ‘चिकित्सकीय दायित्वशून्यता’ भी कहा जा सकता है ।’ |
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