जैसे आकाश में बिजली चमके, वैसे जन्महिन्दू जाग उठो ।

श्रीमती वसुधा देशपांडे

चारों ओर से आग लगी है देशद्रोही आक्रमण कर रहे हैं ।
कुंभकरण ना बनो मरे मां-बाप जागो जागो ।
भारत मां अश्रु बहा रही है उसे हर्षित करो जीवनदान से ।
जैसे आकाश में बिजली चमके वैसे जन्महिन्दू जाग उठो ॥ १ ॥

नासमझ ना हो षड्रिपु में गुंग ना हो ।
सोने का ढोंग ना लो खडबडाकर जाग उठो ।
कैसे समझाऊं कैसे समझाऊं घास घूट रहा है ।
अभी भी वक्त है साधना को अपने अंग अंग में समा लो ॥ २ ॥

छोेडो वो बंधन मेरा बेटा, मेरी पत्नी, हम दो हमारे दो ।
हरेक बच्चा मेरा बेेटा है हरेक स्त्री मेरी मां है ।
हरेक वृद्धा मेरी नानी है ये मिट्टी हिन्दुआें की है ।
जैसे आकाश में बिजली चमके वैसे जन्महिन्दू जाग उठो ॥ ३ ॥

आगे आगे जा पीछेे मत देखो सब मानव एक हैं ।
सबको समा लो यही व्याप्ति है सब में ईश्‍वर है ।
इसे ही कहते हैं प्रेम का सागर हरेक बूंंद सागर का ही है ।
सुन लो, समझ लो, अनुभूति लो ये ही जागृत साधना है ॥ ४ ॥

कौन कहता है हिन्दू षंढ, हिन्दू में वीरता नहीं ?
पीछे मुडकर इतिहास देखो कभी भी भूलना नहीं ।
ये भूमि एकेक वीरता की है वीरांगनाएं कितनी हुई हैं ।
शत्रु उनकी स्तुति करते हैं आज भी वे उनका आचरण करते हैं ॥ ५ ॥

पर हाय भगवान, वे हिन्दू संस्कृति का पालन करते हैं ।
निद्रित हमारा हिन्दू कब उठेेेेगा ? बिजली कब चमकेगी ?
वो तो काल ही कहेगा । लेकिन वो वक्त नजदीक है ।
ये तो हमारा समाधान है । साधना करना ये ही मार्ग है ॥ ६ ॥

– श्रीमती वसुधा कालीदास देशपांडे, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा.  (२६.१०.२०१५)

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