‘आपातकाल’ भी भगवान की एक लीला होने के कारण परात्पर गुरु डॉक्टरजी, श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी एवं श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी के चरणों में शरणागत होकर आपातकाल का सामना करें !

वर्तमान आपातकाल में साधक अनेक स्तरों पर संघर्ष कर रहे हैं । कोई पारिवारिक, कोई सामाजिक, कोई आर्थिक, कोई शारीरिक, कोई मानसिक, तो कोई बौद्धिक संघर्ष कर रहा है !

अध्यात्म की श्रेष्ठता !

‘विज्ञान माया संबंधी विषयों में शोध करता है; जबकि अध्यात्म में ईश्वर, ब्रह्म इत्यादि के विषय में शोध किया जाता है ।’ – (परात्पर गुरु) डॉ. आठवले

जनता के लिए कुछ न करनेवालों को शासनकर्ता के रूप में चुननेवाली जनता ही आज की स्थिति का कारण है !

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के ओजस्वी विचार

सभी क्षेत्रों में देश की दयनीय स्थिति होने का कारण !

जैसे जो डॉक्टर ना हो वह रोगी पर उपाय करे; उसी प्रकार राष्ट्र और धर्म के प्रति प्रेम रहित जनता को, राष्ट्र और धर्म के प्रति प्रेम रहित राजनीतिक दलों को चुनने का अधिकार देने के कारण सभी क्षेत्रों में देश की दयनीय स्थिति हो गई है !’ – (परात्पर गुरु) डॉक्टर आठवले

हिन्दुओं के गोप्रेमी पूर्वज !

‘कहां एक गाय की रक्षा के लिए प्राण त्यागनेवाले हिन्दुओं के पूर्वज, और कहां लाखों गायों को पशुवधगृह में भेजनेवाले आज के हिन्दू !’ – (परात्पर गुरु) डॉ. अठावले

‘आपातकाल से पूर्व ग्रंथों के माध्यम से अधिकाधिक धर्मप्रसार हो’, इस कार्य में लगन से सम्मिलित होनेवालों पर परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी की अपार कृपा होगी !

ग्रंथकार्य में सम्मिलित होने की इच्छा रखनेवाले, ग्रंथनिर्माण की सेवा करनेवाले, ग्रंथों का प्रसार करनेवाले, ग्रंथों के लिए अर्पण संकलित करनेवाले एवं ग्रंथों का वितरण करनेवाले सभी को साधना का यह अपूर्व स्वर्णिम अवसर प्राप्त हुआ है ।

‘परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के प्रति हमें अंतिम श्‍वास तक कृतज्ञ रहना होगा !’ – श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी

संत भक्तराज महाराजजी के देहत्याग उपरांत परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने गुरुतत्त्व को पहचानकर (गुरुतत्त्व से सान्निध्य रखकर) व्याप क कार्य किया । प्रत्यक्ष रूप से उन्हें उनके गुरुदेवजी का सान्निध्य बहुत अल्पावधि के लिए ही प्राप्त हुआ ।

योगतज्ञ दादाजी वैशंपायनजी द्वारा सनातन संस्था के संस्थापक परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के अलौकिक कार्य की प्रशंसा !

सनातन प्रभात’ एकमात्र ऐसा दैनिक है, जिसके माध्यम से हिन्दू धर्म एवं हिन्दू धर्मियों की अर्थहीन आलोचना का आप (डॉ. जयंत आठवलेजी) एवं आपके सेवाभावी साधक निर्भयता से मुंहतोड उत्तर देते हैं ।