परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी का गुरुपूर्णिमा निमित्त संदेश

गुरुपूर्णिमा सनातन संस्कृति को प्राप्त गौरवशाली गुरुपरंपरा को कृतज्ञतापूर्वक स्मरण करने का दिन है । जिस प्रकार गुरु का कार्य समाज को आध्यात्मिक उन्नति के लिए मार्गदर्शन करना है, उसी प्रकार समाज को कालानुसार मार्गदर्शन करना भी गुरुपरंपरा का कार्य है ।

श्रीगुरु के प्रति श्रद्धा बढानेवाले सनातन के ग्रंथ !

गुरु, पिता से भी अधिक श्रेष्ठ क्यों हैं ? गुरु, सद्गुरु एवं परात्पर गुरु में क्या अंतर है ? साधक पर गुरुकृपा शनैः-शनैः कैसे होती रहती है ?

संकटकालीन स्थिति में (कोरोना की पृष्ठभूमि पर) धर्मशास्त्र के अनुसार गुरुपूर्णिमा मनाने की पद्धति !

इस वर्ष कोरोना संकट की पृष्ठभूमि पर हमने घर पर रहकर ही भक्तिभाव से श्री गुरुदेवजी के छायाचित्र का पूजन अथवा मानसपूजन किया, तब भी हमें गुरुतत्त्व का एक सहस्र गुना लाभ मिलेगा ।

घोर आपातकाल में नई-नई आध्यात्मिक उपचार-पद्धतियों का शोध कर मानवजाति के कल्याण हेतु परिश्रम करनेवाले परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी !

सामान्य लोगों में अपने आस-पास अथवा हमारे जीवन में होनेवाली गतिविधियों के संदर्भ में जानने की जिज्ञासा होती है । आगे की साधनायात्रा में साधक के मन में मैं कहां से आया, मेरा लक्ष्य क्या है, मुझे कहां जाना है ? आदि प्रश्‍न उठते रहते हैं ।

सर्वज्ञ होते हुए भी जिज्ञासा से प्रत्येक कृत्य के पीछे का शास्त्र समझनेवाले गुरुदेवजी !

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के मार्गदर्शन में ३० अप्रैल २००८ को वेद, शास्त्र आदि अध्ययन करनेवालों के लिए ‘सनातन पुरोहित पाठशाला’ स्थापित की गई । ‘प्रत्येक धार्मिक विधि शास्त्र समझकर ‘साधना’ के रूप में करनी चाहिए’, इस संबंध में परात्पर गुरु डॉक्टरजी ने यहां शिक्षा ग्रहण करनेवालों का मार्गदर्शन किया है ।

ग्रंथमाला ‘गुरुकृपायोगानुसार साधना’

गुरुकृपायोग की महिमा गुरुकृपा के माध्यम से जीव को ईश्‍वरप्राप्ति होना, इसे ‘गुरुकृपायोग’ कहते हैं । इस ग्रंथ में ‘गुरुकृपायोगानुसार साधना’ के सिद्धांत, चरण इत्यादि की अभिनव जानकारी दी गई है ।

श्रीचित्‌शक्‍ति श्रीमती अंजली गाडगीळजी का अमूल्‍य विचारधन !

सनातन संस्था के माध्यम से गुरुकृपायोग के अनुसार अष्टांग साधना करनेवाले प्रत्येक साधक का जीवन एक अनुभूति ही है । साधनायात्रा करते समय गुरुदेवजी ने प्रत्येक साधक को उसकी क्षमता के अनुरूप बहुत ही ज्ञान प्रदान किया है ।