देवता को भावपूर्ण भोग चढाकर उसे ‘प्रसाद’ के भाव से ग्रहण करने पर व्यक्ति को मिलनेवाले आध्यात्मिक लाभ !

‘हिन्‍दू धर्म में देवता को भोग चढाकर उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है । ‘देवता को भोग चढाकर उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करनेवाले व्‍यक्‍ति पर आध्‍यात्मिक दृष्‍टि से क्‍या परिणाम होता है ?’ परीक्षण में प्राप्‍त निरीक्षणों का विवेचन, उनसे प्राप्‍त निष्‍कर्ष और उनका अध्‍यात्‍मशास्‍त्रीय विश्‍लेषण आगे दिया गया है ।

३१ दिसंबर की रात को ‘न्यू ईयर पार्टी’ द्वारा नववर्ष का स्वागत करनेवालों पर वहां के वातावरण का हुआ नकारात्मक परिणाम

३१ दिसंबर की रात ‘न्‍यू ईयर पार्टी’ द्वारा नववर्ष का स्‍वागत करनेवालों पर वहां के वातावरण का आध्‍यात्मिक दृष्‍टि से क्‍या परिणाम होता है ?’, विज्ञान के माध्‍यम से इसका अध्‍ययन करने के लिए ‘महर्षि अध्‍यात्‍म विश्‍वविद्यालय’ की ओर से एक परीक्षण किया गया ।

भगवान दत्तात्रेय के तारक और मारक नामजप का तीव्र आध्‍यात्मिक कष्‍ट से पीडित साधकों पर हुआ परिणाम

समाज के अनेक लोगों को अनिष्‍ट शक्‍तियों का (आध्‍यात्मिक) कष्‍ट होता है । अनिष्‍ट शक्‍तियों के कारण व्‍यक्‍ति को शारीरिक और मानसिक कष्‍ट होते हैं तथा जीवन में अन्‍य बाधाएं भी आती हैं । अनिष्‍ट शक्‍तियों के कष्‍ट के कारण साधकों की साधना में भी बाधाएं आती हैं; परंतु दुर्भाग्‍य से अनेक लोग इस कष्‍ट से अनभिज्ञ होते हैं ।

जोंक के सामने एलोपैथिक, होम्योपैथिक और आयुर्वेदीय औषधि की गोलियां रखने पर उसके द्वारा दिया प्रतिसाद और उसपर हुआ परिणाम

आयुर्वेद के देवता श्री धन्वन्तरी के चित्र में उनके दाहिने हाथ में जोंक दिखाई देती है । सामान्यत:आयुर्वेद में जोंक का उपयोग  शरीर में रक्त संबंधी व्याधि के निवारण हेतु किया जाता है । ३०.७.२०२० को गोवा में सनातन आश्रम के मुख्य प्रवेशद्वार के निकट एक जोंक दिखाई दी । वह सात्त्विक वस्तुआें की ओर आकृष्ट हो रही थी ।

गैस अथवा बिजली का उपयोग कर पकाए गए अन्न की अपेक्षा मिट्टी के चूल्हे पर पकाए अन्न से बडी मात्रा में सकारात्मक स्पंदन प्रक्षेपित होना !

कुछ वर्ष पहले सर्वप्रथम गोबर से भूमि लीपकर, चूल्हे का पूजन कर अग्नि में चावल की आहुति देने के उपरांत ही अन्न पकाने की प्रक्रिया आरंभ की जाती थी । उसके कारण इस अन्न की ओर देवताआें के स्पंदन आकर्षित होते थे । ऐसा अन्न ग्रहण करनेवाले जीवों को उसमें समाहित शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्तरों पर भी लाभ मिलता था ।

परात्‍पर गुरु डॉ. आठवलेजी के मार्गदर्शन में साधक-कलाकारों द्वारा बनाई गई देवतातत्त्व आकृष्‍ट करनेवाली सात्त्विक रंगोलियां एवं सात्त्विक चित्रों में देवताओं के यंत्र की भांति सकारात्‍मक ऊर्जा (चैतन्‍य) होना

 ‘रंगोली ६४ कलाआें में से एक कला है । यह कला घर-घर पहुंची है । त्‍योहार-समारोह में, देवालयों में और घर-घर में रंगोली बनाई जाती है । रंगोली के दो उद्देश्‍य हैं, सौंदर्य का साक्षात्‍कार और मांगल्‍य की प्राप्‍ति ।

‘दशहरे के दिन अश्मंणतक की पत्तियों पर होनेवाले सकारात्मक परिणाम’ संबंधी विशेषतापूर्ण अनुसंधान !

अश्‍मंतक के पत्तों पर दशहरे के दिन क्‍या परिणाम होता है  इसका वैज्ञानिक अध्‍ययन करने के लिए रामनाथी, गोवा के सनातन आश्रम में ‘महर्षि अध्‍यात्‍म विश्‍वविद्यालय’ की ओर से एक परीक्षण किया गया । इस परीक्षण के लिए ‘यूएएस (यूनिवर्सल ऑरा स्‍कैनर)’ उपकरण का उपयोग किया गया ।

सप्तर्षि द्वारा नाडीवाचन में बताए अनुसार श्रीविष्णुस्वरूप ‘सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत बाळाजी आठवलेजी’, भूदेवीस्वरूप ‘श्रीसत्‌शक्ति् (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी’ और श्रीदेवीस्वरूप ‘श्रीचित्‌शक्ति् (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी’, इन (नए) नामों से उनके प्रचलित नामों की अपेक्षा अधिक चैतन्य प्रक्षेपित होना

तीनों गुरुआें के नामों से प्रक्षेपित स्‍पंदनों का वैज्ञानिक अध्‍ययन करने के लिए ‘महर्षि अध्‍यात्‍म विश्‍वविद्यालय’ द्वारा ७.६.२०२० को एक परीक्षण किया गया ।

‘महर्षि अध्या्त्म विश्वविद्यालय’ का ‘संगीतयोग (संगीत के माध्यम से ईश्वर प्राप्ति)’ का कार्य

शास्‍त्र में संगीत की परिभाषा ‘गायन, वादन एवं नृत्‍य’ का एकत्रित संयोग ‘संगीत’ कहलाता है, ऐसी बताई गई है । भारतीय गायन, वाद्य और नृत्‍य कलाओं का शास्‍त्रीय आधार है ।

पितृपक्ष में श्राद्धविधि (श्राद्धकर्म) करने के पश्‍चात पितरों के पिंड में अत्‍यधिक सकारात्‍मक परिवर्तन होना

‘पितृपक्ष में पितरों के लिए किए श्राद्ध का श्राद्धविधि में उपयोग किए पिंडों पर क्‍या परिणाम होता है ?’, इसका वैज्ञानिक अध्‍ययन करने के लिए २७.९.२०१८ को रामनाथी, गोवा स्‍थित सनातन के आश्रम में ‘महर्षि अध्‍यात्‍म विश्‍वविद्यालय’ द्वारा एक परीक्षण किया गया ।